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Saturday, August 20, 2011

गुलजार के साथ सावन-१

गुलजार, मुकम्‍मल शायरी की एक मुकम्‍मल तस्‍वीर। जमाना बदल गया। संगीत की ताल बदल गई, मगर कुछ नहीं बदला तो वो एक हैं गुलजार। दो पीढि़यों पहले जो नजाकत और नफासत उनके शब्‍दों में थी, अब वो और बढ़ गई है। उनके अल्‍फाजों की अदाकारी पहले से ज्यादा शानदार हो गई है। पिछले दिनों उनका जन्‍मदिन था। इधर सावन भी अपने शबाब पर है तो नजर गई गुलजार के कुछ ऐसे नगमों पर जो सावन की अठखेलियों से सराबोर हैं।

वो ख्‍यालों की आवारगी, वो शब्‍दों की जुंबिश, वो भावनाओं का उतार-चढ़ाव कहां से लाते हैं। वो आशिकी, वो मौसिकी सब कहां रखते होंगे। कई बार जेहन हैरान होता है कि झक सफेद लिबास पहनने वाला वो शख्‍स शब्‍दों को इतनी रंगीनियत, ग़ज़लों को इतनी रूमानियत कैसे दे पाता होगा। अब तक आपको अंदाजा हो चुका होगा कि यहां जिक्र किसका हो रहा है। जी हां, गुलजार साहब। उनकी कलम से निकले अल्‍फाजों ने जाने कितनों को दीवाना बना रखा है। किसी एक गीत का जिक्र करना तो गुनाह होगा और अगर सबके जिक्र करने बैठूं तो शायद लिख ही ना पाऊं। मगर जब बात निकली है तो उसे पूरा करने के लिए तो कुछ नगमों का सहारा लेना ही पड़़ेगा। फिल्‍म 'प्रेम पत्र' का वो गीत 'सावन की रातों में ऐसा भी होता है, राही कोई भूला हुआ तूफानों में खोया हुआ राह पे आ जाता है।' लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज में यह यूं तो प्रणय गीत है, मगर जरा इसके मायने गहराई से समझें तो पता चलता है कि कितनी बड़ी बात कह दी गई है।
बात सावन की चली है तो आइए गुलजार साहब के कुछ और नग़मों की बारिशों में भीग लें। फिल्‍म 'बीवी और मकान' का गीत 'सावन में बरखा सताए' भी एक बेहतरीन नगमा है। १९६८ में आई हृषिकेश मखर्जी की फि‍ल्‍म 'आर्शीवाद' का गीत 'झिर-झिर बरसे सावन अंखियां' भला कैसे भूला जा सकता है।
बरसात को भी सावन का एक हिस्‍सा ही माना जाता है, तो बरसात पर उनका लिखा फि‍ल्‍म 'बसेरा' का गीत 'जाने कैसे बीतेंगी ये बरसातें' भी एक बेहतरीन गीत है। वहीं १९८१ में आई फि‍ल्‍म 'नमकीन' का गाना 'फ‍र‍ि से आइयो बदरा विदेशी, तेरे पंखन में मोती जड़ूंगी' भी एक शानदार गीत है। इसमें नायिका बादल को पहले तो आमंत्रण देती है, लालच देती है, उससे तलैय्या किनारे मिलने का वादा भी करती है और फ‍र‍ि उसे काली कमलीवाले की कसम भी देती है। इसी फिल्‍म का एक और गीत 'बड़ी देर से मेघा बरसे हो रामा' भी है। दोनों ही गीतों को आशा भोंसले ने आवाज दी है।

सावन और बरसात पर गुलजार साहब के अभी कई गीत होंगे। तलाश जारी रहेगी, आपसे भी गुजारिश है कि अगर आपके जेहन में कुछ ऐसे गीत हों तो उसका जिक्र कमेंट बॉक्‍स में करें।

2 comments:

  1. बहुत सुंदर पोस्ट-गुलजार साहब पर कुछ भी लिखा जाय कम है.

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  2. बहुत बढि्यां, इसे आगे बढ़ाइए। गुलजार के गीतों पर विस्तार से लिखें। अच्छा लगेगा। मोरा गोरा अंग लइ ले से कमीने तक कुछ खोजिए।

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