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Thursday, May 24, 2012


महंगाई बनी सौतन
 
झुलनी, नथुनी, कंगना सपना
सपना सैर सपाटा,
महंगाई को देखकर खुशियों ने कर ली जीवन से टाटा।

सजनी हैं हैरान सजनवा इतना पैसा पाते
फिर काहे को घर में चीजें थोड़ी-थोड़ी लाते
क्‍या कोई सौतनिया आ गई मेरे जीवन में?
सोचके उनके दिल में लग गया भारी कांटा।

सजना हैं हैरान, जुटाते तिनका-तिनका सामान
सह रहे झिड़की और अपमान
कितनी भी कंजूसी कर लें खर्च ना पूरा पड़ता
घरवाली के नखरे जैसी बढ़ती ये महंगाई

इसी बीच पत्‍नी ने आकर आशंका जतलाई
क्‍योंजी पैसा कहां खरचते, घर में चीज एक ना आई
सुनकर ये बातें सजना ने पीट लिया है माथा
तुम्‍हें नहीं मालूम है कितनी बढ़ गई महंगाई?

रोज-रोज तो दाम हैं बढ़ते, पर ना कमाई बढ़ती
100 रुपए में भी अब तो सब्‍जी कम ही चढ़ती
तुम्‍हीं बताओ इतने पैसे में मैं कितना ला पाता
कहते-कहते भैया जी को आने लगी रुलाई

सुनकर सबसे पहले तो पत्‍नी थोड़ा सा मुस्‍काई
पतिदेव के समझ में लेकिन बात नहीं ये आई
मैं नाहक शक कर बैठी तुमपर, सोचा कोई सौतन है
पर इस युग में तो मेरी सौत बनी महंगाई

कार्टून- साभार
 

Wednesday, May 9, 2012

बारिश और 'मिनी मुंबई' में मैजिक का सफर


रीगल टू एलआईजी वाया पलासिया

बारिश मिजाज पर बहुत असर डालती है। आसमान से बूंदें जब जिस्म पर गिरती हैं तो वाकई मिजाज खुश हो जाता है। लेकिन जैसे ही यह बूदें जमीन पर गिरकर कीचड़ बनाती हैं सारा मिजाज बेकार हो जाता है। कल शाम की बारिश ने भी शहर के साथ-साथ मेरे मिजाज पर असर डाला। करीब चार बजे से शुरू हुआ गरज-चमक का सिलसिला बूंदा-बांदी और फिर मूसलाधार बारिश में तब्दील हो गया। अपने कमरे में अनमना सा बैठा मैं बारिश रुकने का इंतजार कर रहा था, ताकि बाहर निकलकर कुछ घूम-घाम सकूं। हालांकि बारिश के बाद अफरा-तफरी और फिर कीचड़ के चलते थोड़ी हिचक भी हो रही थी। फिर कहीं पढ़ी एक लाइन याद आई कि बारिश किसी शहर की 'औकात' बता देती है।
इस बहाने को हथियार बनाकर मैंने नासाज तबियत को थोड़ा तसल्ली दी और निकल पड़े 'मिनी मुंबई' की पड़ताल करने।

निकलते ही कदम कीचड़ में
सिख मोहल्ला से निकलकर पलासिया के लिए मैजिक पकडऩे की प्लानिंग बनाई। मगर गली में कीचड़ देख मूड बिगड़ गया। सिर मुड़ाते ही ओले की जगह कदम निकालते ही कीचड़ में पांव की कहावत बन गई। खैर, इनसे जूझते गुरुद्वारे के करीब पहुंचे और खुशकिस्मती से तुरंत ही मैजिक मिल भी गई। इस बीच जगह-जगह जमा पानी और गाडिय़ों की बेतरतीबी देख अंदाजा हो गया कि सफर आसान नहीं होने वाला।

दुनिया की चिंता मैजिक में बैठकर
अभी मैजिक गांधी हॉल के करीब पहुंची थी कि बारिश तेज हो गई। हाथ बाहर निकालकर चखने की कोशिश की, मगर वो स्वाद नहीं मिला। बाहर बरसात और मैजिक में बातों की बारिश हो रही थी। एक अम्मा जी की चिंता जायज थी- चलो भगवान सबकी सुनता है। बरसात हो गई अब पानी की समस्या कुछ सुलझेगी। मगर इसके काउंटर में जो समस्या आई वह ज्यादा चिंताजनक थी। मैजिक में ही बैठे एक सज्जन ने सवाल उठाया, मगर उन किसानों का क्या जिनकी फसल बर्बाद हो जाएगी। फिर इसका असर गेहूं के दाम पर भी तो पड़ेगा। अचानक महंगाई का दानव और प्रबल होता दिखा और जिस बारिश का मैं लुत्फ उठाना चाह रहा था वह विलेन नजर आने लगी।

बदहाल ट्रैफिक, बेहाल लोग
शनिवार की शाम बारिश ने कईयों का मजा किरकिरा किया। ऑफिस से जल्दी घर जाकर फैमिली के साथ आउटिंग का प्लान भी फेल हुआ। वहीं बारिश के चलते ट्रैफिक भी बदहाल नजर आया। जगह-जगह पानी भर जाने से भी लोग परेशान हाल रहे। टीआई के आस-पास, छप्पन और पलासिया में सड़कों किनारे लगे पानी के चलते मुश्किलें थीं। जिनके पास अपने वाहन थे, वह भी और जो पब्लिक कनवेंस के भरोसे थे वह भी बेहाल। किसी भी तरह अपनी मंजिल तक पहुंचाने वाले वाहन पर लद जाने की बेकरारी और अफरातफरी दिखी।

'सिचुएशनल' गाली
पलासिया में मैंने एलआईजी के लिए मैजिक बदली, मगर हालात नहीं बदले। बाहर बरसात कभी कम तो कभी तेज हो रही थी। ऐसे में विजयनगर और देवास नाका जाने वालों की बेचैनी समझी जा रही थी। महिला सवारियों की हालत और मुश्किल थी। पलासिया से एलआईजी के बीच ऐसी सवारियां दिखीं। अपोलो के सामने एक बंदे ने परदेसीपुरा के लिए पूछा और जब मैजिक वाले ने विजयनगर बताया तो उसके मुंह से निकली गाली पूरी तरह सिचुएशनल थी। अभी तक सिनेमा में सबकुछ सिचुएशनल देखने की आदत रही, रियल लाइफ में यह अनुभव दिलचस्प रहा।

'मिनी मुंबई' की क्या औकात
खैर, मेरा सफर तो एलआईजी तक ही रहा, लेकिन मैजिक से बाहर निकलते ही जोरदार बारिश ने मेरा इस्तकबाल किया। अब तक अंदर बैठकर जिस नजारे का मैं लुत्फ उठा रहा था, अब उसका भुक्तभोगी था। वैसे मैं अकेले कहां था, तमाम लोग भीग रहे थे। कुछ शौकिया तो कुछ मजबूरन।
अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हुए मैं सोच रहा था, किस बात की 'मिनी मुंबई' यार! वही कीचड़, वही खराब ड्रेनेज सिस्टम। जब मेन रोड का यह हाल है तो अंदर की गलियों की बदहाली का आलम क्या होगा? तभी याद आया, बारिश में तो मुंबई भी बेहाल हो जाती है, फिर 'मिनी मुंबई' की क्या औकात?

Published in News Today on 6th May 2012

Sunday, May 6, 2012

बोलो साथी

बोलो साथी
तुम बिन जीना मुश्किल कैसे मर जाना आसान है क्यूँ
मिलने में बरसों लग जाते छुट जाना आसान है क्यूँ
बोलो साथी

बोलो साथी कैसे हैं ये मेल-मिलाप, जुडन-बिछुड़न
साथ हो तो सब अपने लगते दूर हो तो सब अनजान हैं क्यूँ 

बोलो साथी
हम-तुम सपनों की नगरी में कितनी बातें करते हैं
हाथों में हाथों को थामे मीलों चलते रहते हैं
मगर हकीकत की दुनिया में ये सब नाफरमान है क्यूँ
बोलो साथी

एक हमारे दिल हैं, धड़कन, जज्बातों में भाव हैं एक
एक हमारा नाता-रिश्ता, दिल भी एक, चाह भी एक
दो जिस्मों में एक ही दिल है, फिर हम दो इंसान हैं क्यूँ
बोलो साथी

इश्क तुम्हारा इश्क है मेरा, जान तुम्हारी मेरी जान
आँखों में तेरा चेहरा है, कानो में तेरी ही बात
सांसों में तेरी ही सांसें, फिर अलग-अलग पहचान है क्यूँ
बोलो साथी




Deepak Mishra