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Tuesday, February 12, 2013

रेडियो से अपना याराना

रेडियो से अपना याराना भी काफी पुराना है।  1995 का साल। मैं पांचवीं कक्षा में पढ़ता था। यहीं से मेरा रेडियो से दोस्ताना हुआ। मेरे चाचाजी के हाथ में परमानेंट रेडियो होता था और मैं परमानेंट चाचाजी के साथ। 1996 क्रिकेट विश्वकप के दौरान रेडियो से प्रेम और गहरा हुआ और गहराता ही चला गया। बाद में इस प्रेम की परिणति क्रिकेट से अथाह लगाव के रूप में हुई।

चाचाजी के साथ सुबह का समाचार, प्रादेशिक समाचार, बीबीसी हिंदी, फिल्मी नगमे, दोपहर को आने वाले भोजपुरी गीत, क्रिकेट कमेंट्री सब सुनता रहता था। जब चाचाजी खेतों की देखभाल करने उधर जाते तो रेडियो साथ ही लेकर जाते। मैं स्कूल से वापस आता और चाचाजी को घर पर नहीं पाता तो बेचैन आत्मा की तरह मैं भी खेतों की तरफ चल देता। हालांकि इस चक्कर में कई बार चाचाजी से डांट पड़ती। अक्सर मेरी पढ़ाई—लिखाई की दुहाई देकर मुझे रेडियो से दूर ही रखने की भरपूर कोशिश होती थी, लेकिन मुझे जब भी मौका मिलता मैं रेडियो से चिपक जाता।

जब पढ़ाई का सिलसिला आगे बढ़ा तो चाचाजी ने मुझे रेडियो से दूर रखने के लिए मुझसे दोस्ती तोड़ ली। अब तो जिस दिन चाचाजी किसी रिश्तेदारी या शादी में जाते मेरे लिए वह दिन रेडियोमय हो जाता। देर रात तक रेडियो। घरवालों की खूब डांटें पड़तीं, लेकिन परवाह किसे थी? फिर अगले दिन जब चाचाजी आते और रेडियो की लो बैटरी देखकर मेरी जमकर क्लास लेते।


मेरे रेडियो प्रेम में कई रिश्तेदारों का भी अनमोल योगदान है। खासकर मेरे दूर के मामाजी, जिन्हें सारे रेडियो चैनल्स की फ्रीक्वेंसी और कार्यक्रम पता होता था। वह रेडियो ट्यून करते और कहते, ये लीजिए यह रायपुर केन्द्र है। यही नहीं वह कई अन्य भाषाओं के स्टेशन भी ट्यून करते जिनपर फिल्मी गाने आते थे। और भी ढेरों यादें हैं, लेकिन उनके लिए और ज्यादा वक्त चाहिए। अब तो रेडियो के नाम पर सिर्फ एफएम चैनल्स हैं, जिन्हें न सुनना ही बेहतर लगता है, क्योंकि यह न अच्छा बोल पाते हैं और न अच्छा सुना पाते हैं। हां, जबसे इंदौर आया हूं, विविध भारती के साथ फिर से दोस्ती जमाने की कोशिश जारी है।

2 comments:

  1. एक कोकिला से दूसरी कोकिला तक - ब्लॉग बुलेटिन आज की ब्लॉग बुलेटिन मे आपकी पोस्ट को भी शामिल किया गया है ... सादर आभार !

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