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Wednesday, March 6, 2013

क्यों हार रहे हैं कंगारू

हैदराबाद टेस्ट हारने के बाद अचानक ऑस्ट्रेलियाई टीम की क्षमताओं पर सवाल उठने लगा है। हालांकि पिछले काफी समय से टीम में उठापटक चल रही है, लेकिन इस भारतीय दौरे कंगारू जितने कमजोर दिख रहे हैं, शायद पहले कभी नहीं दिखे। कंगारुओं के भारत के प्रदर्शन को अगर हाल ही अंग्रेजों के प्रदर्शन की रोशनी में रखकर देखें तो यह सवाल और मौजूं हो जाता है।  इंग्लैंड की टीम भारत को भारत की धरती पर पटखनी देकर गई थी।

एक विजेता की सबसे बड़ी खूबी यह होती है कि वह अपने विपक्षी की ताकत को ही उसकी कमजोरी बना दे। इंग्लैंड की टीम ने यही किया था। 'स्पिन का तोड़ स्पिन' के फॉर्मूले को अपनाकर अंग्रेजों ने भारत को बेबस कर दिया। इसके पीछे उनकी पूरी तैयारी थी। उन्होंने अपनी टीम में ग्रीम स्वान के साथ-साथ मोंटी पनेसर को भी शामिल किया था। इसके अलावा स्पिन खेलने की भी उन्होंने अच्छी-खासी प्रैक्टिस की थी। वहीं अगर कंगारुओं की टीम पर ध्यान दें तो उनके पास एक क्वॉलिटी स्पिनर की कमी है। हालांकि नाथन लियोन ने पहले मैच में अच्छी गेंदबाजी की, लेकिन दूसरे मैच में उन्हें कप्तान क्लार्क की अदूरदर्शी रणनीति का शिकार होकर बाहर बैठना पड़ा। इसके अलावा ऑस्ट्रेलियाई कप्तान माइकल क्लार्क की रणनीतिक गलतियों ने भी टीम का बेड़ा गर्क करने में अहम भूमिका निभाई। हैदराबाद टेस्ट में उनका टीम कांबिनेशन अजीब सा था। इसमें चार ओपनिंग बल्लेबाज थे, तीन ऑलराउंडर थे और जेवियर डोहार्थी जैसा स्पिनर था जो बरसों बाद वापसी कर रहा था।

डोहार्थी ने मैच में तीन विकेट तो लिए, लेकिन यह तीनों पुछल्ले बल्लेबाजों के थे। उनसे ज्यादा प्रभावी ग्लेन मैक्सवेल साबित हुए जिन्होंने मुरली विजय, धोनी, जडेजा और कोहली को आउट किया।
असल में देखा जाए तो यह ऑस्ट्रेलियाई टीम के साथ विडंबना ही है। आज तक वह कभी भी भारतीय धरती पर अपेक्षित सफलता हासिल नहीं कर पाई। कुछ बड़े नामों के संन्यास के साथ कंगारुओं के लिए मुश्किलें बढ़ती जा रही हैं। माइकल हसी, रिकी पोंटिंग, हेडन जैसे खिलाड़ी जा चुके हैं। आने वाले नए खिलाड़ी प्रतिभावान तो हैं, लेकिन उनके सामने अभी खुद को जमाने की चुनौती है। कंगारू हमेशा से मारक क्षमता वाले रहे हैं और इस बार उनमें इसी मारक क्षमता का अभाव नजर आ रहा है।

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