संकलक

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Sunday, December 5, 2010

हाँ हममें है दम

न्यूजीलैंड के साथ वन डे सीरीज शुरू होने के पहले जब भारतीय टीम की कप्तानी गौतम गंभीर के हाथों में दी गयी थी और ज्यादातर सीनियर्स को आराम दे दिया गया तो टीम अचानक से काफी कमजोर नजर आने लगी थी। लोगों के मन में यह बात थी कि क्या यह टीम किवी टीम का मुकाबला कर पायेगी। खासकर उस समय जबकि न्यूजीलैंड की टीम टेस्ट सिरीज हर चुकी थी। जाहिर सी बात थी कि किवी खिलाडियों के मन में वन डे मैचों में जीत हासिल कर बदला चुकाने कि भावना प्रबल रही होगी।
खाई ऐसा कुछ हुआ नहीं और गंभीर की अगुवाई में टीम ने बड़ी आसानी से न्यूजीलैंड की टीम को हार का स्वाद चखाया और सीरिज पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौरान टीम का प्रदर्शन खासा अच्छा रहा। खुद कप्तान गंभीर ने मोर्चे से अगुवाई की और टीम को कहीं से भी सचिन, सहवाग, धोनी और दूसरे बड़े खिलाडियों की कमी महसूस नहीं होने दी। उनके अलावा विराट कोहली, युसूफ पठान, श्रीसंत, आर आश्विन और दूसरे खिलाडियों ने भी कहीं से निराश नहीं किया।
भारतीय टीम के युवाओं की यह जीत दिखाती है कि टीम अब पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है। मुझे पिछले समय के दिन याद आते है। जब टीम पूरी तरह सचिन पर निर्भर हुआ करती थी। बाहर करते ही बल्लेबाजी धडाम हो जाया करती थी। अब टीम उस दुआर को काफी पीछे छोड़ चुकी है। यह ये दिखाता है कि हमारी युवा पीढ़ी कितनी मजबूत है। बढ़ो इंडिया वर्ल्ड कप जीत लो!

Friday, December 3, 2010

'शूल' के बहाने

अभी कुछ दिन पहले फिल्म 'शूल' देख रहा था। एक दृश्य में समर प्रताप बने मनोज बाजपाई के ऊपर गुंडे हमला करते हैं, वह अपनी बेटी को बचने कि कोशिश करता है, मगर उसकी बेटी घायल हो जाती है। गुंडों को मजा चखाने के बाद जब समर होश संभालता है तो अपनी घायल बेटी कि मदद के लिए पुकारता है। सैकड़ों की भीड़ में से कोई भी सामने नहीं आता। यह देखकर मुझे और मेरे सात फिल्म देख रहे बंधू को गुस्सा आता है। खैर वहां तो सब स्क्रिप्ट के मुताबिक सब कुछ था। मगर ऐसी घटना अगर हकीकत में हो तब भी क्या जनता इतनी असंवेदनशील रहेगी? क्या भीड़ से कोई भी किसी समर प्रताप की मदद करने के लिए आगे नहीं आएगा? ये सवाल चुभते हुए हो सकते हैं मगर हैं जायज। ज़रा सोचियेगा?

Thursday, November 4, 2010

बस 'एक' मौत !

सभी पन्ने छोड़ने के बाद मैं फिर से एजेंसी चेक कर रहा था। एक घटना की खबर पर नज़र पड़ी और मैंने अपने डेस्क इंचार्ज से पूछा सर इस खबर को लगवाकर पन्ना फिर से छुडवा दें? उन्होंने पूछा कितने लोग मारे गए हैं? मैंने कहा सर एक लोग! सुनकर सर ने कहा, छोडो यार, एक ही आदमी तो मरा है। बात आई गयी हो गयी।
घर लौटते हुए मेरी गली में कुछ रोना सुनाई दिया। मैंने एक आदमी से पूछा क्या हुआ? उसने कहा एक आदमी मर गया है। उसीके गम में सब लोग रो रहे हैं। मरने वाले की बीवी, अलग... बेटा अलग और दूसरे घर वाले अलग। उनकी तो दुनिया ही उजाड़ गई थी। मेरे दिमाग में अपने सर की बातें घूमने लगीं। 'एक ही आदमी तो मरा है...'

Tuesday, November 2, 2010

आफर्स कि बरसात है, जमकर लूटिये

दिवाली का त्यौहार छाया हुआ है। हर तरफ जगमग जगमग। पूरी जनता मस्त है। मार्केट में ढेर सारे आफ्फर्स ने भी आये हैं इन खुशियों में चार चाँद लगाने के लिए। वैसे इन दिनों मैं भी इसी तरह के एक आफर से परेशान हूँ। दरअसल पिछले दिनों मेरे मोबाइल का टैरिफ ख़त्म हो गया। अभी तक मैं पे पर सेकंड वाले प्लान के मुताबिक चल रहा था। सोचा अबकी कुछ नया आजमाते है। यही सोच कर मैंने कस्टमर केयर में फ़ोन लगाया। वो साहब तो फिर शुरू ही हो गया। ये आफर, वो आफर , न जाने कौन कौन से आफर। काफी देर तक सोचने के बाद मुझे एक प्लान जम गया और मैंने उसे ही आजमा लिया। अब ये और बात है कि फिर से मैं ये सोच सोच कर परेशान हूँ कि फलां आफर ज्यादा बढ़िया था।
वैसे सिर्फ मोबाइल ही क्यों। आफर का बाज़ार तो हर जगह सजा है। किसी गली कूचे में निकल जाइये बस बहार ही बहार । टीवी से लेकर मोबाइल, बर्तन, कपडा, हर जगह। कहीं १० परसेंट कि छूट है तो कहीं ५० परसेंट तक आफ । लूटने का पूरा मौका बिखरा पड़ा है। कैसी अजीब बात है ना कि तमाम कम्पनियां खुद को लुटवाने को तैयार बैठी है। आओ आओ हमें लूटो, लूट आफर, नोच खसोट के ले जाओ। और पब्लिक भी मौका ताड़े बैठे है। चलिए अच्छा है। वो लुटवा रहे हैं, आप भी लूटिये।

Tuesday, October 5, 2010

लक्ष्मण तुम्हे सलाम!

इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच मोहाली टेस्ट ख़त्म होने के बाद हमारी ऑफिस में एक सीनियर ने कहा याद रखियेगा लक्ष्मण को मैन ऑफ़ द मैच का अवार्ड नहीं मिलेगा। और सच में नहीं मिला।
वी वी एस लक्ष्मण, एक ऐसा नाम जिसके नाम कई ऐसे रेकॉर्ड्स हैं जिसके लिए हर बैट्समैन लालायित रहता है। जब टीम के सभी बल्लेबाज आउट हो चुके होते हैं तो लक्ष्मण उभर कर सामने आते है। जिस ऑस्ट्रेलिया के सामने दुनिया भर के बल्लेबाज खौफ खाते हैं, उसी ऑस्ट्रेलिया के सामने लक्ष्मण अपना बेस्ट देते है। १७३, २८१, और मोहाली में खेली गयी ७३ रनों कि पारियां तो महज मिसाल है। दरअसल लक्ष्मण उस चट्टान का नाम है जो मुश्किलों के सामने और मजबूत हो जाती है।
इन सभी बातों के बावजूद इसे लक्ष्मण का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उन्हें वह नाम और शोहरत नहीं मिली जिसके वास्तव में वो हक़दार हैं। शायद इसका कारन यह है कि लक्ष्मण उस दौर में टीम इंडिया का हिस्सा बने जब सचिन, गांगुली और द्रविड़ जैसे बड़े नाम टीम में थे। इनकी परछाई में लक्ष्मण कि तमाम उपलब्धियां दब कर रह गई। लेकिन इन बातों से बेपरवाह लक्ष्मण सिर्फ अपने काम में लगे रहे। जब भी जरूरत हुई उनके बल्ले से खूब रन बरसे।
यहाँ इस बात पर ध्यान देने कि जरूरत है कि जब टीम को जरूरत थी। सचिन ने भले ही बहुत ज्यादा रन बनाये हों, रेकार्डों का पहाड़ खड़ा किया हो, लेकिन बहुत कम मैच सचिन ने जितायें है। जब जब टीम को उनसे आशा थी निराशा ही हाथ लगी। द्रविड़ जरूर मिस्टर भरोसेमंद का तमगा पायें हैं लेकिन यह भी याद रखिये कि द्रविड़ नंबर तीन पर बत्टिंग करने आते है। वह उन्हें दूसरे बल्लेबाजों का साथ मिल जाता है, मगर लक्ष्मण कि कहानी जरा अलग है। वह पांचवें या छठे नंबर पर बल्लेबाजी करने आतें हैं। यहाँ अकसर उन्हें पुछल्ले बल्लेबाजो का ही साथ मिलता है। ऐसे में चुनौती और भी बड़ी हो जाती है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि उन्हें एक दिवसीय मैचों में ज्यादा मौके नहीं मिले और चयन कर्ताओं ने उन्हें टेस्ट बल्लेबाज बना के रख दिया। लक्ष्मण कि स्टाइल भी खूबसूरत है। वह अजहर को अपना आदर्श मानते हैं और उसी स्टाइल में बल्लेबाजी करते हैं। कलाइयों कि उनकी जादूगरी किसी का भी मन मोह लेती है। भले ही उनके नाम बहुत सारे रिकॉर्ड ना हों, बहुत सारे अवार्ड ना हों, पर जब भी इंडिया कि कुछ शानदार जीत कि चर्चा चलेगी, लक्ष्मण का नाम खुद बा खुद जुबान पर जायेगा। लक्ष्मण तुम्हे सलाम!

Thursday, September 16, 2010

यादों का अवसान समीप है

साहित्यकारों और ऋषियों की धरती आजमगढ़। तमसा के पावन तट पर बसे इस शहर का साहित्य और आध्यात्म के क्षेत्र में गौरवशाली अतीत रहा है। मगर अफसोस अतीत जितना सफेद और स्पष्ट है, वर्तमान उतना ही धुंधला होता जा रहा है। आज इस जिले की पहचान आतंकवाद और अबु सलेम से होती है। आजमगढ़ का नाम सुनकर किसी को रश्क नहीं होता। अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’, राहुल सांकृत्यायन, कैफी आजमी जैसी शख्सियतों के जिले की नई पीढ़ी ने कई दूसरे क्षेत्रों में नाम कमाया मगर अपने गौरवशाली अतीत को भूलने की दोषी भी वे हैसिर्फ नई पीढ़ी ही क्यों, दोषी तो पुरानी पीढ़ी भी है जो अपनी धरोहर को नई पीढ़ी तक पहुंचाने में नाकाम रही। जिले के निजामाबाद कस्बे में जन्मे अयोध्या सिंह उपाध्याय ‘हरिऔध’ की बची यादों और प्रासंगिकता को टटोलने की कोशिश के दौरान कई रोचक बातें सामने आईं.

यहीं पैदा हुए थे कविसम्राट
शहर से लगभग 20 किलोमीटर दूर स्थित कस्बा निजामाबाद एशिया में अपने मिट्टी के बर्तनों के लिए मशहूर है। इसी निजामाबाद की धरती पर हरिऔध जैसी शख्सियत ने जन्म लिया। एक ऐसी शख्सियत जिसे कवि सम्राट होने का गौरव हासिल है। एक ऐसी शख्सियत जिसने हिंदी भाषा को खड़ी बोली का पहला महकाव्य ‘प्रियप्रवास’ दिया। जब मैं निजामाबाद पहुंचा तो शाम का ही समय ही था और हरिऔध जी के जन्म स्थल की ओर बढ़ते हुए जेहन में ‘प्रियप्रवास’ की यह पंक्तियां गूँज रही थीं।



'दिवस का अवसान समीप था
गगन था कुछ लोहित हो चला
तरु शिखा पर थी अब राजती·
मलिनी कुल वल्लभ की प्रभा



मूर्ति से बाकी है याद
हरिऔधजी का घर कहां है? पूछते-पूछते मैं बढऩे लगा। निजामाबाद कस्बे से पहले ही एक तिराहा पड़ता है। तिराहे पर हरिऔध जी की ही मूर्ति थी। देखकर अच्छा लगा की चलिए कम से कम कस्बे वाले इसी बहाने उन्हें याद तो रखे हुए हैं। तभी दिमाग ने खुराफात की। सोचा जरा आस-पास के लोगों से इसके बारे में पूछें। लोगों के जवाब हैरान करने वाले थे। कइयों को तो मालूम था की यह हरिऔध की मूर्ति थी मगर यह नहीं मालूम था की हरिऔध कौन हैं।

कौन
हरिऔध?
इसके बाद मैं आगे चला। थोड़ी दूर चलने के बाद गुरुद्वारे वाली गली आई। इसी गली में हरिऔध जी रहा करते थे यह बात मुझे पता थी। इसके बाद मैं पहुंचा गुरुद्वारे के पास। यहां कुछ लोगों से जानना चाहा की हरिऔध जी का पुराना घर किस तरफ है तो लोगों ने कहा की पास में ही हरिऔध विद्यालय है, वहीं जाकर पूछ लें सारी जानकारी मिल जाएगी। यह देखकर हैरानी हुई की हरिऔध के घर के पास के लोगों का यह हाल है की उन्हें हरिऔध का घर तक नहीं पता। इसके बाद मैं स्कूल में जा पहुंचा। यह एक निजी इंटर कालेज है. मैंने प्राचार्य से मिलने की ख्वाहिश जाहिर की। दस मिनट बाद प्राचार्य, अरुण कुमार गौड़ आए। बातचीत के दौरान उन्होंने बताया की यहांअब उनका कोई नामलेवा नहीं है। एक यही स्कूल है जिसने उनके नाम को जिंदा रखा है। इस हकिकत को मैं पहले ही जान चुका था क्योंकी निजामाबाद कस्बे में जिस कीसी से भी मैंने हरिऔध का नाम लिया तो उसका जवाब था-कौन? हरिऔध स्कूल ? गौड़ ने कहा की प्रशासन और नेताओं के पास इतनी फुरसत नहीं है की वे हरिऔध जी की भूली बिसरी यादों को संवारें.

भूल गई जन्मभूमि
इसके बाद मैंने उनसे हरिऔध जी का पुराना घर देखने की बात कही। उन्होंने अपने स्कूल के एक बच्चे को साथ लगाया और कहा, घर कहां हैं खंडहर ही तो बचा है। खैर, आप इतनी दूर से आएं हैं तो तसल्ली कर लीजिए। बच्चे ·को लेकर मैं हरिऔध जी के घर की तरफ बढ़ा। हम गुरुद्वारे के अंदर से होते हुए उस तरफ बढ़े। बच्चे को भी उस जगह के बारे में बहुत ज्यादा जानकारी नहीं थी। मैंने उससे पूछा जिसका घर दिखाने तुम मुझे लेकर जा रहे हो जानते हो वह कौन हैं? जवाब में छठी क्लास का वह बच्चा सिर्फ मेरा मुंह देख रहा था। खैर उसने आसपास के एक दो घरों से पूछा और फिर हम उस जगह पर थे जहां कभी हरिऔध जी ने अपना रचना संसार रचा था. टूटकर बिखर चुका घर, आधी-अधूरी मिट्टी की दीवारें और आसपास उगी घास, वहां का बस यही नजारा था। मन में फिर हरिऔध जी की एक कविता की पंक्तियां गूंज रही थीं-
प्रतिदिन पूजें भाव से चढ़ा भक्ति के फूल,
नहीं जन्म भर हम सके जन्मभूमि को भूल।

जिस जन्मभूमि को ना भूलने की बात हरिऔध जी ने की थी वह जन्मभूमि उनकी यादों को बिसार चुकी है।

हरिऔध कला भवन का कोई पुरसाहाल नहीं
इसके बाद मैंने आजमगढ़ शहर जाने का मन बनाया। सोचा, जरा देखूं शहर में हरिऔध जी की यादों को कीतना और कीस तरह संजोया गया है। इस सिलसिले में मुलाकात हुई पंकज गौतम जी से। उन्होंने बताया बहुत साल पहले हरिऔध कला भवन बनाया गया था। वहां पर हरिऔध की रचनाएं, राहुल सांकृत्यायन की कुछ कीताबें संजो कर रखी गई थीं। मैंने सोचा यहां पर कुछ रोचक जानकारी मिलेगी तो हरिऔध कला भवन की तरफ बढ़ चला। शहर के बीचोबीच विकास भवन के समीप स्थित हरिऔध कला भवन जर्जरता की जिंदा मिसाल है। आसपास के लोगों ने बताया की लगभग चार साल पहले यह गिर गया। इसके बाद कोई भी इसकी सुध लेने वाला नहीं है। कला भवन के बरामदे में लगी हरिऔध जी की पेंटिंग यहां की बदहाली पर आंसू बहाती लग रही थी। यहां पर कभी संगीत भवन, वाचनालय वगैरह की भी व्यवस्था भी थी, पर वर्तमान में यहां सिर्फ खंडहर होता भवन ही बचा है।



विदेशो फैली है ख्याति
हरिऔध जी के बारे में कुछ और जानने की चाहत में मैं पहुंचा रेलवे स्टेशन के समीप रहने वाले जगदीश बर्नवाल ‘कुंद' के पास। किताबों से भरे एक कमरे में करीब 70 साल के बुजुर्ग को देख मैं हैरान रह गया। ऊर्जा से भरे हुए। जैसे ही पता चला हरिऔध जी के बारे में जानना चाहता हूं, शुरू हो गए. बताया की हरिऔध जी की ख्याति विदेशों तफैली थी। चेक विद्वान मेंसेन्स लेस्नी ने 1911 में उनकी कीताब ‘ठेठ हिंदी का ठाट’ का चेक में अनुवाद कीया था. हरिऔध ने हिंदी आलोचना में कबीर को विषय बनाया था और उनकी रचनावली पर 90 पृष्ठ की भूमिका लिखी थी जो अपने आप में उल्लेखनीय है। यादों को संजोने की बात पर जगदीश जी बोले पुरानी कोतवाली पर कभी हरिऔध वाचनालय हुआ करता था। एक से एक कीताबें थीं वहां, पर अब इसे भी देखने वाला कोई नहीं है।



हिंदी दिवस के अवसर पर आई नेक्स्ट के 14 सितम्बर के अंक में प्रकाशित

Friday, August 6, 2010

व्यस्तताओं के बीच जिंदगी के बदलते मायने


जिंदगी बहुत तेजी से चल रही. हर पल, हर मोड़ पर इसके मायने बदलते जा रहे हैं। ईमानदारी वगैरह की बातें तो छोड़ दीजिए बस किसी तरह आदमी किसी तरह अपनी जिंदगी जी ले यही क्या कम है। आप लोग भी सोच रहे होंगे ·कि क्या मैं आज उपदेश देने बैठा हूं? अरे नहीं जनाब, इतनी फुरसत किसके पास है, उपदेश सुनने की और देने की। बस बातों बातों में कुछ बातें याद आईं तो सोचा आपसे शेयर करता चलूं। कुछ वक्त पहले की बात है। मैं लखनऊ से अपने घर आजमगढ़ जा रहा था।अभी बस लखनऊ से थोड़ी दूर ही पहुंची थी कि एक जगह जबर्दस्त जाम लग गया। रात के करीब 4 बजे क समय था। बस के ज्यादातर मुसाफिरों को इस बात से ज्यादा मतलब नहीं था कि जाम क्यों लगा है. ऐसे में कई लोग हौले-हौले नींका मजा उठा रहे थे। मगर बस में बैठे कुछ लोगों से रहा नहीं गया और वे नीचे उतर पड़े। उनमें से एक लड़के ने काफी मेहनत करते हुए जाम खुलावाया। जाम खुला तो बस चल पड़ी। अभी बस हैदरगढ़ के आस-पास पहुंची थी कि एक दूसरी बस ने उसे ओवरटेक किया। उस बस में एक लडका उतर कर आया। जानते हैं वह लडका कौन था? वह वही लडका था जिसने जाम खुलवाया था. दरअसल जाम खुलवाते खुलवाते वह काफी पीछे चला गया था और जब बस खुली तो किसी को ख्याल ही नहीं रहा कि वह पीछे छूट गया है। इस बात को लेकर उस लड़के ने काफी गुस्सा दिखाया और कहा कि मैं आप लोगों की सुविधा के लिए जाम खुलवाने इतनी दूर तक चला गया, मगर आप लोगों को इस बात का जरा भी ख्याल नहीं आया कि मेरे लिए बस रुकवा लेते. फिर उसने बस कंडक्टर की भी जमकर क्लास ली और कहा कि अगर मेरे डॉक्यूमेंट्स मिस हो जाते तो मैं उसका हर्जाना कहां से भरता। खैर बात आई-गई हो गई और बस चलती रही। आगे जाक्रर वह लडका अपनी मंजिल पर उतर गया. बस यहीं से मेरे दिमाग में ख्याल आने लगा कि यह भलाई-बुराई, ईमानदारी, दूसरों की सेवा क्या किताबी बातें नहीं है। अपने मतलब और सुविधा के लिए जी रही इस दुनिया में भला इन चीजों की क्या जगह है। मन अभी तक उलझा हुआ है अगर आपके पास इसक कोई जवाब हो तो जरूर बताइएगा।


Saturday, July 10, 2010

"मंहगाई डायन" के जलवे


वैसे अभी आमिर खान की बहु चर्चित फिल्म पीपली लाइव रिलीज़ तो नहीं हुई है मगर इसे लेकर चर्चाओं का बाज़ार गरम है। कभी इस फिल्म में उठाये गए किसानो की मौत के मुद्दे को लेकर तो कभी इस फिल्म की भाषा को लेकर। इन दिनों फिल्म का गाना मंहगाई डायन खाए जात है खासा चर्चा में है। गाने में मंहगाई की निंदा की गई है। उधर देश के हालात भी इन दिनों कुछ ऐसे ही हैं की हर कोई मंहगाई से बेजार है। ऐसे में कहना गलत नहीं होगा की यह फिल्म और गाना दोनों ही बड़े ऐन मौके पर रिलीज़ हो रही है। इस बीच मंहगाई के खिलाफ कमर कसे विपक्छ को एक और हथियार दे दिया है। गाने के बोल और संगीत दोनों ही लुभावने है। और मुद्दा भी जनता के दिल के करीब है। तो बीजेपी और दूसरी विपक्छी पार्टियाँ इस गाने को गली गली बजने की तयारी कर रही है। अब खबर यह आ रही है की सरकार खुद को असहज महसूस कर रही है। ऐसे में हो सकता है की इस गाने पर बन भी लगा दिया जाय। वैसे कांग्रेस तो बैन लगाने मे माहिर है ही। पर फिल्हत तो इस गाने के बोल गुनगुना रहे हैं मंहगाई डायन खाए जात है......... आप भी गुनगुनाइए.

Sunday, June 20, 2010

अब तो बदल जाओ पापा


फादर्स डे भी बीत गया। पर हमें क्या। कहते हैं की इस दिन बच्चे अपने पापा को विश करते है। उनके साथ खुशियाँ बिताते है। होता होगा भाई। बड़े लोगों के यहाँ। हमारे लिए इसका क्या मतलब। आज सुबह जब अपने दोस्त से मैं कह रहा था तो उसका भी यही रिअक्शन था। कहने लगा क्या भैया मजाक करते हैं आप भी। अरे आज तक तो पापा से सीधे मुंह कभी बात नहीं हुई। जब महीने का खर्च लेने की बात आती है। तो बड़ी मुश्किल से किसी तरह उनके सामने जाकर खड़े हो जाते है। जो पैसा वह दे देते हैं बस चुपचाप रख लेते है। बाकि किसी तरह मां से जुगाड़ करते हैं। अरे भाई हमें तो सिर्फ पापा का गुस्सा ही पता । कभी बचपन में पिता जी ले जाते थे कंधे पर बिठा कर मेला घुमाने। वहां जो मांगते वो खिलाते। फिर झूले पर भी झुलाते थे। पर अचानक बचपन की सीमा से हम बाहर निकले और पिता जी की मोहब्बत हमसे दूर हो गई। बात बात में डांटना, गुस्सा करना। सिर्फ पढाई लिखाई करने को कहना, अब तो पापा से बात करने का मन भी नहीं करता। कहते कहते उसकी ऑंखें भर आईं

दरअसल यह सिर्फ मेरे उस दोस्त का ही किस्सा नहीं है। यह कई लड़कों की कहानी है। एक निश्चित उम्र के बाद पिता क्यूँ अपने बेटे से दूरी बना लेते है। जिस मोड़ पर उन्हें पिता की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, जहाँ से वह अपने बेटे को गाइड कर सकते हैं, वहीँ आकर वह अनुशासन का डंडा उठा लेते हैं। बेटा बेचारा पशोपेश में कुछ कह ही नहीं पता और अन्दर ही अन्दर घुटता रहता है। बहुत बिकट होती है ऐसी सिचुएसन। मैं सभी पिताओ की बात नहीं करता पर अब भी बहुत से लोग हैं जिन्हें अपना नजरिया बदलने की जरुरत है। अपने बेटे पर यकीं कीजिये। आपका भरोसा और दिशा निर्देश एक सफल और सच्चा इन्सान बनाएगी।

Wednesday, June 16, 2010

फुटबाल के खुमार में डूबी दुनिया


फीफा वर्ल्ड कप शुरू होने के साथ ही पूरी दुनिया पर एक अजीब सी खुमारी छा गई है। हर किसी की निगाहें जो उठ रही हैं तो टीवी पर फुटबाल मैच पर ही टिक रही हैं। जुबान पर उठने वाली हर चर्चा में फुटबाल का जिक्र जरूर हो रहा है। समां में फुटबाल का एक्शन खूब देखने में आ रहा है। वहीँ दक्छिन अफ्रीका में ३२ टीमो के महासंग्राम में रोजाना कुछ नया उलटफेर देखने में आ रहा है। ब्राजील को जीतने में मुश्किल हुई। ख़िताब की दावेदार मानी जाने वाली स्पेन की टीम स्वीटजरलैंड जैसी टीम से हार जाती है। सच पूछिये तो इस गेम का यही मजा है। नब्बे मिनट पहले तक खुद को विजेता समझाने वाली टीम जब मैच के अंत में हकीकत से रूबरू होती है तो एक बार चौंक जाती है।

उधर मैच से अलग कुछ और खबरे है। फुटबाल के महाकुम्भ से। जैसे वुवुजेला बाजे का आतंक। दिखने में इंडियन पुंगी जैसा दिखने वाला यह बाजा खिलाडियों के जी का जंजाल बना हुआ है। दुनिया भर में इसकी आलोचना हो रही है। बात फीफा तक पहुची की इसे बैन कर दिया जाये। पर फीफा ने यह कहते हुए बैन लगाने से इंकार कर दिया की भाई किसी के घर में शादी हो और वहां शहनाई ही न बजने दी जाये यह कैसे हो सकता है। वैसे यह बात भी ठीक ही है। लेकिन भाई बात यह है की इससे दूसरों को होने वाली प्रोब्लम का भी तो ध्यान रखा जाना चाहिए। खैर जो भी हो हम तो जम कर फुटबाल एन्जॉय कर रहे हैं और चाहते हैं की ब्राजील की टीम चैम्पियन बने । आप किसे चैम्पियन बनाना चाहते है। बताइयेगा जरूर। अगली पोस्ट तक सभी को नमस्कार।

Thursday, April 8, 2010

इन हिंदी कमेंटेटरों से बचाओ


इन दिनों आईपीएल का बुखार छाया हुआ है। एक के बाद एक शानदार मैच देखने को मिल रहा है। सचिन, कैलिस, गिलक्रिस्ट, मुरली धरन कुंबले जैसे बुजुर्गों का जलवा देखने में आ रहा है तो वहीँ युसूफ पठान, विराट कोहली, मुरली विजय जैसे नए लड़के भी अच्छा परफोर्म कर रहे है। पब्लिक का पूरा मनोरंजन हो रहा है। ललित मोदी ने हर इन्तेजाम अच्छा किया है। लेकिन इन सबके बीच एक चीज़ है जिसकी कमी खल रही है। वह है क्वालिटी हिंदी कमेंटरी। कमेंटरी टीम में मसलन अरुण लाल, अतुल वासन, सबा करीम, जैसे कई नाम हैं। पर इनकी कमेंटरी सुन कर हंसी आती है। कुछ एक उदाहरण देखिये। जैसे पिछले दिनों चेन्नई सुपर किंग्स के मुरली विजी ने एक शानदार कैच पकड़ा तो अरुण लाल ने कहा "हद हो गयी।" यह तो महज एक बानगी है। ऐसे तमाम जुमले ये जनाब लोग बोलते है की सुन के शर्म आती है। कई बार तो सोचता हूँ की क्या सोच कर ललित मोदी ने इन्हें कमेंटरी टीम में शामिल कर लिया। मुझे तो रेडियो की हिंदी कमेंटरी याद आती है। विनीत गर्ग की कमेंटरी का तो मैं मुरीद हूँ । रेडियो पर सुनते हुए ऐसा लगता है मानों मैच टीवी पर देख रहे हों। उधर इन लोगों की कमेंटरी सुनता हूँ तो मन करता की नवीं मंजिल से कूद जाऊं। ( दरअसल जिस अखबार में मैं काम करता हूँ उसकी ऑफिस नवीं मंजिल पर है।) सच बताऊँ इनसे कहीं अच्छी हिंदी कमेंटरी मैं खुद कर सकता हूँ। हो सकता है की तकनिकी ज्ञान इतना न हो पर इन लोंगों के पास तो ज्ञान है क्या फायदा ऐसे ज्ञान का। इनसे भी गए गुजरे तो वे चार चौपटे है, जो मैच शुरू होने के पहले और ख़त्म होने के बाद टीवी पर आ जाते हैं। एक दिन मैच ख़त्म होने के बाद रोबिन उथप्पा से बात करते हुए इन्ही चार चौपटों में से एक ने उन्हें रोबिन सिंह कह दिया। हकीकत में आईपीएल जैसे बेहतरीन टूर्नामेंट में इनकी कमेंटरी एक दाग है। है कि नहीं बताइयेगा ज़रूर।

Saturday, April 3, 2010

बेहतरीन प्रयास



लम्बे समय बाद फिर से चिटठा जगत में वापसी कर रहा हूँ। पिछले दिनों लव सेक्स और धोखा देखने गया था। साथ में कुछ दोस्त भी थे। सभी को फिल्म के बारे में एक ख़ास किस्म की एक्साईटमेंट था। ऐसा शायद फिल्म के टाइटल को लेकर था। फिल्म देखने आई भीड़ के मन भी यह बात ज़रूर रही होगी। लेकिन फिल्म शुरू होने के साथ ही लोगों का उत्साह ख़त्म होने लगा। इसके दो कारन थे। एक तो फिल्म बनाए का तरीका। दुसरे दूसरे फिल्म में वह सारे मसाले मौजूद नहीं थे जिसकी उम्मीद लेकर ज्यादातर दर्शक गए थे। आलम यह था की इंटरवल के वक्त आधे लोग या तो सो रहे थे या फिर बोर हो रहे थे। मेरे साथ गए दोस्तों का भी यही हाल था। कई लोग तो फिल्म बीच में ही छोड़कर चलते बने। हालाकि फिल्म मुझे काफी पसंद आई। फिल्म को बनाने के बंधे-बंधाए तरीके को छोड़कर जिस तरह से एक नया तरीका अपनाया गया था उसे देखकर मन खुश हो गया। हालांकि दोस्त बार-बार कह रहे थे यार कहां से फंस गए। मुझे फिल्म में कई बातें पसंद आईं। मसलन एक नए तरीके से स्टोरी को पेश किया गया था। सबसे बड़ी बात कि फिल्म में कुछ उन घटनाओं को उठाया गया था जिनसे कभी ना कभी हम रूबरू हो चुके हैं। मूविंग केमरे और सीसीटीव केमरे के जरिए फिल्म की शूटिंग का ख्याल तो अभी तक शायद किसी को जेहन में आया ही नहीं रहा होगा। अगर आया भी होगा तो ऐसा करने के लिए काफी साहसी होना पड़ता है। दिबाकर बनर्जी ने यह साहस दिखाया इसके लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए।

Saturday, February 13, 2010

हाए हाए ये वैलेन्ताईन


बड़ा शोर है वैलेन्ताईन का इन दिनों। जिसे देखो इश्क इश्क की रट लगाये बैठा है। पर मुझे इसपर जरा ओब्जेक्शन है भाई। आप भी सोच रहे होंगे क्यों भला? अरे साहब यह तो मुए पश्चिम वालों की देन है। वरना अपने देश में भला कहीं ऐसा होता है। अरे अपने लिए तो हर दिन मोहब्बत का है। हर दिन तकरार, हर दिन इकरार। पड़ोस वाले भाई साहब को देखता हूँ। हर दिन सुबह मियां बीवी में जमकर लड़ाई होती है। ऐसा लगता है की मानो एक दूसरे की जन ही ले लेंगे। लेकिन शाम होते ही नज़ारा बदला सा नज़र आना लगता है। पडोसी को आने में जरा सी देर होने लगी की उनकी पत्नी की तो मानो जान ही निकल जाती है। देखकर यकीन नहीं होता की सुबह येही मोहतरमा अपने पति के खून की प्यासी थी।

ऐसा ही होता है। अपना इंडियन प्यार। कोई दिखावट नहीं। कोई बनावट नहीं। अब यह बात आज के लौंडों को कौन समझाए। गर्लफ्रेंड, गिफ्ट, प्यार, इजहार बस बेचारे इसी में बर्बाद हुए जा रहे है। और इतना ही नहीं। एक एक लड़के की पांच पांच गर्लफ्रेंड है। हो सकता है ये आंकड़ा और भी बड़ा हो। येही हाल लड़कियों के भी है। मेरे दोस्त का एक भाई है । एक दिन सुबह पार्क में मिल गया। साथ में एक लड़की भी थी। मुझे देखकर बोला भैया, मेरी दोस्त है। शाम को फिर मिला एक रेस्टोरेंट में। इस बार दूसरी लड़की साथ थी। बोला भैया दोस्त है। मैं चक्कर खाकर गिरते गिरते बचा। ये तो हाल है साहब। किसे समझायेंगे और कैसे? अब मैं सोच रहा हूँ की वैलेन्ताईन वाले दिन वह लड़का किस लड़की के साथ होगा।

इश्क के लिए दिन और तारीख मुक़र्रर करना हमारे कल्चर में नहीं है। हम तो हर दिन प्यार बाटने और उसे एन्जॉय करने में ही यकीन करते है। आपका क्या ख्याल है?

Wednesday, January 20, 2010

ये कैसा खेल है भाई

खेल को हमेशा दिलों को जोड़ने वाला माना जाता है। लेकिन हाल ही में आईपीएल की नीलामी के दौरान जो देखने में आया उसे शुभ संकेत तो नहीं माना जा सकता। जिस तरह से नीलामी के दौरान पाकिस्तानी खिलाडियों के साथ भेदभाव हुआ उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हालंकि यह भी सच है कि कई देशों के खिलाडी नहीं बिके लेकिन अफरीदी जैसा बड़ा नाम न बिके वह भी टी-२० फार्मेट में तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो जरूर है। हो सकता है कि खिलाडियों के नाम लिस्ट में शामिल ही न रहे हों। या फिर यह भी हो सकता है कि टीम मालिकों से कह दिया गया हो कि पाकिस्तानी खिलाडियों को न खरीदें। फिर अगर ऐसा ही करना था तो पहले आईपीएल में ही पाक खिलाडियों को न खिलाते। खैर सच जो भी हो लेकिन एक बात साफ है कि इससे क्रिकेट जगत में बहुत ही ख़राब मैसेज गया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि चूंकि पाकिस्तानी खिलाडियों कि उपलब्धता सुनिश्चित नहीं थी इसलिए ऐसा हुआ होगा। अगर ऐसी बात थी तो फिर पाकिस्तानी खिलाडियों को नीलामी में शामिल ही नहीं करना चाहिए था। इस तरह से पूरी दुनिया के सामने जलील करने का क्या तुक। सियासी महकमे का कहना है कि वह इस मामले पर कुछ नहीं कह सकती क्योंकि आईपीएल एक निजी संस्था है। शायद आप में से बहुत लोगों को लगे कि मैं पाकिस्तानी खिलाडियों कि कुछ ज्यादा ही तरफदारी कर रहा हूँ, लेकिन एक बात बता दूं अगर एक आम दर्शक से पूछेंगे तो वह भी आह भरते हुए कहेगा, यार अफरीदी को शामिल कर लेते, क्या लम्बे-लम्बे छक्के लगाता है। सच कह रहा हूँ, आम आदमी को इन बातों से कोई मतलब नहीं कि सियासत किस बात कि मंज़ूरी देती है किस बात को नहीं। वह तो बस शोएब अख्तर कि गेंद पर सचिन को सिक्स लगाते देखना चाहते हैं। पाकिस्तानी खिलाडियों का इस तरह आईपीएल से दूर हो जाना आम दर्शक के लिए नुक्सान की बात है।
ज़रा याद करिए तो कैसे अटल जी के जमाने में खेल की बदौलत रिश्तों कि तल्खी में कमी आयी थी। हालाँकि यह भी बहुत बड़ा सच है कि हमारा पडोसी है बड़ा उद्दंड। कभी घुसपैठी भेजकर तो कभी रोकेट दागकर वो सीमा पर हालात को खराब बनता रहता है। हो सकता है हमारे सियासतदा उसे एक सबक सिखाना चाहते हों। लेकिन यह तरीका सही नहीं हैं भाई। खेल को सियासत में घसीटना ठीक नहीं है।

Friday, January 15, 2010

नाटक जारी है कसाब का


इसे इस देश के कानून व्यवस्था की विडम्बना नहीं तो और क्या कहेंगे। एक आतंकी जिसके ऊपर सैकड़ों बेगुनाहों का खून बहाने का इलज़ाम है पिछले साल भर से हमारा सरकारी मेहमान बना बैठा है। अनुमान के मुताबिक उसके ऊपर अभी तक लाखों रुपये खर्च किये जा चुके हैं । इसके बावजूद इस केस में हम कितना आगे जा पाए हैं। सारे सुबूत उसके खिलाफ हैं। सैकड़ों लोगों की गवाही हो चुकी है। पर ज़रा इस आतंकी की गुस्ताखी तो देखिये, वह बार बार अपने बयान बदल कर केस को उलझा रहा है। उसकी इसी हरकतों से आजिज आकर सरकारी वकील उज्जवल निकम ने उसे नौटंकीबाज तक कह डाला। शुरू में उसने कहा कि उसका पाकिस्तान से कोई रिश्ता नहीं है। एक समय के बाद यह भी साबित हो गया कि वह पूरा पाकिस्तानी है। उसके घर, माता पिता और उसकी आतंकी ट्रेनिंग लेने की बातें तक खुल कर सामने आ गयीं।
इसके बाद कसाब ने कई नाटक खेले। कभी वह कहता कि उसे खाना ठीक नहीं मिल रहा। कभी कहता उसे अंग्रेजी-मराठी समझ में नहीं आती। फिर उसने पाकिस्तानी वकील की व्यवस्था किये जाने की बात कही। वक्त बीतता रहा, कसाब की नौटंकी जारी रही। कभी बरामदे में टहलने की आज़ादी मांगता तो कभी akhbaar aur maigzeen. यहाँ तक कि उसने कबाब भी माँगा। कोर्ट में सुनवाई के dauran उसने अपने सामान पहचानने से भी इंकार कर दिया। उसने कहा की वह तो मुंबई घुमने आया था।
इन दिनों कसाब ने फिर यू टर्न लिया है। उसने कहना शुरू किया है कि मुंबई अटैक्स से उसका कोई वास्ता नहीं है। वह कह रहा है कि जिस वक्त अटैक हुआ तब वह पुलिस की गिरफ्त में था। अब १५ जनवरी को उसने फिर एक बार कहा की वह मुंबई अटैक्स के बारे में कुछ नहीं जानता। कसाब की इन बातो से गुस्साए वो पुलिस वाले उस घडी को कोस रहे हैं जब उन्होंने कसाब को जिन्दा रखने का फैसला किया था।

वास्तव में कसाब सिर्फ एक आतंकी नहीं बल्कि हमारी कानून व्यवस्था पर एक तमाचा है। उसने अपनी करनी को अंजाम दिया। लोगों की जाने लीं, दहशत फैलाई और अब जेल में बैठा मेहमानवाजी का लुत्फ़ उठा रहा है। शर्म आती है।

Thursday, January 14, 2010

बच्चा कमीना कैसे है गुलज़ार साहब

ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं,
दांत से रेशमी डोर कटती नहीं,
उम्र कब की बरस के सफेद हो गयी,
कारी बदरी जवानी की छटती नहीं,
वल्ला ये धड़कन बढ़ने लगी है,
चेहरे की रंगत उड़ने लगी है,
डर लगता है तनहा सोने में जी, दिल तो बच्चा है।
जी हाँ फिल्म इश्किया का यह गाना इन दिनों खूब पापुलर हो रहा है। सूफियाना अंदाज़ के गुलज़ार साहब द्वारा लिखे गए इस गाने को उनके शिष्य विशाल भारद्वाज ने कम्पोज किया है। राहत फ़तेह अली खान कि कशिश भरी आवाज़ इस गाने को और भी खूबसूरत बनाती है। जब से सुना है सुनता ही जा रहा हूँ। गुलज़ार के शब्द, राहत की आवाज़ और किसी पुराने ज़माने की फिल्म की म्यूजिक का टच देती विशाल की कम्पोजिंग सब मज़ेदार लगते हैं। लेकिन सुनते सुनते एक जगह कुछ खटकता सा है। गाने की लाइन है
दिल सा कोई कमीना नहीं ।
बस यही, यही लाइन मुझे परेशान कर देती है। गुलज़ार साहब जिस दिल को बच्चा बताते हैं फिर उसी को कमीना कहते हैं । आखिर कैसे? यह कैसे हो सकता है? बच्चा तो हमेशा मासूम, प्यारा, भोला, और भगवान् की मूरत होता है, वो गाना याद है बच्चे मन के सच्चे, सारी जग के आँख के तारे
लेकिन गुलज़ार साहब ने तो दिल को बच्चा भी कहा और उसे कमीना भी कह दिया है
माफ़ कीजियेगा गुलज़ार साहब फैन तो मैं भी आपका हूँ, जंगल जंगल बात चली है के ज़माने से। पर बचपन पर कमीनेपन का ये इलज़ाम मुझसे बर्दास्त नहीं हो रहा है। आप जैसे बड़े गीतकार से ऐसी उम्मीद नहीं थी। वैसे अगर किसी को गुलज़ार साहब का इस गाने में बच्चे को कमीना कहने का लाजिक समझ में आ जाये तो कृपया मुझे भी जरूर बताये।




Wednesday, January 13, 2010

हाकी की तो हो गयी न ऐसी कि तैसी

हमारा नेशनल गेम क्या? हाकी । आठ ओलंपिक मेडल हमने किस गेम में हासिल किये जवाब एक बार फिर आयेगा हाकी। लेकिन ज़रा इसके खिलाडियों की दशा देखिये। शर्म से चेहरा लाल हो जायेगा। अफ़सोस उनका नहीं होता जो इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं। वर्ल्ड कप सर पर है। पूरी दुनिया के सामने देश कि इज्ज़त दांव पर लगी है और खिलाडी अभ्यास करने के बजाय मुंह फुलाये बैठे हैं। वजह हाकी इंडिया ने उनका पुराना पैसा नहीं चुकाया है । पैसा न मिलने को लेकर जिस तरह से हाकी खिलाडियों के बगावत की उसकी पैरोकारी मैं भी नहीं करता, लेकिन सवाल पैदा होता है कि आखिर इसकी नौबत आई ही क्यों? जो खिलाडी लगातार देश के लिए खेल रहा है। अपने हुनर से देश के लिए सम्मान अर्जित कर रहा है उसे देने के लिए हाकी इंडिया के पास पैसा ही नहीं है। एक दोस्त ने टिप्पणी की ऐसे सिर्फ इंडिया में ही हो सकता है।
अभी एक चैनल पर खबर चल रही थी कि हाकी इंडिया का खज़ाना भरा पड़ा है इसके बावजूद वह खिलाडियों को पैसे देने में आनाकानी कर रहा है। अगर यह सच है तो फिर इससे बड़ी शर्म कि बात क्या हो सकती है। शाहरुख़ खान ने सही ही कहा। हम अपने खिलाडियों को पैसे और सुविधाएँ तो दे नहीं पाते पर उम्मीद करते हैं कि वो गोल्ड मेडल ही जीतें। ये कैसे मुमकिन है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में हाकी तरफ पर खेली जा रही है भारत में गिने चुने ही तरफ मैदान हैं। इसके दूसरी उच्चस्तरीय सुविधाओं कि बात तो छोड़ दीजिये।
इस दौरान एक और बात सामने आई कि देश के लिए खिलाडियों को खेलना चाहिए। अरे भाई जब पेट ही न भरा हो तो देशप्रेम का जज्बा कहाँ से आएगा। जब इंटर में पढता था तो एक टीचर अक्सर एक कि लाइने सुनते थे। आप भी सुनिए,
तन की हवस मन को गुनाहगार बना देती है, बाग़ के बाग़ को बीमार बना देती है,
भूखे पेटों को देशभक्ति सिखाने वालों भूख इन्सान को गद्दार बना देती है।
ये जो पेट है न बड़ा पापी है। बड़े से बड़ा गुनाह करवा देता है। लेकिन बात सिर्फ पेट कि ही नहीं थी। खिलाडी तो देश के नाम पर अपने खर्चे पर भी खेलने को तैयार थे। बात थी हक़ कि। उस हक़ कि जिसे हाकी इंडिया कितने दिनों से दबाये बैठा था। खैर अब जब पूरा मामला सुलझ गया है तो उम्मीद करते हैं कि टीम वर्ल्ड कप में बेहतरीन प्रदर्शन से सारी कड़वी यादें भुला देगी । लेकिन हाकी की तो हो गयी न ऐसी कि तैसी।

Monday, January 11, 2010

चैनल को मौत की चाह रखने वाले की तलाश

ब्रिटेन के पॉप्युलर चैनल-4 और फैल्क्रम टीवी ने मैगजीनों में दिया है ऐड
इसे पढ़कर आप चौंक मत जाइएगा। यह पूरी तरह से सच है। वैसे सच बताऊँ यह तो अभी ट्रेलर है। देखते जाइये इसे नमूने अभी और आयेंगे। फिलहाल तो यह खबर पढ़िए और कल्पना कीजिये इसके भारतीय रूपांतरण की
'जरूरत है एक इसे व्यक्ति की, जो जानता हो कि उसे टर्मिनल इलनेस (लाइला बीमारी, जिससे मौत सुनिश्चित हो) है। उस पर हम ममी बनाने की मिस्त्र की प्राचीन तकनीक का इस्तेमाल करना चाहते हैं।' कुछ इसी तरह का ऐड ब्रिटेन के पॉप्युलर चैनल-4 और फैल्क्रम टीवी ने मैगजीनों में दिया है। दरअसल, चैनल-4 ममी बनाने की प्रक्रिया की लाइव डॉक्युमेंटरी बनाना चाहता है। 'डेली मेल' अखबार के मुताबिक, चैनल एक ब्रिटिश वैज्ञानिक के साथ मिलकर इस काम को अंजाम देना चाहता है। इस वैज्ञानिक का दावा है कि उन्होंने ममी बनाने की मिस्त्रवासियों की 3000साल पुरानी तकनीक का राज ढूंढ लिया है। इसका बड़ी संख्या में सूअरों पर सफल परीक्षण भी किया जा चुका है।

जानवरों पर टेस्टेड है यह प्रोसेस
विज्ञापन को पढ़कर 'इंडिपेंडंट' अखबार के एक रिपोर्टर ने फैल्कम टीवी के रिचर्ड बेलफील्ड से संपर्क साधा। रिपोर्टर ने खुद अपना शरीर ममी बनाने के लिए देने का ऑफर किया। तब बेलफील्ड ने बताया कि हम अगले कुछ महीनों तक आपकी फिल्म बनाना चाहेंगे ताकि समझ सकें कि आप कौन हैं और किस तरह के व्यक्ति हैं। हमने सूअरों पर ममी बनाने की इस प्रक्रिया का परीक्षण किया है। इस प्रॉजेक्ट के लिए तमाम वैज्ञानिक भी हमारे पास हैं। जहां यह प्रक्रिया की जाएगी, उस जगह के लिए ह्यूमन टिशू अथॉरिटी से अप्रूवल भी लिया जा चुका है।

म्यूजियम में रखी जाएगी ममी
बेलफील्ड ने बताया कि ममी बनाने के बाद बॉडी को म्यूजियम में रखा जा सकता है ताकि लोग ममी बनाने की प्रक्रिया को समझ सकें। हम ममी को दो-तीन साल तक रखकर देखेंगे कि यह प्रक्रिया इंसानों पर कितनी सफल हुई। इसके बाद उसका अंतिम संस्कार कर दिया जाएगा। हालांकि इस पूरे काम के लिए कोई रकम नहीं दी जाएगी लेकिन जो खर्च आएगा, उसे हम वहन करेंगे। बेलफील्ड ने दावा किया कि मिस्त्र वासी बहुत ही चालाक ऑर्गनिक केमिस्ट थे। ममी बनाने में वह जिन पदार्थों का इस्तेमाल करते थे, उनमें से एक को हमने खोज लिया है।

ममी में माहिर थे मिस्त्र के लोग
तीन हजार साल पहले मिस्त्र के लोगों को मृत व्यक्तियों के शरीर को संलेपन करके सैकड़ों वर्षों तक सुरक्षित रखने की कला में महारत हासिल थी। उनका मानना था कि मृत्यु के बाद बेहतर जिंदगी के लिए शरीर को इस तरह सुरक्षित करना जरूरी है। कई अन्य प्राचीन सभ्यताओं को भी ममी बनाने की कला आती थी लेकिन मिस्त्रवासियों द्वारा तैयार की गईं ममी ज्यादा समय तक सुरक्षित रहती थीं। माना जाता है कि मिस्त्र के लोग ममी बनाने के लिए जिस घोल का इस्तेमाल करते थे, वह सिर्फ बर्मा में मिलने वाले एक पदार्थ से तैयार किया जाता था। इस पदार्थ को मिस्त्रवासी 4000 मील दूर बर्मा से लाया करते थे।

पोस्टमॉर्टम दिखा चुका चैनल
चैनल-4 आठ साल पहले भी टीवी पर लाइव पोस्टमॉर्टम करवाकर सुर्खियों में आ चुका है। तब जर्मनी के डॉक्टर गंथेर वॉन हेजंस ने 72 साल के एक व्यक्ति का 500 लोगों के सामने एक थिएटर में पोस्टमॉर्टम किया था। इस पोस्टमॉर्टम से पहले डॉ. हेजंस को हेल्थ डिपार्टमेंट ने चेतावनी भी दी थी लेकिन उन्होंने इसे नजरअंदाज करके थिएटर में इस काम को अंजाम दे दिया था। पोस्टमॉर्टम की इस प्रक्रिया का चैनल-4 ने प्रसारण किया था। तब इस पर काफी बवाल हुआ था।