संकलक

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Thursday, April 8, 2010

इन हिंदी कमेंटेटरों से बचाओ


इन दिनों आईपीएल का बुखार छाया हुआ है। एक के बाद एक शानदार मैच देखने को मिल रहा है। सचिन, कैलिस, गिलक्रिस्ट, मुरली धरन कुंबले जैसे बुजुर्गों का जलवा देखने में आ रहा है तो वहीँ युसूफ पठान, विराट कोहली, मुरली विजय जैसे नए लड़के भी अच्छा परफोर्म कर रहे है। पब्लिक का पूरा मनोरंजन हो रहा है। ललित मोदी ने हर इन्तेजाम अच्छा किया है। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ है जिसकी कमी खल रही है। वह है क्वालिटी हिंदी कमेंटरी। कमेंटरी टीम में मसलन अरुण लाल, अतुल वासन, सबा करीम, जैसे कई नाम हैं। पर इनकी कमेंटरी सुन कर हंसी आती है। कुछ एक उदाहरण देखिये। जैसे पिछले दिनों चेन्नई सुपर किंग्स के मुरली विजी ने एक शानदार कैच पकड़ा तो अरुण लाल ने कहा "हद हो गयी।" यह तो महज एक बानगी है। ऐसे तमाम जुमले ये जनाब लोग बोलते है की सुन के शर्म आती है। कई बार तो सोचता हूँ की क्या सोच कर ललित मोदी ने इन्हें कमेंटरी टीम में शामिल कर लिया। मुझे तो रेडियो की हिंदी कमेंटरी याद आती है। विनीत गर्ग की कमेंटरी का तो मैं मुरीद हूँ । रेडियो पर सुनते हुए ऐसा लगता है मानों मैच टीवी पर देख रहे हों। उधर इन लोगों की कमेंटरी सुनता हूँ तो मन करता की नवीं मंजिल से कूद जाऊं। ( दरअसल जिस अखबार में मैं काम करता हूँ उसकी ऑफिस नवीं मंजिल पर है।) सच बताऊँ इनसे कहीं अच्छी हिंदी कमेंटरी मैं खुद कर सकता हूँ। हो सकता है की तकनिकी ज्ञान इतना न हो पर इन लोंगों के पास तो ज्ञान है क्या फायदा ऐसे ज्ञान का। इनसे भी गए गुजरे तो वे चार चौपटे है, जो मैच शुरू होने के पहले और ख़त्म होने के बाद टीवी पर आ जाते हैं। एक दिन मैच ख़त्म होने के बाद रोबिन उथप्पा से बात करते हुए इन्ही चार चौपटों में से एक ने उन्हें रोबिन सिंह कह दिया। हकीकत में आईपीएल जैसे बेहतरीन टूर्नामेंट में इनकी कमेंटरी एक दाग है। है कि नहीं बताइयेगा ज़रूर।

Saturday, April 3, 2010

बेहतरीन प्रयास



लम्बे समय बाद फिर से चिटठा जगत में वापसी कर रहा हूँ। पिछले दिनों लव सेक्स और धोखा देखने गया था। साथ में कुछ दोस्त भी थे। सभी को फिल्म के बारे में एक ख़ास किस्म की एक्साईटमेंट था। ऐसा शायद फिल्म के टाइटल को लेकर था। फिल्म देखने आई भीड़ के मन भी यह बात ज़रूर रही होगी। लेकिन फिल्म शुरू होने के साथ ही लोगों का उत्साह ख़त्म होने लगा। इसके दो कारन थे। एक तो फिल्म बनाए का तरीका। दुसरे दूसरे फिल्म में वह सारे मसाले मौजूद नहीं थे जिसकी उम्मीद लेकर ज्यादातर दर्शक गए थे। आलम यह था की इंटरवल के वक्त आधे लोग या तो सो रहे थे या फिर बोर हो रहे थे। मेरे साथ गए दोस्तों का भी यही हाल था। कई लोग तो फिल्म बीच में ही छोड़कर चलते बने। हालाकि फिल्म मुझे काफी पसंद आई। फिल्म को बनाने के बंधे-बंधाए तरीके को छोड़कर जिस तरह से एक नया तरीका अपनाया गया था उसे देखकर मन खुश हो गया। हालांकि दोस्त बार-बार कह रहे थे यार कहां से फंस गए। मुझे फिल्म में कई बातें पसंद आईं। मसलन एक नए तरीके से स्टोरी को पेश किया गया था। सबसे बड़ी बात कि फिल्म में कुछ उन घटनाओं को उठाया गया था जिनसे कभी ना कभी हम रूबरू हो चुके हैं। मूविंग केमरे और सीसीटीव केमरे के जरिए फिल्म की शूटिंग का ख्याल तो अभी तक शायद किसी को जेहन में आया ही नहीं रहा होगा। अगर आया भी होगा तो ऐसा करने के लिए काफी साहसी होना पड़ता है। दिबाकर बनर्जी ने यह साहस दिखाया इसके लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए।