संकलक

Hindi Blogs Directory

Thursday, September 16, 2010

यादों का अवसान समीप है

साहित्यकारों और ऋषियों की धरती आजमगढ़। तमसा के पावन तट पर बसे इस शहर का साहित्य और आध्यात्म के क्षेत्र में गौरवशाली अतीत रहा है। मगर अफसोस अतीत जितना सफेद और स्पष्ट है, वर्तमान उतना ही धुंधला होता जा रहा है। आज इस जिले की पहचान आतंकवाद और अबु सलेम से होती है। आजमगढ़ का नाम सुनकर किसी को रश्क नहीं होता। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी जैसी शख्सियतों के जिले की नई पीढ़ी ने कई दूसरे क्षेत्रों में नाम कमाया मगर अपने गौरवशाली अतीत को भूलने की दोषी भी वे हैसिर्फ नई पीढ़ी ही क्यों, दोषी तो पुरानी पीढ़ी भी है जो अपनी धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में नाकाम रही। जिले के निजामाबाद कस्बे में जन्मे अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की बची यादों और प्रासंगिकता को टटोलने की कोशिश के दौरान कई रोचक बातें सामने आईं.

यहीं पैदा हुए थे कविसम्राट
शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा निजामाबाद एशिया में अपने मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर है। इसी निजामाबाद की धरती पर हरिऔध जैसी शख्सियत ने जन्म लिया। एक ऐसी शख्सियत जिसे कवि सम्राट होने का गौरव हासिल है। एक ऐसी शख्सियत जिसने हिंदी भाषा को खड़ी बोली का पहला महकाव्य ‘प्रियप्रवास’ दिया। जब मैं निजामाबाद पहुंचा तो शाम का ही समय ही था और हरिऔध जी के जन्म स्थल की ओर बढ़ते हुए जेहन में ‘प्रियप्रवास’ की यह पंक्तियां गूँज रही थीं।



'दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती·
मलिनी कुल वल्लभ की प्रभा



मूर्ति से बाकी है याद
हरिऔधजी का घर कहां है? पूछते-पूछते मैं बढऩे लगा। निजामाबाद कस्बे से पहले ही एक तिराहा पड़ता है। तिराहे पर हरिऔध जी की ही मूर्ति थी। देखकर अच्छा लगा की चलिए कम से कम कस्बे वाले इसी बहाने उन्हें याद तो रखे हुए हैं। तभी दिमाग ने खुराफात की। सोचा जरा आस-पास के लोगों से इसके बारे में पूछें। लोगों के जवाब हैरान करने वाले थे। कइयों को तो मालूम था की यह हरिऔध की मूर्ति थी मगर यह नहीं मालूम था की हरिऔध कौन हैं।

कौन
हरिऔध?
इसके बाद मैं आगे चला। थोड़ी दूर चलने के बाद गुरुद्वारे वाली गली आई। इसी गली में हरिऔध जी रहा करते थे यह बात मुझे पता थी। इसके बाद मैं पहुंचा गुरुद्वारे के पास। यहां कुछ लोगों से जानना चाहा की हरिऔध जी का पुराना घर किस तरफ है तो लोगों ने कहा की पास में ही हरिऔध विद्यालय है, वहीं जाकर पूछ लें सारी जानकारी मिल जाएगी। यह देखकर हैरानी हुई की हरिऔध के घर के पास के लोगों का यह हाल है की उन्हें हरिऔध का घर तक नहीं पता। इसके बाद मैं स्कूल में जा पहुंचा। यह एक निजी इंटर कालेज है. मैंने प्राचार्य से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। दस मिनट बाद प्राचार्य, अरुण कुमार गौड़ आए। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया की यहांअब उनका कोई नामलेवा नहीं है। एक यही स्कूल है जिसने उनके नाम को जिंदा रखा है। इस हकिकत को मैं पहले ही जान चुका था क्योंकी निजामाबाद कस्बे में जिस कीसी से भी मैंने हरिऔध का नाम लिया तो उसका जवाब था-कौन? हरिऔध स्कूल ? गौड़ ने कहा की प्रशासन और नेताओं के पास इतनी फुरसत नहीं है की वे हरिऔध जी की भूली बिसरी यादों को संवारें.

भूल गई जन्मभूमि
इसके बाद मैंने उनसे हरिऔध जी का पुराना घर देखने की बात कही। उन्होंने अपने स्कूल के एक बच्चे को साथ लगाया और कहा, घर कहां हैं खंडहर ही तो बचा है। खैर, आप इतनी दूर से आएं हैं तो तसल्ली कर लीजिए। बच्चे ·को लेकर मैं हरिऔध जी के घर की तरफ बढ़ा। हम गुरुद्वारे के अंदर से होते हुए उस तरफ बढ़े। बच्चे को भी उस जगह के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। मैंने उससे पूछा जिसका घर दिखाने तुम मुझे लेकर जा रहे हो जानते हो वह कौन हैं? जवाब में छठी क्लास का वह बच्चा सिर्फ मेरा मुंह देख रहा था। खैर उसने आसपास के एक दो घरों से पूछा और फिर हम उस जगह पर थे जहां कभी हरिऔध जी ने अपना रचना संसार रचा था. टूटकर बिखर चुका घर, आधी-अधूरी मिट्टी की दीवारें और आसपास उगी घास, वहां का बस यही नजारा था। मन में फिर हरिऔध जी की एक कविता की पंक्तियां गूंज रही थीं-
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल,
नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।

जिस जन्मभूमि को ना भूलने की बात हरिऔध जी ने की थी वह जन्मभूमि उनकी यादों को बिसार चुकी है।

हरिऔध कला भवन का कोई पुरसाहाल नहीं
इसके बाद मैंने आजमगढ़ शहर जाने का मन बनाया। सोचा, जरा देखूं शहर में हरिऔध जी की यादों को कीतना और कीस तरह संजोया गया है। इस सिलसिले में मुलाकात हुई पंकज गौतम जी से। उन्होंने बताया बहुत साल पहले हरिऔध कला भवन बनाया गया था। वहां पर हरिऔध की रचनाएं, राहुल सांकृत्यायन की कुछ कीताबें संजो कर रखी गई थीं। मैंने सोचा यहां पर कुछ रोचक जानकारी मिलेगी तो हरिऔध कला भवन की तरफ बढ़ चला। शहर के बीचोबीच विकास भवन के समीप स्थित हरिऔध कला भवन जर्जरता की जिंदा मिसाल है। आसपास के लोगों ने बताया की लगभग चार साल पहले यह गिर गया। इसके बाद कोई भी इसकी सुध लेने वाला नहीं है। कला भवन के बरामदे में लगी हरिऔध जी की पेंटिंग यहां की बदहाली पर आंसू बहाती लग रही थी। यहां पर कभी संगीत भवन, वाचनालय वगैरह की भी व्यवस्था भी थी, पर वर्तमान में यहां सिर्फ खंडहर होता भवन ही बचा है।



विदेशो फैली है ख्याति
हरिऔध जी के बारे में कुछ और जानने की चाहत में मैं पहुंचा रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले जगदीश बर्नवाल ‘कुंद' के पास। किताबों से भरे एक कमरे में करीब 70 साल के बुजुर्ग को देख मैं हैरान रह गया। ऊर्जा से भरे हुए। जैसे ही पता चला हरिऔध जी के बारे में जानना चाहता हूं, शुरू हो गए. बताया की हरिऔध जी की ख्याति विदेशों तफैली थी। चेक विद्वान मेंसेन्स लेस्नी ने 1911 में उनकी कीताब ‘ठेठ हिंदी का ठाट’ का चेक में अनुवाद कीया था. हरिऔध ने हिंदी आलोचना में कबीर को विषय बनाया था और उनकी रचनावली पर 90 पृष्ठ की भूमिका लिखी थी जो अपने आप में उल्लेखनीय है। यादों को संजोने की बात पर जगदीश जी बोले पुरानी कोतवाली पर कभी हरिऔध वाचनालय हुआ करता था। एक से एक कीताबें थीं वहां, पर अब इसे भी देखने वाला कोई नहीं है।



हिंदी दिवस के अवसर पर आई नेक्स्ट के 14 सितम्बर के अंक में प्रकाशित