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Sunday, June 20, 2010

अब तो बदल जाओ पापा


फादर्स डे भी बीत गया। पर हमें क्या। कहते हैं की इस दिन बच्चे अपने पापा को विश करते है। उनके साथ खुशियाँ बिताते है। होता होगा भाई। बड़े लोगों के यहाँ। हमारे लिए इसका क्या मतलब। आज सुबह जब अपने दोस्त से मैं कह रहा था तो उसका भी यही रिअक्शन था। कहने लगा क्या भैया मजाक करते हैं आप भी। अरे आज तक तो पापा से सीधे मुंह कभी बात नहीं हुई। जब महीने का खर्च लेने की बात आती है। तो बड़ी मुश्किल से किसी तरह उनके सामने जाकर खड़े हो जाते है। जो पैसा वह दे देते हैं बस चुपचाप रख लेते है। बाकि किसी तरह मां से जुगाड़ करते हैं। अरे भाई हमें तो सिर्फ पापा का गुस्सा ही पता । कभी बचपन में पिता जी ले जाते थे कंधे पर बिठा कर मेला घुमाने। वहां जो मांगते वो खिलाते। फिर झूले पर भी झुलाते थे। पर अचानक बचपन की सीमा से हम बाहर निकले और पिता जी की मोहब्बत हमसे दूर हो गई। बात बात में डांटना, गुस्सा करना। सिर्फ पढाई लिखाई करने को कहना, अब तो पापा से बात करने का मन भी नहीं करता। कहते कहते उसकी ऑंखें भर आईं

दरअसल यह सिर्फ मेरे उस दोस्त का ही किस्सा नहीं है। यह कई लड़कों की कहानी है। एक निश्चित उम्र के बाद पिता क्यूँ अपने बेटे से दूरी बना लेते है। जिस मोड़ पर उन्हें पिता की सबसे ज्यादा जरुरत होती है, जहाँ से वह अपने बेटे को गाइड कर सकते हैं, वहीँ आकर वह अनुशासन का डंडा उठा लेते हैं। बेटा बेचारा पशोपेश में कुछ कह ही नहीं पता और अन्दर ही अन्दर घुटता रहता है। बहुत बिकट होती है ऐसी सिचुएसन। मैं सभी पिताओ की बात नहीं करता पर अब भी बहुत से लोग हैं जिन्हें अपना नजरिया बदलने की जरुरत है। अपने बेटे पर यकीं कीजिये। आपका भरोसा और दिशा निर्देश एक सफल और सच्चा इन्सान बनाएगी।

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