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Tuesday, October 2, 2012

तुम, मैं, चाँद और मोहब्बत

मैं कल रात बहुत देर तक
छत पर खड़ा घूरता रहा चाँद को
ढूँढता रहा तुम्हारा चेहरा चाँद के चेहरे में
करीब आधे घंटे तक की मैंने कोशिश
मगर तुम नहीं नज़र आई चाँद में
मैंने मन ही मन उलाहने भेजे उन कवियों को
जो जाने क्या कल्पनाएँ कर गए हैं चाँद को लेकर
मैं छत से उतर आया और दिल में तलाशने लगा तुम्हें
मगर इस मांस के छोटे से लोथड़े ने
वहां तुम्हारा वजूद होने से इंकार कर दिया
मैं हैरत में था
क्या मैं तुमसे थोड़ा भी प्यार नहीं करता
क्या तुम मुझसे थोड़ा भी प्यार नहीं करती
फिर क्यूँ तुम मुझे नहीं दिखी, चाँद में और दिल में
अचानक मेरे कानों में तुम्हारी आवाज़ आई
अरे मैं किचन में हूँ, छोटे को पकड़ो


1 comment:

  1. how cute, ise padhkar comment na karna nainsaafi hogi khud se, behad pyaari poem hai.

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