दीपक की बातें

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Sunday, February 23, 2014

आलिया का अलग ढंग का 'हाईवे'!

तीन स्टार
इम्तियाज अली अलग तरह की फिल्में बनाते हैं। दुनिया के बंधे-बंधाए कायदों से बगावत उनकी फिल्मों में साफ झलकती है। ऐसा ही कुछ असर हाइवे फिल्म में भी नजर आता है।
इस फिल्म में वीरा (आलिया भट्ट) की शादी होने वाली है। शादी से से ठीक एक दिन पहले ही महाबीर भाटी (रणदीप हुडा) उसको अगवा कर लेता है।

शुरू में वीरा बहुत डरी सहमी सी रहती है। जैसे ही उसे अहसास होता है कि महाबीर उसे कोई नुकसान नहीं पहुंचाएगा तो वह खुलने लगती है। असल में अमीर मां-बाप के घर रहते हुए वीरा कभी खुद को आजाद नहीं महसूस कर पाती। जबकि अपहरण होने के बावजूद महाबीर के साथ वह एक खुलापन सा पाती है। एक दिन वीरा बचपन का अपना दर्द महाबीर को बताती है और यहीं से दोनों के बीच एक अनजान बॉन्डिंग बन जाती है।

इम्तियाज ने फिल्म को नए ढंग से ट्रीट करने की कोशिश की है। सबसे खास बात है कि इम्तियाज ने अपने अभिनेताओं से अच्छा काम लिया है। महाबीर भाटी के रूप में रणदीप हुडा ने चौंकाने की हद तक बढि़या काम किया है। साहब, बीवी और गैंगस्टर के बाद एक्टिंग के लिहाज से यह उनकी दूसरी यादगार फिल्म है।

वहीं आलिया भट्ट की मासूमियत और चंचलता भी अच्छी लगती हैं। सिर्फ एक फिल्म पुरानी आलिया ने अच्छी वैरिएशन दिखाई है।
हालांकि इम्तियाज की कमियां यह हैं कि वीरा के अपहरण के काफी देर बाद तक वह उसके घरवालों का हाल नहीं दिखाते। साथ ही वीरा और महाबीर का अचानक करीब आना और वीरा अपने घरवालों के खिलाफ एकदम भड़क जाना थोड़ा अजीब लगता है।

फिल्म की गति थोड़ी धीमी है और इस वजह से सीमित दर्शकों को ही पसंद आएगी। इंटरवल से पहले फिल्म ज्यादा मनोरंजक है। दूसरे हॉफ में यह थोड़ी सी गड़बड़ा गई है। वहीं एआर रहमान का संगीत उम्मीदों से कमतर है।

हालांकि ओवरऑल फिल्म को देखें तो यह काफी रोचक अनुभव है। पूरी फिल्म में जबर्दस्त और अनदेखी लोकेशंस हैं। सिनेमैटोग्राफी थोड़ा निराश करती है। अगर इस फिल्म को और बेहतर ढंग से शूट किया गया होता तो यह और लाजवाब होती। इसके बावजूद फिल्म को देखना अलग अनुभव है। खासकर घूमने-फिरने के शौकीनों को पसंद आएगी।

दूसरी खास बात है कि फिल्म में यौन शोषण का पक्ष भी रखा गया है। अपने ही परिवार में एक रिश्तेदार के हाथों में शोषण को सहन करती बच्ची की कोई नहीं सुनता। बाद में बड़ी होकर वह इसके खिलाफ बगावत कर देती है। इस दर्द को आलिया ने पर्दे पर बहुत खूबसूरती से जिया है। वहीं निचले तबके से ताल्लुक रखने वाला महाबीर भाटी भी इसी दर्द से जूझ रहा है।

आलिया भट्ट की मासूमियत, रणदीप हुडा के काम और इम्तियाज अली के नाम पर फिल्म को एक बार देखा जा सकता है।

Saturday, February 8, 2014

हरकतें हंसाएंगी और अदाएं फंसाएंगी

3.5 स्टार
शादी का माहौल, पंजाबी गाना, प्यार, इश्क, मोहब्बत और हंसाती-गुदगुदाती कहानी। करण जौहर का पूरा मसाला मौजूद है 'हंसी तो फंसी' में। निखिल (सिद्धार्थ मल्होत्रा) एक मस्तमौला लड़का है। वह आईपीएस अफसर एसबी भारद्वाज (शरत सक्सेना) का बेटा है। एकदिन वह घर में बिना बताए अपने एक दोस्त की शादी में पहुंच जाता है, जहां उसे करिश्मा (अदा शर्मा) से प्यार हो जाता है। यहीं उसकी मुलाकात एक और लड़की से होती है जो अपना घर छोड़कर भाग रही होती है। बहरहाल सात साल के खट्टे-मीठे अफेयर के बाद निखिल और करिश्मा शादी करने का फैसला करते हैं। दोनों का शादी समारोह शुरू होने पर करिश्मा की बहन मीता (परिणीति चोपड़ा) अचानक आती है। यही वो लड़की है जो निखिल से मुंबई में मिली थी। मीता असल में एक साइंटिस्ट है, लेकिन कुछ मानसिक समस्याओं से परेशान है। अब इन तीनों की यह कहानी कैसे आगे बढ़ती है इसके लिए आपको सिनेमाहॉल तक जाना होगा।


हर्षवर्धन कुलकर्णी की कहानी और स्क्रीनप्ले काफी दिलचस्प हैं। फिल्म में शॉकिंग एलीमेंट्स हैं और आप आसानी से कहानी में आने वाले मोड़ का अंदाजा नहीं लगा पाते। फिल्म के पहले हिस्से में कहानी को जमाने की कोशिश की गई है। इंटरवल के बाद जब कहानी आगे बढ़ती है तो दर्शकों का जुड़ाव भी बढऩे लगता है। खासकर मीता के किरदार के गुत्थियां सुलझने के बाद दर्शक उसे पसंद करने लगते हैं।


यह सिद्धार्थ मल्होत्रा की दूसरी फिल्म है और इसमें उनकी मेहनत साफ नजर आती है। स्क्रीन पर वह काफी प्रजेंटेबल लगे हैं। वहीं परिणीति चोपड़ा का काम वाकई तारीफ के काबिल है। उन्होंने मीता के किरदार में अपने अभिनय की नई रेंज सामने रखी है। अदा शर्मा को स्कोप कम मिला है, लेकिन उन्होंने अपनी तरफ से अच्छी कोशिश की है। बाकी किरदारों में शरत सक्सेना और मनोज जोशी का अभिनय अच्छा है।


बतौर निर्देशक पहली फिल्म में विनिल मैथ्यू ने अच्छा काम किया है। एक पेचीदा कहानी को उन्होंने उलझावों से बचाकर रखा। जहां तक संगीत की बात है तो विशाल-शेखर का संगीत अच्छा है, लेकिन न तो नयापन है न ही गानों में दम है।


ओवरऑल देखें तो हंसी तो फंसी एक मनोरंजक फिल्म है। इसे देखते हुए आप कतई बोर नहीं होते। खासकर वन लाइनर डायलॉग्स काफी फनी हैं। सिंगल स्क्रीन की तुलना में मल्टीप्लेक्स के युवा दर्शक इसे पसंद करेंगे।

Monday, January 20, 2014

ग्लैमर की तल्ख हकीकत दिखाती 'मिस लवली'


3 स्टार
आमतौर पर हम सभी फिल्में देखते हैं। सिनेमा हॉल में मनोरंजन के नाम पर हीरो-हिरोइन की ऊटपटांग हरकतें, बेसिर-पैर की कहानियों, अतार्किक रीमेक और अतिरेकता से भरी फिल्में झेलते रहते हैं। मगर जब 'मिस लवली' जैसी कोई फिल्म उसी ग्लैमर वल्र्ड के चमकदार परदे को चिंदी-चिंदी उड़ाती है तो हम उसे देखने से कतराते हैं। सिर्फ 12 दर्शकों के बीच बैठकर 'मिस लवली' फिल्म को देखते हुए बार-बार यही ख्याल जेहन में आ रहा था।
असल में 'मिस लवली' आंखें खोलने वाली फिल्म है। 80 के दशक में जब फिल्में चलनी कम हो गईं तो किस तरह से निर्माता-निर्देशकों और वितरकों ने पैसे कमाने का शॉर्ट-कट निकाला, उसे बखूबी दिखाया गया है। उस दौरान बी और सी ग्रेड की फिल्में बनाकर, उसके बीच सॉफ्ट पॉर्न और सेमी-पॉर्न फिल्मों के दृश्य भरकर दर्शकों के सामने परोसे गए। इसी रंगीन दुनिया की स्यास सच्चाईयों को निर्देशक अशीम अहलूवालिया ने बड़े बेबाकी से परदे पर उतारा है।

सच का आईना
फिल्म दो भाईयों विकी दुग्गल (अनिल जॉर्ज) और सोनू दुग्गल (नवाजुद्दीन सिद्दिकी) पर आधारित हैं। यह दोनों सी ग्रेड फिल्मों के कारोबार में लगे हुए हैं। सोनू इससे दूर भागना चाहता है, लेकिन परिस्थितियोंवश वह इसमें घिरता चला जाता है। इसी बीच उसकी मुलाकात पिंकी (निहारिका सिंह) से होती है। सोनू पिंकी से प्यार करने लगता है और उसे लेकर 'मिस लवली' नाम की फिल्म बनाना चाहता है।
फिल्म में सी-ग्रेड इंडस्ट्री की अंदरूनी सच्चाईयों को बड़ी बारीकी से दिखाया गया है। किस तरह यहां लोगों का इस्तेमाल होता है। फिल्मों की चमक-दमक के अंदर कितनी गंदगी और सड़ांध है, इसे भी दिखाया गया है। इन सबके साथ प्यार, धोखा, रिश्ते-नातों की पोल भी खोली गई है।

लाजवाब
निर्देशन शानदार है। असलियत बरकरार रखने के लिए कुछ बी और सी ग्रेड की फिल्मों के दृश्यों का भी इस्तेमाल किया गया है। हालांकि फिल्म में इन्हें धुंधला कर दिया गया है। कैमरावर्क बहुत बढि़या है और लाइटिंग, फिल्म के मूड के हिसाब से है।
फिल्म में नवाजुद्दीन सिद्दिकी समेत सभी कलाकारों ने उम्दा काम किया है। अनिल जॉर्ज और निहारिका सिंह हालांकि कम जाने-पहचाने चेहरे हैं, लेकिन वह अपने काम से प्रभावित करते हैं।

फाइनल पंच
अगर आपको अलग तरह का सिनेमा देखना पसंद है तो 'मिस लवली' आपके लिए मस्ट वॉच है। बाकी ए कैटेगरी की फिल्म है तो फैमिली ले जाने का सवाल ही नहीं उठता।

Sunday, December 22, 2013

धूम 3 माइनस आमिर खान = 0

चार स्टार
धूम सिरीज की नई पेशकश धूम-३ में सबसे बड़ा सरप्राइज पैकेज हैं आमिर खान। फिल्म की कहानी इस बार शिकागो में सेट की गई है। इकबाल खान (जैकी श्रॉफ) अपने सर्कस को बचाने के लिए जूझ रहे हैं। उन्होंने बैंक से लोन ले रखा है, लेकिन बैंक वाले मोहलत देने को तैयार नहीं हैं। सर्कस डूब जाता है और इस गम में इकबाल खान अपनी जान दे देते हैं। उस वक्त इकबाल का बेटा साहिर (आमिर खान) भी वहां मौजूद होता है। बड़ा होकर बैंक से बदला लेने के लिए साहिर उसमें कई बार चोरियां करता है। हर चोरी के बाद वह हिंदी में एक संदेश भी छोड़कर जाता है। मामले को हल करने के लिए शिकागो पुलिस भारतीय पुलिस के दो जांबाजों जय दीक्षित (अभिषेक बच्चन) और अली (उदय चोपड़ा) को बुलाती है। उधर साहिर अपने पिता के सर्कस को भी फिर से खड़ा करता है और उसके साथ आलिया (कटरीना कैफ) भी काम करने लगती है।

स्क्रीनप्ले और निर्देशन
फिल्म की कहानी में नयापन है। इसमें ढेर सारा ट्विस्ट है जो दर्शकों को बांधे रखता है। शुरुआती सीन से ही फिल्म जबर्दस्त है। फ्लैशबैक और वर्तमान की कहानी में अच्छा तालमेल बनाया गया है। हालांकि ऐसा नहीं है कि फिल्म में कमियां नहीं हैं। लॉजिक की कसौटी पर कसेंगे तो ऐसी सैकड़ों कमियां नजर आएंगी। कुछ दृश्य गैरजरूरी मालूम पड़ते हैं। खासतौर पर अभिषेक बच्चन की एंट्री वाला सीन। इसके अलावा कुछ दृश्यों में अतिरेकता का सहारा लिया गया है। बहरहाल, ड्रामा, सस्पेंस और बाइक चेजिंग के कई सीक्वेंस दर्शकों को रोमांचित करते हैं। लोकेशन और विजुअल इफेक्ट्स भी बहुत शानदार हैं।

अभिनय
आमिर खान ने फिल्म में पूरी तरह से चौंकाया है। एक्शन और स्टंट करते हुए वह काफी जमे हैं। इसके अलावा भावनात्मक दृश्यों में भी उन्होंने अपनी अदाकारी का जादू चलाया है। कटरीना कैफ खूबसूरत लगी हैं। बाकी उनके पास ज्यादा कुछ करने के लिए था ही नहीं। वहीं अभिषेक बच्चन और उदय चोपड़ा वही करते रहते हैं जो धूम सिरीज की पिछली दो फिल्मों में कर रहे थे।

गीत-संगीत
फिल्म का गीत-संगीत बहुत दमदार तो नहीं है, लेकिन गानों की पिक्चराइजेशन अच्छी है। गानों की कोरियोग्राफी भी काफी अच्छी की गई है। कमली-कमली और मलंग बाकी गानों की तुलना में बेहतर हैं।

फाइनल पंच
धूम-3 के साथ दर्शक साल का अंत धूम-धाम से कर सकते हैं। फैमिली एंटरनेटमेंट की कसौटी पर भी यह खरी उतरती है। 

Sunday, December 15, 2013

कुछ नहीं है सनी लियोनी के 'जैकपॉट' में

1 स्टार
फिल्म 'जैकपॉट' पहले ही घंटे में फिल्म इतना पकाती है कि कई दर्शक सिनेमाहॉल छोड़कर निकल जाते हैं। अफसोस, अपन तो यह भी नहीं कर सकते थे, वर्ना यह यह रिव्यू कौन लिखता? फिल्म देखते हुए लगता है निर्देशक कैजाद गुस्ताद यह भूल गए थे कि मनोरंजन नाम की भी कोई चीज होती है। थ्रिलर और सस्पेंस फिल्म होने का दावा करने वाली जैकपॉट किसी धारावाहिक का नीरस एपिसोड लगता है, बल्कि वह भी इससे ज्यादा मनोरंजक हो सकता है।
फिल्म की कहानी है बॉस (नसीरुद्दीन शाह) की। वह गोवा में एक कसीनो का मालिक है। बॉस फ्रांसिस (सचिन जोशी), माया (सनी लियोनी), एंथनी (भरत निवास) और कीर्ति (एल्विस) के साथ अपने ही कसीनो में गलत ढंग से पांच करोड़ रुपए का जैकपॉट जीते की साजिश रचता है। बाद में इसी साजिश में साजिशों का सिलसिला चल पड़ता है और सब एक-दूसरे पर शक करने लगते हैं।


निर्देशक और लेखक कैजाद गुस्ताद ने क्या सोचकर यह फिल्म बनाई, कुछ समझ में नहीं आता। शुरू से ही फिल्म में झोल ही झोल हैं। स्क्रिप्ट इतनी उलझी हुई है कि दर्शक लगातार कंफ्यूज रहते हैं। समझ में ही नहीं आता कि कहानी किस दिशा में जा रही है। फिल्म में इतने ज्यादा फ्लैशबैक हैं कि दर्शक फिल्म से जुड़ ही नहीं पाता। कोई भी प्लॉट दर्शकों को न तो चौंका पाता है और न ही हैरान करता है।


फिल्म की कहानी में कोई नयापन नहीं है। यह लालच, धोखाधड़ी और दोस्ती में दगाबाजी के पुराने फॉर्मूलों पर आधारित है। इस तरह की कहानी पर हम जाने कितनी फिल्में देख चुके हैं।


फिल्म में थोड़ा बहुत जो अभिनय नजर आता है, वह नसीरुद््दीन शाह की बदौलत है। बाकी सनी लियोनी क्यों बॉलीवुड फिल्मों में आ गईं, ये तो वही जानें। उनसे अभिनय की कोई उम्मीद नहीं थी और वह कोई उम्मीद जगाती भी नहीं। हां, जिस्म की नुमाइश में कसर बाकी नहीं रखतीं। सचिन जोशी और अन्य कलाकार भी कुछ खास नहीं कर पाए हैं।


फिल्म का यही एक पक्ष है जो थोड़ा बेहतर है। खासतौर पर अरिजीत सिंह की आवाज में कभी जो बादल बरसे गाना कानों को सुकून दे जाता है।


अगर आप यह सोचकर जा रहे हैं कि आपके हाथ कोई बड़ा जैकपॉट लगेगा, तो बिल्कुल मत जाइए। हां, सनी लियोनी के बहुत बड़े फैन हैं तो शौक से जाइए।

Friday, December 13, 2013

धत तेरी की गाने वाला 'सनम'

एसक्यूएस प्रोजेक्ट बैंड के बाद गोरी तेरे प्यार से बॉलीवुड में अपनी आवाज पहुंचा रहे हैं गायक सनम पुरी

इन दिनों फिल्म 'गोरी तेरे प्यार में' का गाना 'धत तेरी की' युवाओं को खासा लुभा रहा है। इसे आवाज दी है सनम पुरी ने। सनम का नाम अभी तक उनके बैंड 'एसक्यूएस प्रोजेक्ट'  और अलबमों 'एसक्यूएस सुपरस्टार' और 'समर सनम' के लिए जाना जाता है। अब 'धत तेरी की' के साथ सनम ने बॉलीवुड की तरफ कदम बढ़ा दिए हैं। सनम से बात करना काफी मजेदार रहा। वह बिल्कुल हंसते-मुस्कुराते हुए बातें करते हैं और बेलौस अंदाज में जवाब देते हैं। पेश हैं सनम के साथ टेलीफोन पर हुई लंबी बातचीत के कुछ अंश...

- 'धत तेरी की' गाना कैसे मिला?
- हमारे मैनेजर हैं बेन थॉमस। उन्होंने विशाल-शेखर के लिए हमारे अलबम एसक्यूएस सुपरस्टार का गाना तेरी आंखों से प्

- बैंड से बॉलीवुड तक का सफर कैसा रहा?
- काफी अच्छा सफर रहा। करीब ३ साल पहले हमारा पहला अलबम आया था। तब से अब तक काफी अच्छा रहा है सबकुछ।

- बतौर गायक कहां कंफर्टेबल पाते हैं खुद को, बैंड में या बॉलीवुड में?
- निश्चित तौर पर बैंड में। यहां हमारे पास पूरी आजादी होती है। गाने में हेरफेर करने या फिर ट्यून में बदलाव और उसका अंदाज तय करने में। बॉलीवुड में ऐसा होना मुश्किल है, क्योंकि वहां हम किसी के अंडर में काम कर रहे होते हैं। जो फिल्म के डायरेक्टर-प्रोड्यूसर को पसंद आता है बस उसी के मुताबिक काम करना पड़ता है।

- किसी सिंगर के लिए फिल्मों में गाना क्यों जरूरी हो गया है?
- जरूरी तो नहीं, लेकिन इसे जरूरी बना दिया गया है। नाम, पहचान, शोहरत सब फिल्मों में गाने के बाद ही मिलती है। इसलिए लोग एक या दो अलबम निकालने के बाद फिल्मों में काम की तलाश में लग जाते हैं।

- अगर फिल्मों में काम मिलने लगेगा तो क्या बैंड बंद कर देंगे?
-बिल्कुल नहीं। फिल्मों में काम तो पता नहीं कितना और कब तक मिलेगा, लेकिन बैंड तो जिंदगी भर साथ देगा।

- तो क्या यह शुरू से तय था कि म्यूजिक की ही फील्ड में जाना है?
- बिल्कुल! मैं पैदा ही इसीके लिए हुआ हूं। छह साल की उम्र से ही गाने लगा था।

-आपके लिए म्यूजिक क्या है?
म्यूजिक से मुझे पैसा और शोहरत नहीं कमानी है। म्यूजिक से मुझे लोगों को खुश करना है।

- कौन से सिंगर्स पसंद हैं?
- सभी सिंगर्स को सुनना अच्छा लगता है। आखिर सभी मेहनत करते हैं, तो हमें सभी का सम्मान करना चाहिए।

- कभी किसी से इंस्पायर हुए?
- नहीं, कभी नहीं। मेरी इंस्पिरेशन मेरा भाई समर ही है। असल में मैं गाने ज्यादा सुनता नहीं हूं। इसके बजाए मैं ऑर्केस्ट्रा म्यूजिक सुनना पसंद करता हूं।

- आपके भाई समर आपसे छोटे हैं या बड़े?
- समर मुझसे दो साल बड़े हैं।

-दोनों के बीच क्या काम बंटा हुआ है?
-नहीं, ऐसा कुछ नहीं। आपस में डिस्कस करते रहते हैं। बस उनकी लिखने पर पकड़ थोड़ी अच्छी है तो वे गाने लिखते हैं। बाद में मैं उसकी धुन तैयार करता हूं।

- आगे क्या करने का इरादा है?
- बहुत कुछ करना है। गाना तो चलता ही रहेगा, साथ ही फिल्मों में म्यूजिक भी देना है। एेक्टिंग के बारे में भी सोचा है, लेकिन पहली प्रियॉरिटी म्यूजिक ही रहेगी।
ले किया। इसे सुनने के बाद विशाल-शेखर ने मुझे मिलने के लिए बुलाया। हमने उनके सामने कुछ गाने गुनगुनाए। यह विशाल-शेखर को काफी पसंद आ गए और उन्होंने तय किया कि हम लोग साथ काम करेंगे। इस तरह यह गाना मुझे मिला।

Saturday, December 7, 2013

प्रभुदेवा का रद्दी राजकुमार!

दो स्टार
प्रभुदेवा ने वॉन्टेड फिल्म के साथ बॉलीवुड में साउथ का तड़का लगाने की शुरुआत की। अब इसी अंदाज को वह एक बार फिर लेकर आए हैं फिल्म 'र... राजकुमार' के साथ। अब उन्हें कौन समझाए कि एक ही मसाला बार-बार परोसोगे तो ओवरडोज हो जाएगी।

फिल्म में शाहिद कपूर बने हैं रोमियो राजकुमार। राजकुमार किसी अंधेरी रात में एक गांव में पहुंच जाता है। वहां शिवराज (सोनू सूद) और परमार (आशीष विद्यार्थी) की दुश्मनी के चलते हालात बहुत खराब हैं। यहां पर राजकुमार को चंदा (सोनाक्षी सिन्हा) से प्यार हो जाता है। वहीं शिवराज भी चंदा को चाहता है। चंदा का प्यार पाने के लिए राजकुमार को क्या-क्या करना पड़ता है, यही फिल्म में दिखाया गया है।

प्रभुदेवा के स्टाइल में कुछ भी नया नहीं है। वही तीखा मसाला, तगड़ा एक्शन और कानफोड़ू संगीत। इन सबके चक्कर में कहानी की जमकर बैंड बजी है। फिल्म में गाने भी इतने ज्यादा हैं कि बची-खुची कहानी का भी दम घोंट जाते हैं।
साफ नजर आने लगा है कि प्रभुदेवा अपने ही फॉर्मूले के शिकार हो गए हैं। साउथ के स्टाइल में फिल्म को पेश करने के उनके अंदाज से अब दर्शक उकताने लगे हैं। शुरू के कुछ दृश्य जरूर फनी हैं, लेकिन इतने नहीं कि उनके लिए पूरी फिल्म देखी जाए। शाहिद का बार-बार किस के लिए मुंह बनाना भी इरिटेट करने लगता था। लॉजिक या दिमाग लगाने की बिल्कुल जरूरत नहीं। आलम यह है कि हीरो सिर्फ पैर हिलाता है और आठ-दस विलेन एक साथ हवा में उड़ जाते हैं। वहीं अकेले 60-65 लोगों को शाहिद को मारते देखना भी हजम नहीं होता।

जहां तक अभिनय की बात है तो यही एक चीज है जो फिल्म में नजर आती है। चाहे वह शाहिद कपूर हों या फिर सोनू सूद और आशीष विद्यार्थी, सभी ने अपनी तरफ से बेहतरीन कोशिश की है। कुछ दृश्यों में शाहिद ने इतना अच्छा अभिनय किया है कि उन्हें दाद देने को दिल करता है। हालांकि सोनाक्षी सिन्हा इसमें काफी पिछड़ी हुई हैं। सोनाक्षी को अब अपने अभिनय को कुछ नए रंग देने होंगे, अन्यथा लोग लुटेरा में उनके बेहतरीन काम को तुक्का ही मानेंगे। डायलॉग्स में भी कुछ नया नहीं है। हां, मध्य प्रदेश और गुजरात की लोकेशन को जरूर कैमरे ने अच्छे से कैद किया है।

इस फिल्म से भी काफी उम्मीदें थीं। खासतौर पर शाहिद कपूर और सोनाक्षी दोनों ने इसके जरिए अपने करियर में नई उछाल की संभावनाएं देखी होंगी, लेकिन अफसोस कि सभी को नाउम्मीद होना पड़ता है। फिल्म में हिंसा के दृश्य भी काफी ज्यादा हैं।