दीपक की बातें

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Thursday, October 6, 2011

कुछ करो कप्‍तान साहब

हाल ही में चैंपिंयंस लीग टी-२० में न्‍यू साउथ वेल्‍स से हारने के बाद चेन्‍नई सुपरकिंग्‍स के कप्‍तान महेंद्र सिंह धोनी का बयान था, 'चलो अब कुछ आराम तो मिलेगा।' किसी कप्‍तान के मुंह से सुनी जाने वाली सबसे खराब बात हो सकती है। इस बयान में धोनी की मजबूरी और हताशा दोनों छुपी है।
पिछले कुछ समय से धोनी का सितारा गर्दिश्‍ा में चल रहा है। उनके साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। जैसे वर्ल्‍ड कप जीतने के बाद उनका मिडास टच कहीं खो गया है। इंग्‍लैंड में लगातार हार मिली। वर्ल्‍ड कप विनिंग टीम के आधे से ज्‍यादा सूरमा घायल होकर टीम से बाहर हो चुके हैं। खुद टीम का सिपहसालार भी घायल है और आराम के लिए गुहार लगा रहा है। मगर फिलहाल आराम नहीं है। अब फिर से अंग्रेज पधार चुके हैं।
धोनी को शायद इस बात का अहसास नहीं है कि वह सिर्फ मैच नहीं हार रहे हैं, बल्कि लोगों का विश्‍वास, यकीन, इज्‍जत, सम्‍मान और स्‍टारडम भी गंवा रहे हैं। वर्ल्‍ड कप के साथ जिस तरह थोक के भाव में धोनी मैच हार रहे हैं वह उनकी काबिलियत पर सवाल खड़ा कर रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि धोनी थोड़े दिन आराम करके रीचार्ज हो लें। इसके बाद फिर से वह जीत के मिशन पर निकलें।

Sunday, September 25, 2011

आधी रात, गंगा और गुलाम अली

12 बजने में अभी 10 मिनट बाकी हैं। इसके बावजूद आनंदेश्‍वर की गलियों में चहल-पहल थी। इसकी सबसे बड़ी वजह सोमवार का दिन। बाबा के भक्‍तजनों का तांता लगा हुआ है। श्रद्धा का सैलाब उमड़ा है। कुछ भक्‍त बड़ी गाडि़यों में आए हैं, शायद गाड़ी का आकार थोड़ा और बड़ा करने की आरजू होगी मन में। कुछ पैदल आए हैं। घर से चले थे कुछ और कामनाएं थीं। बाबा के दरबार में कुछ बिगड़ी संवारने की गुहार लगाने आए थे। गाड़ी वालों को देखकर प्रार्थनाओं में एक और प्रार्थना का इजाफा हो गया। भगवान एक गाड़ी भी दिला दे।

उधर मंदिर की गली में भिखारियों का रेला लगा है। श्रद्धालुओं से एक-दो रुपए पा जाने की आस में उनके लिए दुआओं की झोली खाली कर डाल रहे हैं। हैरानी होती है कि ये भी किससे मांग रहे हैं? उससे, जो खुद भगवान से मांगने आया है। दुनिया की रीत है। एक भिखारिन अपनी दिन भर की जमा-पूंजी समेट रही है। गठरी बनाकर उसे सिरहाने बड़े जतन से रखती और उसी पर सिर रखकर सो जाती है। मेरे मन में सवाल उठता है, भगवान के दरबार में भी इतना डर। मगर वह शायद प्रैक्टिकल है। भगवान उसके लिए एक साधन मात्र हैं। उसे बस इतना पता है कि अगर भगवान नहीं होंगे तो भक्‍त यहां नहीं आएंगे और जब भक्‍त नहीं आएंगे तो उसका पेट भरना मुश्किल हो जाएगा।

इस सारे नजारे के बीच मैं अपने दो वरिष्‍ठ साथियों मयंक जी और पुनीत जी के साथ गंगा के घाट की तरफ चला जा रहा हूं। यह प्रोग्राम भी कोई तयशुदा नहीं था। खाना खाते-खाते अचानक बन गया था। घाट की तरफ मिलने से पहले मयंक जी का प्रस्‍ताव आता है, ठंडाई पियोगे। अचानक दो साल पहले का वाकया याद आ जाता है। तब मैं यहां नया था। एक रात ऐसे ही कुछ वरिष्‍ठों के साथ ठंडाई पीने का प्रोग्राम बना था। कुछ लोगों ने भांग वाली ठंडाई पी। मुझसे तो बताया गया कि तुम्‍हारी ठंडाई में भांग नहीं है, पर पता नहीं क्‍यों मुझे यकीन नहीं हुआ। रूम पर लौटा तो रात के 3 बजे तक हंसता ही रहा था।

खैर, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। ठंडाई पीने के बाद हम गंगा जी के घाट पर पहुंच गए। बरसात के पानी से उफनाई गंगा जी। आधी रात का वक्‍त। लहरें खामोश, मगर फिर भी उपस्थिति का आभास कराती हुईं। थोड़ा सा कोलाहल करते हुए। पार्श्‍व में भी कोलाहल तेज है। फिल्‍मी धुनों पर तैयार किए गए भक्ति गीत बज रहे हैं। घाटों के ठीक पीछे बने टीनशेड में कुछ साधु आराम करते हुए। कुछ मुसाफिर भी हैं शायद।

तभी मेरी मोबाइल में गाना बजता है, 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है'। गुलाम अली की मदभरी आवाज इस माहौल में एक अलग ही समां बांधने लगी। गुलाम अली के सुर बुलंद हो रहे हैं, गीत रफ़्तार पकड़ रहा है,
'चोरी-चोरी हमसे आकर, तुम मिले थे, जिस जगह, मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है।'
मानों पीछे से आ रहे भक्ति गीतों का शोर, सामने गंगा की लहरों का कोलाहल और गुलाम अली के सुर जुगलबंदी करने लगे हों। एक अलग तरह का फ्यूजन। हम तीनों में से कोई बोल नहीं रहा है। बस सभी उस माहौल को जितना भी हो सके जी लेना चाहते हैं। मगर शायद पुनीत जी इस माहौल को यहीं छोड़ देने के मूड में नहीं। वह अपने मोबाइल से इस नजारे को कैद करने में लगे हैं।

करीब आधे घंटे का वक्‍त बीत चुका है। मन उठने को तैयार नहीं हो रहा। थोड़ी देर इस पल को और जी लेने को जी चाह रहा है, मगर सुबह ऑफिस जाना है। काम करना है। टेंशन-टेंशन। अचानक से रूहानी पल की खूबसूरती छू होने लगती है। हम उठकर चल पड़़ते हैं। गली में भी अब शोर थमने लगा है।

Friday, September 16, 2011

'दीवार' से मेरा प्‍यार


शुक्रवार को राहुल द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट को अलविदा कह दिया। हालांकि वनडे से द्रविड़ को पहले ही दूर कर दिया गया था, फिर भी उन्हें आखिरी बार बैटिंग करते हुए देखना खासा भावुक करने वाला पल था। खासकर मेरे जैसे डाईहार्ड फैन के लिए। फिर भी मैं मानता हूं कि द्रविड़ इस मायने में लकी हैं कि उन्हें कम से कम फेयरवेल मैच खेलने का मौका तो मिला। हालांकि इसका एक पहलू और भी है कि इस वक् भारत को वाकई उनकी जरूरत थी क्योंकि इस इंग्लैंड दौरे पर वही एकमात्र बल्लेबाज थे जो सफल हो पाए थे। द्रविड़ ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ऐलान कर दिया कि यह सिरीज उनकी आखिरी वनडे सिरीज होगी।

मुझे आज भी 1996 का वह दिन याद है। मेरे ऊपर क्रिकेट का खुमार चढ़ना शुरू हो चुका था। अपने से बड़ी उम्र के गांव के लड़कों के साथ जो कि क्रिकेट के दीवाने थे, मैं क्रिकेट की चर्चा किया करता था। इस बात के लिए मुझे कई बार तारीफ, मगर उससे ज्यादा बार आलोचना झेलनी पड़ती। दरअसल गलती आलोचना करने वालों की भी नहीं थी। कक्षा छह में पढ़ने वाले से लोगों से बहस लड़ाने के बजाए, पढ़ाई में ध्यान देने की उम्मीद की जाती है। खैर, यह बातें फिर कभी। फिलहाल सारी बातें सिर्फ और सिर्फ मेरे हीरो द्रविड़ के बारे में।

3 अप्रैल 1996 के दिन भारत का श्रीलंका से मैच था। घर पर मैच देखने की सुविधा नहीं थी, और रेडियो पर चाचा जी कमेंटरी सुन रहे थे। उनके साथ कमेंटरी सुनने का दूर-दूर तक कोई चांस नहीं था। आखिरकार मैंने एक तरीका निकाला और किसी तरह घर से छुपकर निकला और अपने पड़ोसी के घर पहुंच गया। वहां पर मेरे पड़ोसी जो कि रिश्ते में चाचा थे, कमेंटरी सुन रहे थे। मैं भी उनके साथ बैठ गया। सचिन और अजहर का विकेट गिरने पर चौथे नंबर बैटिंग करने के लिए एक नया लड़का राहुल द्रविड़ आया। कमेंटेटर्स के मुंह से राहुल के लिए हमने काफी तारीफ सुनी। यहीं से इस नाम के प्रति मुझे एक अजीब तरह का लगाव पैदा हुआ। इसकी कई वजहें थीं। दरअसल इतिहास की किताब में मैंने द्रविण सभ्यता के बारे में सुना था। राहुल द्रविड़ का नाम सुनकर सोचा कहीं यह द्रविण सभ्यता से तो नहीं आया है। बहरहाल यह तो बचपन की समझ का कुसूर था। खैर वह दिन द्रविड़ का नहीं था और सिर्फ 3 रन बनाकर आउट हो गए। हालांकि बाद में उन्होंने फील्डिंग करते हुए दो कैच पकड़े और इंडियन टीम ने वह मैच भी जीता था।

अगले दिन अखबारों में राहुल द्रविड़ की फोटो ढूंढ रहा था, पर उन्होंने उस मैच में ऐसा कुछ खास किया नहीं था कि उनकी फोटो छपती। बाद में जब घर पर टीवी आई तो फिर राहुल द्रविड़ की बैटिंग देखने को मिली। फिर तो मैं उनका मुरीद होता चला गया। द्रविड़ की स्टाइल को लेकर अक्सर मेरी दोस्तों से लड़ाईयां भी हुई हैं। उन्हें ठुकठुक बल्लेबाज बताकर उनकी खिंचाई करते और मुझसे यह बर्दाश् नहीं होता। खैर, आने वाले वक् में द्रविड़ ने साबित किया कि वह तेजी से रन भी बना सकते हैं। आज भारत की तरफ से दूसरा सबसे तेज पचासा लगाने वाले द्रविड़ ही हैं।

वनडे में द्रविड़ की जगह लेने के लिए कई चेहरे हैं। विराट कोहली से लेकर, रोहित शर्मा, अजिंक्या रहाणे, एस बद्रीनाथ समेत कई नाम हैं। मगर असली समस्या तब शुरू होगी जब द्रविड़ टेस् से संन्यास लेंगे। वहां पर उनकी जगह लेने वाले खिलाड़ी को वाकई बड़े टेस् देने होंगे। बहरहाल जो खिलाड़ी हैं उनमें मैं चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली को उनकी जगह लेने के लिए आदर्श मानता हूं। मेरा मानना है कि इन दोनों में इतनी पोटेंशियल है कि वे द्रविड़ की जगह भर सकते हैं।

Saturday, September 10, 2011

फेसबुक पर लिख्‍ात-पढ़त

तुम्‍हारे आगोश में एक सदी का वक्‍त, जैसे एक लम्‍हें में गुजरा
शाम कतरा-कतरा ढलती रही, जिंदगी हमारे दरमियां सिमटती रही
 
तुम्‍हारी निगाहें हमें बुला रही थीं,
अदाएं तो बस कयामत ढा रही थीं
हर हुकूमत से लड़ जाएंगे,
इश्‍क किया तो ये हुनर सीखा है

तुम्‍हारा वजूद, मेरे जज्‍बात सलामत रहें,
तुम्‍हें नजर ना लगे, हमारा प्‍यार सलामत रहे
दो लफ्ज काफी नहीं हमारी मोहब्‍बत बयां करने के लिए
तुम चाहे कुछ भी कर जाओ, मैं तुम्‍हें यूं ही चाहता रहूंगा
(भारत की लगातार हार के बावजूद क्रिकेट का मोह नहीं छोड़ पाने पर)
नज़र से गुफ्तगू की कभी ज़बां नहीं खोली,
इज़हारे-ए-इश्‍क की ये अदा भी खूब रही।
कयासबाजियों में ही बीता वो दौर मोहब्‍बत का,
हम सही समझे तो भी ग़लत और ग़लत समझे तो भी ग़लत।
अरे फेसबुकिए मित्र, तुम बड़े अजनबी से लगते हो
कोई स्‍टेटस लाइक नहीं करते, कभी कमेंट नहीं करते
मोहब्‍बत की, प्‍यार की बातें
बेकार हैं इश्‍क के इजहार की बातें
जब मैं तुम्‍हारे ख्‍वाबों ख्‍यालों से दूर चला जाऊंगा
याद करना चाहोगी मुझे, पर मैं याद भी ना आऊंगा
अजीब पशोपेश से गुजर रहा हूं इन दिनों,
ना तुम्‍हारी याद आती है, ना तुम्‍हारा ख्‍याल जाता है
(इंग्‍लैंड में भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन पर )
जिनके लिए मैंने रात की नींद कुर्बान कर दी
कम्‍बख्‍त मुझे दो पल की खुशी भी ना दे सके
(टी-20 में टीम इंडिया की हार पर )
वो मुस्कुराएँ तो दिल को कुछ सुकून मिले
पर वो जाने किस जन्म का बैर ठाने बैठे हैं.
कई दिनों से वो मेरी तरफ नहीं आये
कई दिनों से हम उनकी गली से नहीं गुज़रे
कई दिनों से निगाहों ने देखा नहीं उनको
खुदा खैर करे, उन्हें किसी की नज़र ना लगे.
सुना था तुम्हारे शहर में बेदर्द रहते हैं
आज हमको भी इस बात का अंदाज़ा हो गया.
जुदा होकर भी उसका अहसास दिल में अभी बाकी है,
उसके वजूद को हम ख्यालात में भी महसूस करते हैं.
फिर किसी मोड़ पर मुलाकात हो जाने की आस में,
हम उनकी मोहब्बत का दिया दिल में जलाये फिरते हैं.
ना साथी ना सहारा है,
ज़िन्दगी तनहा बंजारा है
निगाहें ढूँढती हैं चेहरा कोई पहचाना,
मगर इस भीड़ में हर शख्स अनजाना है.
 

Saturday, August 20, 2011

गुलजार के साथ सावन-१

गुलजार, मुकम्‍मल शायरी की एक मुकम्‍मल तस्‍वीर। जमाना बदल गया। संगीत की ताल बदल गई, मगर कुछ नहीं बदला तो वो एक हैं गुलजार। दो पीढि़यों पहले जो नजाकत और नफासत उनके शब्‍दों में थी, अब वो और बढ़ गई है। उनके अल्‍फाजों की अदाकारी पहले से ज्यादा शानदार हो गई है। पिछले दिनों उनका जन्‍मदिन था। इधर सावन भी अपने शबाब पर है तो नजर गई गुलजार के कुछ ऐसे नगमों पर जो सावन की अठखेलियों से सराबोर हैं।

वो ख्‍यालों की आवारगी, वो शब्‍दों की जुंबिश, वो भावनाओं का उतार-चढ़ाव कहां से लाते हैं। वो आशिकी, वो मौसिकी सब कहां रखते होंगे। कई बार जेहन हैरान होता है कि झक सफेद लिबास पहनने वाला वो शख्‍स शब्‍दों को इतनी रंगीनियत, ग़ज़लों को इतनी रूमानियत कैसे दे पाता होगा। अब तक आपको अंदाजा हो चुका होगा कि यहां जिक्र किसका हो रहा है। जी हां, गुलजार साहब। उनकी कलम से निकले अल्‍फाजों ने जाने कितनों को दीवाना बना रखा है। किसी एक गीत का जिक्र करना तो गुनाह होगा और अगर सबके जिक्र करने बैठूं तो शायद लिख ही ना पाऊं। मगर जब बात निकली है तो उसे पूरा करने के लिए तो कुछ नगमों का सहारा लेना ही पड़़ेगा। फिल्‍म 'प्रेम पत्र' का वो गीत 'सावन की रातों में ऐसा भी होता है, राही कोई भूला हुआ तूफानों में खोया हुआ राह पे आ जाता है।' लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज में यह यूं तो प्रणय गीत है, मगर जरा इसके मायने गहराई से समझें तो पता चलता है कि कितनी बड़ी बात कह दी गई है।
बात सावन की चली है तो आइए गुलजार साहब के कुछ और नग़मों की बारिशों में भीग लें। फिल्‍म 'बीवी और मकान' का गीत 'सावन में बरखा सताए' भी एक बेहतरीन नगमा है। १९६८ में आई हृषिकेश मखर्जी की फि‍ल्‍म 'आर्शीवाद' का गीत 'झिर-झिर बरसे सावन अंखियां' भला कैसे भूला जा सकता है।
बरसात को भी सावन का एक हिस्‍सा ही माना जाता है, तो बरसात पर उनका लिखा फि‍ल्‍म 'बसेरा' का गीत 'जाने कैसे बीतेंगी ये बरसातें' भी एक बेहतरीन गीत है। वहीं १९८१ में आई फि‍ल्‍म 'नमकीन' का गाना 'फ‍र‍ि से आइयो बदरा विदेशी, तेरे पंखन में मोती जड़ूंगी' भी एक शानदार गीत है। इसमें नायिका बादल को पहले तो आमंत्रण देती है, लालच देती है, उससे तलैय्या किनारे मिलने का वादा भी करती है और फ‍र‍ि उसे काली कमलीवाले की कसम भी देती है। इसी फिल्‍म का एक और गीत 'बड़ी देर से मेघा बरसे हो रामा' भी है। दोनों ही गीतों को आशा भोंसले ने आवाज दी है।

सावन और बरसात पर गुलजार साहब के अभी कई गीत होंगे। तलाश जारी रहेगी, आपसे भी गुजारिश है कि अगर आपके जेहन में कुछ ऐसे गीत हों तो उसका जिक्र कमेंट बॉक्‍स में करें।

Wednesday, May 4, 2011

जब पहुंचा ओसामा ऊपर

ओसामा बिन लादेन मरने के बाद ऊपर गया. ऊपर भी बहुत तेजी के साथ ओसामा के मारे जाने कि खबर फ़ैल गयी. बल्कि वहां तो और पहले से ही लोगों को मालूम हो चुका था कि ओसामा मारा जाने वाला है. यह बात मालूम पड़ते ही सभी आत्माओं ने तैयारियां शुरू कर दी थीं, उसे देखने की. "ऊपरवाला सबसे तेज" नाम का न्यूज़ चैनल पल-पल की खबरे लोगों तक पहुंचा रहा था. "जहन्नुम लाइव" नाम का न्यूज़ चैनल तो और भी तेज है. उसने अपने एक रिपोर्टर को यमदूतों के साथ धरती पर भेज दिया. टीआरपी की लड़ाई में आगे रहने की ये उसकी चाल थी. वहीँ "नरक टाएम्स" और "अंधेरा अमर रहे" जैसे कुछ अखबार भी ओसामा की ख़बरों से रंगे पड़े थे।




खैर, नरक पुरम और स्वर्ग पुरम दोनों मोहल्लों के हर घर में तैयारी चल रही थी। हर आत्मा ओसामा को देखने जाना चाहती थी. एक महिला आत्मा अपने पति आत्मा से कह रही थी, ये जी, नई साडी ला दीजिये ना. इतना नामी गिरामी आदमी आ रहा है ऊपर उसे देखने जायेंगे, तो थोडा अच्छा कपडा चाहिए ना.




कुछ सम्मानित ढंग कि आत्माएं एक जगह जुटी हुई थी। चेहरे पर चिंता की लकीरे. तभी एक सज्जन पुरुष आत्मा वाला बोलटी हैं. हमें यमराज महोदय से बात करनी होगी. ऐसे खतरनाक और कलुषित मानसिकता के व्यक्ति को हम जहन्नुम में भी बर्दास्त नहीं करेंगे। उसके लिए स्पेशल सेल बनायीं जाए. उसे सबसे अलग रखना चाहिए.




एक और जगह पर कुछ और आत्माएं जुटी हुई थीं। सबके चेहरे पर एक तरह का सुकून है. कुछ ख़ुशी सी है. एक दुष्ट पुरुष आत्मा आगे आके बोलना शुरू करती है. कितने दिनों से इस शुभ घडी का इंतज़ार था. जो मिशन धरती पर अधूरा रह गया, उसे हम यहाँ पूरा करेंगे. हमारा आका आ रहा है. उसके स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. हर इंतज़ाम ढंग से और पूरा होना चाहिए.




यमराज सबसे ज्यादा परेशान। कुछ दूतों ने पूछा क्या बात है महाराज, तो भड़क गए. क्या बताएं कि तीन दिन से सीआईऐ और आईएसआई एजेंटों की आत्माओं ने परेशान करके रखा है. कह रहे हैं कि ओसामा की आत्मा के यहाँ आते ही हमारे हवाले कर दो. अब बताओ भला मैं क्या करूं.




जब ओसामा ऊपर पहुंचा तो एकदम परेशान। बोला हमको वापस पाकिस्तान भेज दो...............




Wednesday, April 6, 2011

मेरे पास कप है



सचिन तेंदुलकर और वर्ल्ड कप , एक सपना, एक ख्वाहिश, एकसक. हाइड एंड सीक से भरी एक ऐसी दास्तान जिसमें दिल तोड़ देने वाले कई लम्हे भी आए. ब्रायन लारा से उनका कंपैरिजन किया गया। कहा गया डॉन ब्रैडमैन उनसे बेहतर बैट्समैन थे. आज अगर ब्रायन लारा कहें कि मेरे पास टेस्ट क्रिकेट में 400 रनों की इनिंग्स का रिकॉर्ड है तो सचिन भी फख्र से कह सकते हैं, मेरे पास कप है।


जहां देखा था सपना, वहीं हुआ पूरा सचिन का वर्ल्ड कप ड्रीम पूरा हुआ। वहीं, जहां से उन्होंने यह सपना देखना शुरू किया था। उसी मुंबई की सरजमीं पर, जहां सचिन ने क्रिकेट की एबीसीडी सीखी थी। सचिन खुद कहते हैं, ‘जब मैं बच्चा था तो मैं इस सपने के साथ बड़ा हुआ कि एक दिन वर्ल्ड कप हाथ में उठाउंगा।’ 1989 में सचिन ने क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद उन्हें 1992 में पहला वल्र्ड कप खेलने का मौका मिला. न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर हुए इस वर्ल्ड कप में सचिन ने शानदार बैटिंग की थी। सात मैचेज में उन्होंने 283 रन बनाए थे, मगर टीम इंडिय का सफर पहले राउंड में ही खत्म हो गया।


1996 का दर्द


अब 1996 की बारी थी। भारत, श्रीलनका और पाकिस्तान इस वर्ल्ड कप के होस्ट थे। अपनी जमीन पर खेले गए इस मुकाबले में पूरी उम्मीद थी कि टीम इंडिया विजेता बनेगी। जब सफर सेमीफाइनल त· पहुंचा तो सचिन का बचपन का सपना पूरा होता लगा. मगर शायद अभी और इंतजार बाकी था. सेमीफाइनल में श्रीलंका से हार के साथ इंडिया का वर्ल्ड कप में सफर खत्म हो गया. सचिन के बालसखा आंसुओं में डूब गए और पूरा देश गम के सागर में। सचिन ने 7 मैचेस में 523 रन बनाए थे।


1999 का वर्ल्ड कप


ख्वाब आगे-आगे भाग रहा था और सचिन ख्वाबों ·ा पीछा ·रने में लगे हुए थे, 1999 का वर्ल्ड कप आ गया था। इंग्लैंड की धरती पर अजहरुद्दीन की कप्तानी में इंडियन टीम पहुंच चुकी थी। मगर साउथ अफ्रीका और जिंबॉब्वे के हाथों मिली हार ने टीम का आगाज खराब कर दिया। जिंबॉब्वे के मैच से पहले सचिन को वापस इंडिया आना पड़ा. वह अपने पिता को खो चुके थे. इस नाजुक क्षण में भी सचिन नहीं टूटे और वापस लौटकर अगले मैच में केन्या के खिलाफ सेंचुरी बनाई. टीम किसी तरह सुपर सिक्स तक तो पहुंची, मगर सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी। सचिन ने 7 मैचेस में 253 रन बनाए थे.


2003 की कसक


अगला वर्ल्ड कप साउथ अफ्रीका की सरजमीं पर 2003 में खेला गया. यह एक ऐसा वर्ल्ड कप था, जहां सचिन का सपना पूरा तो नहीं हुआ पर वह इसके काफी करीब तक पहुंच गए थे. फाइनल में कंगारुओं के खिलाफ मिली हार ने एक बार फिर उन्हें मायूस कर दिया. सौरव गांगुली की कप्तानी और सचिन की टूर्नामेंट में शानदार बैटिंग के बावजूद टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा. सचिन ने इस वर्ल्ड कप में 11 मैच में 673 रन बनाए. वेस्टइंडीज में 2007 में हुआ वर्ल्ड तो टीम इंडिया के लिए एक भूल जाने वाला डरावना ख्वाब साबित हुआ. पहले ही मैच में बांग्लादेश के खिलाफ मिली हार के बाद टीम उबर नहीं सकी। पहले ही राउंड से टीम बाहर हो गई. पर्सनल लेवल पर भी सचिन के लिए टूर्नामेंट यादगार नहीं रहा, 3 मैचेस में वह सिर्फ 64 रन ही बना सके ।


एंड ही इज चैम्पियन


मगर कहते हैं ना कि इंतजार का फल मीठा होता है. आखिर सचिन का सपना पूरा हुआ. वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उन्होंने चूमने का स्वाद उन्होंने महसूस किया. इस बीच ना जाने कितने कसैले एक्सपीरियंस हुए, मगर सचिन ने अर्जुन की तरह सिर्फ वर्ल्ड कप पर निगाह जमाए रखी और आज वह उनके पास है।



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