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Saturday, March 10, 2012

'दीवार' तो चली गई



तमाम हसरतें और दर्द समेटे राहुल द्रविड़ ने टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया। इसके साथ ही क्रिकेट के सभी संस्करणों से 'दीवार' चली गई। चेहरे पर एक खास तरह का भाव लिए द्रविड़ ने कभी खुद को जाहिर नहीं किया। ना मैदान पर ना मैदान के बाहर, लेकिन उनके दर्द को महसूस किया जा सकता है। भला कौन खिलाड़ी विश्वकप विजेता टीम का सदस्य नहीं बनना चाहेगा। लेकिन द्रविड़ को अपने ही घर में होने वाले विश्वकप के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया। द्रविड़ एक ऐसी टीम के हिस्सा थे, जहां सचिन और सौरव गांगुली जैसे स्टार थे। उनकी तमाम उपलब्धियां इन स्टार खिलाडिय़ों की छाया में दबती रहीं। याद कीजिए 1996 का इंग्लैंड दौरा। लाड्र्स के मैदान पर खेला गया दूसरा टेस्ट द्रविड़ और गांगुली दोनों का ही डेब्यू मैच था। इसी मैच में शतक बनाकर गांगुली स्टार बन गए और द्रविड़ शानदार 95 रन बनाने के बावजूद सुर्खियों में जगह नहीं बना पाए। द्रविड़ जैसे बल्लेबाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जब कभी उन्होंने कोई बड़ा कारनामा किया, श्रेय बांटने के लिए कभी गांगुली खड़े थे, कभी सचिन तो कभी लक्ष्मण। ईडन गार्डन के मैदान पर कंगारुओं का विजय रथ रोकने में लक्ष्मण के साथ द्रविड़ का भी बड़ा रोल रहा। लेकिन आज जेहन में पहले लक्ष्मण का ही नाम आता है। इन तमाम बातों के बावजूद द्रविड़ ने एक नए नायकत्व की परिभाषा गढ़ी। नेपथ्य से नेतृत्व करते हुए वह हमेशा टीममैन रहे। उन्होंने कभी श्रेय लूटने की आतुरता नहीं दिखाई।


हमेशा साबित किया खुद को
असल में द्रविड़ की बल्लेबाजी देखना किसी क्लासिक मूवी को देखने जैसा है। यहां कोई चमत्कार नहीं होता, मगर जब शो खत्म होता है तो अहसास होता है कि वाह, क्या क्लास था! द्रविड़ ने भले ही बहुत ज्यादा छक्के ना लगाए हों, लेकिन तमाम गेंदबाजों के दंभ को उन्होंने अपनी ही स्टाइल में चकनाचूर किया है। द्रविड़ के क्रिकेट तकनीक के बारे में विशेषज्ञ टिप्पणियां कर चुके हैं। द्रविड़ के सामने हमेशा हालात मुश्किल रहे और उन्होंने हर बार खुद को साबित भी किया। तब भी जब उनके ऊपर टेस्ट बल्लेबाज का ठप्पा लग चुका था। उन्हें वनडे के काबिल नहीं माना जाता था। शर्त थी कि वह विकेटकीपिंग करना स्वीकार कर लें तो वनडे टीम में उनकी जगह बन जाएगी। कोई और खिलाड़ी होता तो शायद एटीट्यूड दिखाता, लेकिन द्रविड़ ने यह खुशी-खुशी स्वीकार किया। उन्होंने इसे बाकायदा साबित भी किया। दक्षिण अफ्रीका में खेले गए 2003 विश्वकप को याद करें। वह टूर्नामेंट के दूसरे सबसे सफल विकेटकीपर-बल्लेबाज थे। टीम के लिए द्रविड़ ने हमेशा खुद को आगे रखा। चाहे वह कठिन हालात में टीम को उबारने के लिए खेली गई उनकी पारियां हों या आगे रहकर जिम्मेदारी उठाने की बात। ना जाने कितने मौके आए जब द्रविड़ से ओपनिंग करने के लिए कहा गया और उन्होंने खुशी-खुशी की।

ग्लैमर की चकाचौंध से दूर
द्रविड़ की क्षमता असीम रही है। उन्होंने संभावनाओं से परे जाकर भारत के लिए कई असाधारण पारियां खेलीं। मगर जिन बातों ने मुझे उनका मुरीद बनाया वह है उनका एक असाधारण इंसान होना। आज हर तीसरे मैच में एक स्टार पैदा हो जाता है। आईपीएल की बदौलत पैसे कमाने में भी क्रिकेटर आगे हैं, लेकिन दूसरा द्रविड़ अब होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। याद नहीं आता कभी उन्होंने मैदान पर या मैदान के बाहर अनावश्यक जोश का इजहार किया हो। मैदान के बाहर भी कभी कोई विवाद नहीं हुआ। ग्लैमर की दुनिया में रहते भी उन्होंने इस दुनिया की तमाम फितरतों से उन्होंने खुद को बचाए रखा। जिस दुनिया में क्रिकेटर सफल होते ही नखरे दिखाने लगते हैं, द्रविड़ एक अलग ही मिसाल बनकर उभरे। दुनियाभर की महिलाओं में बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद उनका नाम कभी किसी अभिनेत्री या मॉडल से नहीं जुड़ा और उन्होंने शादी भी की तो एक ऐसी लड़की से जो क्रिकेट की एबीसीडी भी नहीं जानती थी। अब भले ही द्रविड़ अंतर्राष्ट्रीय मैचों में नहीं दिखेंगे, मगर यह सच है कि वह तमाम क्रिकेटप्रेमियों के जेहन में हमेशा बसे रहेंगे एक असली हीरो की तरह।

न्यूज टुडे में प्रकाशित

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