'आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को, मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको।'
ये वो कविता है, जिसे पढ़कर मैंने अदम गोंडवी को जाना था। इसके बाद कविताकोश के जरिए उनकी कई कविताओं को पढ़ा। यह बताने की जरुरत नहीं कि उनकी कविताओं में समाज, शासन और राजनीति की विडंबनाओं पर किस कदर तल्खी भरी हुई है।
ऊपर जिस कविता का जिक्र कर चुका हूं, उसके बारे में बताते हैं कि वह उनके ही गांव की एक घटना का जीवंत वर्णन है। जिस वक्त वहां पर दबंगों के खिलाफ आवाज उठाने में लोगों की रूह कांप रही थी, अदम गोंडवी ने इस कविता के जरिए बिगुल बजाया था। इस कविता को पढ़ते हुए आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सिर्फ यही कविता क्यों, अदम साहब की हर कविता में जिंदगी का हर रंग मौजूद है। विद्रोह का हर लहजा, हर तेवर बरकरार है। उन्होंने युवा पीढ़ी की हताशा को कितने सटीक अंदाज में बयां किया है...
''जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये''
युवा पीढ़ी से जुड़ी यह पंक्तियां भी...
''इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया,
सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की।''
उनकी एक और कविता में समाज में अभावों के बीच जिंदगी गुजार रहे लोगों की बात कुछ यूं बयां की गई है...
''घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है''
उन्होंने राजनीति पर भी करारे व्यंग्य किए हैं...
'एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे'
'काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में
रामराज उतरा है विधायक निवास में '
जैसी लाइनों के जरिए उन्होंने राजनीति के खोखले आदर्शों और राजनीतिज्ञों के दुहरे चरित्र पर खुलकर वार किए।
समाज की एक और तल्ख सच्चाई अदम गोंडवी की कविता में कैसे निकली है...
'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है'
यही नहीं, उन्होंने कौमी एकता को भी अपनी कविता की आवाज दी। ये लाइनें गवाह हैं...
''हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये''
मैं इसे अपना दुर्भाग्य ही मानूंगा कि अदम गोंडवी से कभी मिल नहीं पाया। मगर यह भी सच है कि उनकी कविता की तल्खी और उस बेबाकी के जरिए उनसे कई दफे रूबरू हो चुका हूं। और यह भी उतना ही सच है कि उस तेवर को हमेशा-हमेशा मिस करुंगा।
हकीकत यह है कि अदम गोंडवी या दुष्यंत कुमार जैसे रचनाकार किसी वक्त या दौर के मोहताज नहीं हैं। हर वक्त हर दौर में वो उतने ही प्रासंगिक हैं। वह हर दौर की युवा पीढ़ी के नायक रहेंगे।
(अदम गोंडवी की रचनाएं पढ़ने के लिए नीचे लिंक को क्लिक करें।)
कविता-कोश का लिंक।
Monday, December 19, 2011
Friday, December 9, 2011
काश, 'हमारी' भी ऐसे ही सुनते मंत्री जी!
अभी कुछ दिनों पहले की बात है। कुछ सांसदों को फर्स्ट क्लास में सफर करने को नहीं मिला तो बड़ा शोर-शराबा मचाया महानुभावों ने। मामला रेलवे मिनिस्टर तक पहुंचा दिया। रेलवे मिनिस्टर ने भी फटाफट मामले को संज्ञान में लेकर फौरी कार्रवाई शुरू कर दी।
मेरे जेहन में दो सवाल आए, एक तो काश, देश के मंत्री जी लोग हर मामले को इतनी ही संजीदगी से लेते और दूसरा कि देश में ना जाने कितने लोग रोज रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं। इनमें से बहुत से लोगों को जगह भी नहीं मिल पाती, मगर वह किसी से अपनी शिकायत नहीं कर पाते। बस व्यवस्था को कोसकर खुद को तसल्ली दे लिया करते हैं।
पिछले दिनों मुझे खुद भी एक वाकया देखने को मिला। घर से वापस नौकरी पर, यानी आज़मगढ़ से कानपुर आते वक्त एक ऐसा ही मामला देखने को मिला। मेरी सीट के बगल में एक महिला अपने दो बच्चों के साथ दोनों सीटों के बीच की जगह में लेटी हुई थी। दरअसल उनका टिकट कन्फर्म नहीं था। उसे कोई सीट नहीं मिल रही थी और मजबूरन उसे अपना पूरा सफर उसी जगह पर लेटकर पूरा करना पड़ा।
अब जब नेताओं की इस 'असुविधा' के बारे में पता चला तो बड़ी हैरानी हुई। काश, देश की जनता की बात भी इतनी ही फिक्र होती। काश, देश की जनता से जुड़े मामलों को लेकर मंत्री जी लोग इतने ही सक्रिय होते। काश, जनता से जुड़े मामलों में इतना ही फौरी निर्णय होता। काश!
मेरे जेहन में दो सवाल आए, एक तो काश, देश के मंत्री जी लोग हर मामले को इतनी ही संजीदगी से लेते और दूसरा कि देश में ना जाने कितने लोग रोज रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं। इनमें से बहुत से लोगों को जगह भी नहीं मिल पाती, मगर वह किसी से अपनी शिकायत नहीं कर पाते। बस व्यवस्था को कोसकर खुद को तसल्ली दे लिया करते हैं।
पिछले दिनों मुझे खुद भी एक वाकया देखने को मिला। घर से वापस नौकरी पर, यानी आज़मगढ़ से कानपुर आते वक्त एक ऐसा ही मामला देखने को मिला। मेरी सीट के बगल में एक महिला अपने दो बच्चों के साथ दोनों सीटों के बीच की जगह में लेटी हुई थी। दरअसल उनका टिकट कन्फर्म नहीं था। उसे कोई सीट नहीं मिल रही थी और मजबूरन उसे अपना पूरा सफर उसी जगह पर लेटकर पूरा करना पड़ा।
अब जब नेताओं की इस 'असुविधा' के बारे में पता चला तो बड़ी हैरानी हुई। काश, देश की जनता की बात भी इतनी ही फिक्र होती। काश, देश की जनता से जुड़े मामलों को लेकर मंत्री जी लोग इतने ही सक्रिय होते। काश, जनता से जुड़े मामलों में इतना ही फौरी निर्णय होता। काश!
Friday, October 14, 2011
पूनम पांडे, सेक्स और सक्सेज

पूनम पांडे नाम की हसीना एक बार फिर सुर्खियों में है। बॉथरूम में नहाते हुए जो वीडियो उसने अपलोड किया है, उसे देखने के लिए इंटरनेट पर लोग टूट पड़ रहे हैं। वेबसाइट्स पर उसके वीडियो को हिट बताया जा रहा है। इंडियन ग्लैमर सिनैरियो पर पूनम पांडे का अवतरण बड़ा नाटकीय रहा है। याद कीजिए वर्ल्ड कप 2011 में भारतीय क्रिकेट टीम को प्रेरित करने वाला बयान देकर वह सुर्खियों में छा गई थी। (हालांकि उसकी इस घोषणा से कि 'भारत अगर वर्ल्ड कप जीता तो वह न्यूड हो जाएगी' ने भारतीय खिलाडि़यों को कितना इंस्पायर किया यह शोध का विषय होना चाहिए।) अपने इस वादे से पूनम पांडे पल भर में एक जाना-पहचाना नाम बन गई। इंटरनेट, न्यूज पेपर, न्यूज चैनल्स हर जगह पूनम पांडे, पूनम पांडे। इसके साथ ही विजय माल्या के बहुचर्चित कैलेंडर्स की कैलेंडर गर्ल नेशनल ही नहीं इंटरनेशनल सिनैरियो पर छा गई।
बहरहाल पूनम पांडे का लेटेस्ट वीडियो चर्चा में है। कुछ लोग उसकी इस हरकत पर हाय-तौबा भी मचा रहे हैं। मुझे इन हाय-तौबा मचाने वाले जीवों से बड़ी नफरत है। अगर पूनम पांडे हाईलाइट होने के लिए ऐसा कर रही है तो इसमें गलत क्या है। उसे यह बात पूरी तरह पता है कि उसका जिस्म एक 'प्रोडक्ट' है और जब तक प्रोडक्ट की मार्केटिंग नहीं होगी वह बिकेगा नहीं। अपने वीडियोज से अपने जिस्म की मार्केटिंग करके अगर वह सफलता का रास्ता तैयार कर रही है तो लोगों के पेट में भला दर्द क्यों हो रहा है। और दर्द हो रहा है तो होता रहे। यह बात पूनम पांडे भी बखूबी जानती है कि इस दर्द से बेहाल लोग जब उल्टी करेंगे तो भी उसकी पॉपुलैरिटी ही होगी। उसे यह पता है कि जो लोग सामने आकर उसकी इस हरकत पर थू-थू करेंगे, वही बाद में अकेले में लार टपकाते हुए उसका वीडियो भी देखेंगे। उसे गालियां देने वाले उसकी अदाओं पर आहें भी भरेंगे। इसका उदाहरण मैं खुद देख चुका हूं जब टीम इंडिया की जीत के बाद तमाम लोगों ने पूनम पांडे के नग्न रूप के दर्शन की ख्वाहिश जाहिर की थी। और हां, इस बात पर कम बहस हुई थी क्या कि पूनम पांडे ने अपना वादा नहीं निभाया।
इस तरह का हथकंडा अपनाकर पूनम पांडे अगर बिपाशा बसु, मलिका सहरावत या राखी सावंत या उन जैसे कुछ और नामों, जिन्होंने जिस्म की नुमाइश करके शोहरत पाई की, कतार में शामिल होना चाहती है तो भला गलत क्या है? जो भी हो उसे यह मालूम है कि दुनिया के इस बाजार में नारी जिस्म ही एक ऐसी चीज है जिसे आसानी से बेचा जा सकता है। तमाम फिल्मी डायरेक्टर, बड़ी नामी हिरोइनें भी तो यही करती रही हैं। क्या राजकपूर ने अपनी तमाम फिल्मों में 'कला' के नाम पर नारी जिस्म को नहीं दिखाया है? जिस्म की नुमाइश के जरिए प्रसिद्धि पाने के खेल में अगर वह शामिल हुई है तो उसके पीछे वह पुरानी परंपरा क्या दोषी नहीं है? यहां तक कि अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी कुछ हसीनाओं ने अधनंगी तस्वीरें खिंचवाकर प्रसिद्धि का प्रसाद प्राप्त किया था।
पूनम पांडे के विजन और ईमानदारी की दाद देनी होगी। कम से कम वह उन अभिनेत्रियों में तो नहीं जो पहले बोल्ड सीन देकर फिर निर्माता-निर्देशक पर आरोप लगाती फिरती हैं। खेल भले ही नंगई का हो पर पूनम पांडे पूरी रणनीति के साथ उतरी है। एक कुशल मैनेजर की तरह उसने अपनी हर चीज को बेहद सलीके से रखा है। अपनी वेबसाइट बनाई, टि्वटर अकाउंट बनाया है, जहां वह गाहे-बगाहे अपनी अधनंगी तस्वीरें लगती रहती है। असल में वह उस चलन को फॉलो कर रही है कि इंडस्टी में शाहरुख बिकता है या सेक्स। अब शाहरुख तक पहुंचने की उसकी हैसियत तो है नहीं सो वह सेक्स को शाहरुख तक पहुंचने की सीढ़ी बना रही है। उसे पता है जो दिखता है, वही बिकता है।
Saturday, October 8, 2011
आधी रात को ख्यालों की आवारगी
आधी रात से भी ज्यादा का वक्त हो चुका है। गौरव सोलंकी के ब्लॉग 'रोटी कपड़ा और सिनेमा' पर लिखे दिलचस्प किस्से पढ़ते-पढ़ते वक्त सरकता जा रहा है। अचानक लगता है अब सोना चाहिए। फिर अलार्म लगाने के लिए मोबाइल उठाता हूं तो मन करता है चलो एक गाना सुन लिया जाए। पुनीत भाई सो रहे हैं। रूम-पार्टनर धर्म भी निभाना है। फिर ईयरफोन ढूंढता हूं। लाइट नहीं जलाता। अपने कमरे में बिना लाइट जलाए कुछ भी ढूंढ लेने का 'ओवरकांफिडेंस' है।
बहरहाल, कान में ईयरफोन ठूंसकर म्यूजिक प्लेयर पर जाने तक तय नहीं है कि गाना कौन सा सुना जाएगा। दिल कहता है, चलो जो ही सुना दो। प्ले करते ही आतिफ असलम की आवाज कान में गूंजती है। 'कुछ इस तरह........तेरी पलकें, मेरी पलकों से मिला दे।' सुर घटते-बढ़ते रहते हैं। नशा तारी होता जाता है। गाना खत्म होता है। दिल से वन्स मोर का शोर। चलो फिर हो जाए, दिमाग किसी आवारा साथी की तरह दिल का साथ देता है।
अजीब बात है ना। हम दिल की तुलना में दिमाग को ज्यादा अक्लमंद मानते-समझते हैं। मगर दिमाग की शैतानियां तो दिल की कारगुजारियों से बड़ी हैं यार। दिल तो बेचारा मासूम, जो समझ में आया कर लिया, किसी बच्चे के माफिक। मगर दिमाग, वह तो पूरा शाणा। मंझा हुआ अपराधी। दिल-दिमाग की मिलीभगत से मेरा संगीतमय अपराध चलता रहता है। फिर ख्याल आता है, गुलाम अली को सुन लूं थोड़ा। ख्यालात की लड़ी बनती जा रही है। ख्याल एक दूसरे से टकरा रहे हैं।
सारंगी और तबले की जुगलबंदी के बीच गुलाम अली की आवाज कानों में मिसरी की तरह घुलती है। 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है......' जाने कितनी बार सुन चुका हूं ये गजल। मगर हर बार एक नई तरावट मिलती है। किसी चीज का नशा हो जाना शायद इसी को कहते हैं। बार-बार वही करने को जी चाहता है। आज भी याद है पहली दफा यह गजल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दिनों में जौव्वार हुसैन सर के मुंह से सुनी थी। जयपुर टूर पर जाते वक्त, पूरे जौनपुरिया मिजाज और ठसक के साथ उन्होंने यह गजल सुनाई तो फिर मैं इसका मुरीद होता चला गया। बरसों बीत चुके हैं मगर इसके लिए दीवानापन अभी भी कायम है।
गुलाम अली साहब की लत कब लगी यह तो याद नहीं, मगर गजल के साथ फनकार का अंदाज भी भाता गया। शायद यह उम्र के उस दौर का भी कुसूर था कि आवाज के बादशाह से ज्यादा गजल के लफ़्जों ने ज्यादा लुभाया।
मेरे कानों में ठुंसे ईयरफोन के जरिए गुलाम अली साहब की खुरदरी, मगर बला की मुलायमियत और कशिश से भरी आवाज मेरे जेहन में ग्ंज रही है। वो गा रहे हैं 'तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा........' इधर मेरे जेहन में एक और ख्याल उमड़ने लगा है। कुछ लिखने के लिए मन बेचैन हो रहा है। मन के एक कोने से आलस का आमंत्रण आता है, अमां सोओ यार, कहां रात में आंखें फोड़ोगे। गिरीन्द्र भाई से किया वादा, कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही लिखूंगा भी टूटने का डर नहीं सताता। लिखने का कीड़ा ज्यादा ताकतवर है। मैं बिस्तर पर से उठ रहा हूं। लैपटॉप टिकाने के लिए मेज को खोल रहा हूं। लाइट नहीं जलानी है, पुनीत भाई जागने ना पाएं इसका भी ख्याल रखना है। एक बार फिर रूम-पार्टनर धर्म की दुविधा में फंसा हूं।
लैपटॉप पर लाल-नीली बत्तियां जलने लगी हैं। इंटरनेट कनेक्ट कर रहा हूं और कानों में गुलाम अली गुनगुना रहे हैं, 'दोपहर की धूप में, मेरे बुलाने के लिए, वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।'
सुबह के तीन बजने जा रहे हैं, ख्यालों की आवारगी मुसलसल जारी है।
बहरहाल, कान में ईयरफोन ठूंसकर म्यूजिक प्लेयर पर जाने तक तय नहीं है कि गाना कौन सा सुना जाएगा। दिल कहता है, चलो जो ही सुना दो। प्ले करते ही आतिफ असलम की आवाज कान में गूंजती है। 'कुछ इस तरह........तेरी पलकें, मेरी पलकों से मिला दे।' सुर घटते-बढ़ते रहते हैं। नशा तारी होता जाता है। गाना खत्म होता है। दिल से वन्स मोर का शोर। चलो फिर हो जाए, दिमाग किसी आवारा साथी की तरह दिल का साथ देता है।
अजीब बात है ना। हम दिल की तुलना में दिमाग को ज्यादा अक्लमंद मानते-समझते हैं। मगर दिमाग की शैतानियां तो दिल की कारगुजारियों से बड़ी हैं यार। दिल तो बेचारा मासूम, जो समझ में आया कर लिया, किसी बच्चे के माफिक। मगर दिमाग, वह तो पूरा शाणा। मंझा हुआ अपराधी। दिल-दिमाग की मिलीभगत से मेरा संगीतमय अपराध चलता रहता है। फिर ख्याल आता है, गुलाम अली को सुन लूं थोड़ा। ख्यालात की लड़ी बनती जा रही है। ख्याल एक दूसरे से टकरा रहे हैं।
सारंगी और तबले की जुगलबंदी के बीच गुलाम अली की आवाज कानों में मिसरी की तरह घुलती है। 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है......' जाने कितनी बार सुन चुका हूं ये गजल। मगर हर बार एक नई तरावट मिलती है। किसी चीज का नशा हो जाना शायद इसी को कहते हैं। बार-बार वही करने को जी चाहता है। आज भी याद है पहली दफा यह गजल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दिनों में जौव्वार हुसैन सर के मुंह से सुनी थी। जयपुर टूर पर जाते वक्त, पूरे जौनपुरिया मिजाज और ठसक के साथ उन्होंने यह गजल सुनाई तो फिर मैं इसका मुरीद होता चला गया। बरसों बीत चुके हैं मगर इसके लिए दीवानापन अभी भी कायम है।
गुलाम अली साहब की लत कब लगी यह तो याद नहीं, मगर गजल के साथ फनकार का अंदाज भी भाता गया। शायद यह उम्र के उस दौर का भी कुसूर था कि आवाज के बादशाह से ज्यादा गजल के लफ़्जों ने ज्यादा लुभाया।
मेरे कानों में ठुंसे ईयरफोन के जरिए गुलाम अली साहब की खुरदरी, मगर बला की मुलायमियत और कशिश से भरी आवाज मेरे जेहन में ग्ंज रही है। वो गा रहे हैं 'तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा........' इधर मेरे जेहन में एक और ख्याल उमड़ने लगा है। कुछ लिखने के लिए मन बेचैन हो रहा है। मन के एक कोने से आलस का आमंत्रण आता है, अमां सोओ यार, कहां रात में आंखें फोड़ोगे। गिरीन्द्र भाई से किया वादा, कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही लिखूंगा भी टूटने का डर नहीं सताता। लिखने का कीड़ा ज्यादा ताकतवर है। मैं बिस्तर पर से उठ रहा हूं। लैपटॉप टिकाने के लिए मेज को खोल रहा हूं। लाइट नहीं जलानी है, पुनीत भाई जागने ना पाएं इसका भी ख्याल रखना है। एक बार फिर रूम-पार्टनर धर्म की दुविधा में फंसा हूं।
लैपटॉप पर लाल-नीली बत्तियां जलने लगी हैं। इंटरनेट कनेक्ट कर रहा हूं और कानों में गुलाम अली गुनगुना रहे हैं, 'दोपहर की धूप में, मेरे बुलाने के लिए, वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।'
सुबह के तीन बजने जा रहे हैं, ख्यालों की आवारगी मुसलसल जारी है।
Thursday, October 6, 2011
कुछ करो कप्तान साहब
हाल ही में चैंपिंयंस लीग टी-२० में न्यू साउथ वेल्स से हारने के बाद चेन्नई सुपरकिंग्स के कप्तान महेंद्र सिंह धोनी का बयान था, 'चलो अब कुछ आराम तो मिलेगा।' किसी कप्तान के मुंह से सुनी जाने वाली सबसे खराब बात हो सकती है। इस बयान में धोनी की मजबूरी और हताशा दोनों छुपी है।
पिछले कुछ समय से धोनी का सितारा गर्दिश्ा में चल रहा है। उनके साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। जैसे वर्ल्ड कप जीतने के बाद उनका मिडास टच कहीं खो गया है। इंग्लैंड में लगातार हार मिली। वर्ल्ड कप विनिंग टीम के आधे से ज्यादा सूरमा घायल होकर टीम से बाहर हो चुके हैं। खुद टीम का सिपहसालार भी घायल है और आराम के लिए गुहार लगा रहा है। मगर फिलहाल आराम नहीं है। अब फिर से अंग्रेज पधार चुके हैं।
धोनी को शायद इस बात का अहसास नहीं है कि वह सिर्फ मैच नहीं हार रहे हैं, बल्कि लोगों का विश्वास, यकीन, इज्जत, सम्मान और स्टारडम भी गंवा रहे हैं। वर्ल्ड कप के साथ जिस तरह थोक के भाव में धोनी मैच हार रहे हैं वह उनकी काबिलियत पर सवाल खड़ा कर रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि धोनी थोड़े दिन आराम करके रीचार्ज हो लें। इसके बाद फिर से वह जीत के मिशन पर निकलें।
पिछले कुछ समय से धोनी का सितारा गर्दिश्ा में चल रहा है। उनके साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। जैसे वर्ल्ड कप जीतने के बाद उनका मिडास टच कहीं खो गया है। इंग्लैंड में लगातार हार मिली। वर्ल्ड कप विनिंग टीम के आधे से ज्यादा सूरमा घायल होकर टीम से बाहर हो चुके हैं। खुद टीम का सिपहसालार भी घायल है और आराम के लिए गुहार लगा रहा है। मगर फिलहाल आराम नहीं है। अब फिर से अंग्रेज पधार चुके हैं।
धोनी को शायद इस बात का अहसास नहीं है कि वह सिर्फ मैच नहीं हार रहे हैं, बल्कि लोगों का विश्वास, यकीन, इज्जत, सम्मान और स्टारडम भी गंवा रहे हैं। वर्ल्ड कप के साथ जिस तरह थोक के भाव में धोनी मैच हार रहे हैं वह उनकी काबिलियत पर सवाल खड़ा कर रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि धोनी थोड़े दिन आराम करके रीचार्ज हो लें। इसके बाद फिर से वह जीत के मिशन पर निकलें।
Sunday, September 25, 2011
आधी रात, गंगा और गुलाम अली
12 बजने में अभी 10 मिनट बाकी हैं। इसके बावजूद आनंदेश्वर की गलियों में चहल-पहल थी। इसकी सबसे बड़ी वजह सोमवार का दिन। बाबा के भक्तजनों का तांता लगा हुआ है। श्रद्धा का सैलाब उमड़ा है। कुछ भक्त बड़ी गाडि़यों में आए हैं, शायद गाड़ी का आकार थोड़ा और बड़ा करने की आरजू होगी मन में। कुछ पैदल आए हैं। घर से चले थे कुछ और कामनाएं थीं। बाबा के दरबार में कुछ बिगड़ी संवारने की गुहार लगाने आए थे। गाड़ी वालों को देखकर प्रार्थनाओं में एक और प्रार्थना का इजाफा हो गया। भगवान एक गाड़ी भी दिला दे।
उधर मंदिर की गली में भिखारियों का रेला लगा है। श्रद्धालुओं से एक-दो रुपए पा जाने की आस में उनके लिए दुआओं की झोली खाली कर डाल रहे हैं। हैरानी होती है कि ये भी किससे मांग रहे हैं? उससे, जो खुद भगवान से मांगने आया है। दुनिया की रीत है। एक भिखारिन अपनी दिन भर की जमा-पूंजी समेट रही है। गठरी बनाकर उसे सिरहाने बड़े जतन से रखती और उसी पर सिर रखकर सो जाती है। मेरे मन में सवाल उठता है, भगवान के दरबार में भी इतना डर। मगर वह शायद प्रैक्टिकल है। भगवान उसके लिए एक साधन मात्र हैं। उसे बस इतना पता है कि अगर भगवान नहीं होंगे तो भक्त यहां नहीं आएंगे और जब भक्त नहीं आएंगे तो उसका पेट भरना मुश्किल हो जाएगा।
इस सारे नजारे के बीच मैं अपने दो वरिष्ठ साथियों मयंक जी और पुनीत जी के साथ गंगा के घाट की तरफ चला जा रहा हूं। यह प्रोग्राम भी कोई तयशुदा नहीं था। खाना खाते-खाते अचानक बन गया था। घाट की तरफ मिलने से पहले मयंक जी का प्रस्ताव आता है, ठंडाई पियोगे। अचानक दो साल पहले का वाकया याद आ जाता है। तब मैं यहां नया था। एक रात ऐसे ही कुछ वरिष्ठों के साथ ठंडाई पीने का प्रोग्राम बना था। कुछ लोगों ने भांग वाली ठंडाई पी। मुझसे तो बताया गया कि तुम्हारी ठंडाई में भांग नहीं है, पर पता नहीं क्यों मुझे यकीन नहीं हुआ। रूम पर लौटा तो रात के 3 बजे तक हंसता ही रहा था।
खैर, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। ठंडाई पीने के बाद हम गंगा जी के घाट पर पहुंच गए। बरसात के पानी से उफनाई गंगा जी। आधी रात का वक्त। लहरें खामोश, मगर फिर भी उपस्थिति का आभास कराती हुईं। थोड़ा सा कोलाहल करते हुए। पार्श्व में भी कोलाहल तेज है। फिल्मी धुनों पर तैयार किए गए भक्ति गीत बज रहे हैं। घाटों के ठीक पीछे बने टीनशेड में कुछ साधु आराम करते हुए। कुछ मुसाफिर भी हैं शायद।
तभी मेरी मोबाइल में गाना बजता है, 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है'। गुलाम अली की मदभरी आवाज इस माहौल में एक अलग ही समां बांधने लगी। गुलाम अली के सुर बुलंद हो रहे हैं, गीत रफ़्तार पकड़ रहा है,
'चोरी-चोरी हमसे आकर, तुम मिले थे, जिस जगह, मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है।'
मानों पीछे से आ रहे भक्ति गीतों का शोर, सामने गंगा की लहरों का कोलाहल और गुलाम अली के सुर जुगलबंदी करने लगे हों। एक अलग तरह का फ्यूजन। हम तीनों में से कोई बोल नहीं रहा है। बस सभी उस माहौल को जितना भी हो सके जी लेना चाहते हैं। मगर शायद पुनीत जी इस माहौल को यहीं छोड़ देने के मूड में नहीं। वह अपने मोबाइल से इस नजारे को कैद करने में लगे हैं।
करीब आधे घंटे का वक्त बीत चुका है। मन उठने को तैयार नहीं हो रहा। थोड़ी देर इस पल को और जी लेने को जी चाह रहा है, मगर सुबह ऑफिस जाना है। काम करना है। टेंशन-टेंशन। अचानक से रूहानी पल की खूबसूरती छू होने लगती है। हम उठकर चल पड़़ते हैं। गली में भी अब शोर थमने लगा है।
उधर मंदिर की गली में भिखारियों का रेला लगा है। श्रद्धालुओं से एक-दो रुपए पा जाने की आस में उनके लिए दुआओं की झोली खाली कर डाल रहे हैं। हैरानी होती है कि ये भी किससे मांग रहे हैं? उससे, जो खुद भगवान से मांगने आया है। दुनिया की रीत है। एक भिखारिन अपनी दिन भर की जमा-पूंजी समेट रही है। गठरी बनाकर उसे सिरहाने बड़े जतन से रखती और उसी पर सिर रखकर सो जाती है। मेरे मन में सवाल उठता है, भगवान के दरबार में भी इतना डर। मगर वह शायद प्रैक्टिकल है। भगवान उसके लिए एक साधन मात्र हैं। उसे बस इतना पता है कि अगर भगवान नहीं होंगे तो भक्त यहां नहीं आएंगे और जब भक्त नहीं आएंगे तो उसका पेट भरना मुश्किल हो जाएगा।
इस सारे नजारे के बीच मैं अपने दो वरिष्ठ साथियों मयंक जी और पुनीत जी के साथ गंगा के घाट की तरफ चला जा रहा हूं। यह प्रोग्राम भी कोई तयशुदा नहीं था। खाना खाते-खाते अचानक बन गया था। घाट की तरफ मिलने से पहले मयंक जी का प्रस्ताव आता है, ठंडाई पियोगे। अचानक दो साल पहले का वाकया याद आ जाता है। तब मैं यहां नया था। एक रात ऐसे ही कुछ वरिष्ठों के साथ ठंडाई पीने का प्रोग्राम बना था। कुछ लोगों ने भांग वाली ठंडाई पी। मुझसे तो बताया गया कि तुम्हारी ठंडाई में भांग नहीं है, पर पता नहीं क्यों मुझे यकीन नहीं हुआ। रूम पर लौटा तो रात के 3 बजे तक हंसता ही रहा था।
खैर, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। ठंडाई पीने के बाद हम गंगा जी के घाट पर पहुंच गए। बरसात के पानी से उफनाई गंगा जी। आधी रात का वक्त। लहरें खामोश, मगर फिर भी उपस्थिति का आभास कराती हुईं। थोड़ा सा कोलाहल करते हुए। पार्श्व में भी कोलाहल तेज है। फिल्मी धुनों पर तैयार किए गए भक्ति गीत बज रहे हैं। घाटों के ठीक पीछे बने टीनशेड में कुछ साधु आराम करते हुए। कुछ मुसाफिर भी हैं शायद।
तभी मेरी मोबाइल में गाना बजता है, 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है'। गुलाम अली की मदभरी आवाज इस माहौल में एक अलग ही समां बांधने लगी। गुलाम अली के सुर बुलंद हो रहे हैं, गीत रफ़्तार पकड़ रहा है,
'चोरी-चोरी हमसे आकर, तुम मिले थे, जिस जगह, मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है।'
मानों पीछे से आ रहे भक्ति गीतों का शोर, सामने गंगा की लहरों का कोलाहल और गुलाम अली के सुर जुगलबंदी करने लगे हों। एक अलग तरह का फ्यूजन। हम तीनों में से कोई बोल नहीं रहा है। बस सभी उस माहौल को जितना भी हो सके जी लेना चाहते हैं। मगर शायद पुनीत जी इस माहौल को यहीं छोड़ देने के मूड में नहीं। वह अपने मोबाइल से इस नजारे को कैद करने में लगे हैं।
करीब आधे घंटे का वक्त बीत चुका है। मन उठने को तैयार नहीं हो रहा। थोड़ी देर इस पल को और जी लेने को जी चाह रहा है, मगर सुबह ऑफिस जाना है। काम करना है। टेंशन-टेंशन। अचानक से रूहानी पल की खूबसूरती छू होने लगती है। हम उठकर चल पड़़ते हैं। गली में भी अब शोर थमने लगा है।
Friday, September 16, 2011
'दीवार' से मेरा प्यार

शुक्रवार को राहुल द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट को अलविदा कह दिया। हालांकि वनडे से द्रविड़ को पहले ही दूर कर दिया गया था, फिर भी उन्हें आखिरी बार बैटिंग करते हुए देखना खासा भावुक करने वाला पल था। खासकर मेरे जैसे डाईहार्ड फैन के लिए। फिर भी मैं मानता हूं कि द्रविड़ इस मायने में लकी हैं कि उन्हें कम से कम फेयरवेल मैच खेलने का मौका तो मिला। हालांकि इसका एक पहलू और भी है कि इस वक्त भारत को वाकई उनकी जरूरत थी क्योंकि इस इंग्लैंड दौरे पर वही एकमात्र बल्लेबाज थे जो सफल हो पाए थे। द्रविड़ ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ऐलान कर दिया कि यह सिरीज उनकी आखिरी वनडे सिरीज होगी।
मुझे आज भी 1996 का वह दिन याद है। मेरे ऊपर क्रिकेट का खुमार चढ़ना शुरू हो चुका था। अपने से बड़ी उम्र के गांव के लड़कों के साथ जो कि क्रिकेट के दीवाने थे, मैं क्रिकेट की चर्चा किया करता था। इस बात के लिए मुझे कई बार तारीफ, मगर उससे ज्यादा बार आलोचना झेलनी पड़ती। दरअसल गलती आलोचना करने वालों की भी नहीं थी। कक्षा छह में पढ़ने वाले से लोगों से बहस लड़ाने के बजाए, पढ़ाई में ध्यान देने की उम्मीद की जाती है। खैर, यह बातें फिर कभी। फिलहाल सारी बातें सिर्फ और सिर्फ मेरे हीरो द्रविड़ के बारे में।
3 अप्रैल 1996 के दिन भारत का श्रीलंका से मैच था। घर पर मैच देखने की सुविधा नहीं थी, और रेडियो पर चाचा जी कमेंटरी सुन रहे थे। उनके साथ कमेंटरी सुनने का दूर-दूर तक कोई चांस नहीं था। आखिरकार मैंने एक तरीका निकाला और किसी तरह घर से छुपकर निकला और अपने पड़ोसी के घर पहुंच गया। वहां पर मेरे पड़ोसी जो कि रिश्ते में चाचा थे, कमेंटरी सुन रहे थे। मैं भी उनके साथ बैठ गया। सचिन और अजहर का विकेट गिरने पर चौथे नंबर बैटिंग करने के लिए एक नया लड़का राहुल द्रविड़ आया। कमेंटेटर्स के मुंह से राहुल के लिए हमने काफी तारीफ सुनी। यहीं से इस नाम के प्रति मुझे एक अजीब तरह का लगाव पैदा हुआ। इसकी कई वजहें थीं। दरअसल इतिहास की किताब में मैंने द्रविण सभ्यता के बारे में सुना था। राहुल द्रविड़ का नाम सुनकर सोचा कहीं यह द्रविण सभ्यता से तो नहीं आया है। बहरहाल यह तो बचपन की समझ का कुसूर था। खैर वह दिन द्रविड़ का नहीं था और सिर्फ 3 रन बनाकर आउट हो गए। हालांकि बाद में उन्होंने फील्डिंग करते हुए दो कैच पकड़े और इंडियन टीम ने वह मैच भी जीता था।
अगले दिन अखबारों में राहुल द्रविड़ की फोटो ढूंढ रहा था, पर उन्होंने उस मैच में ऐसा कुछ खास किया नहीं था कि उनकी फोटो छपती। बाद में जब घर पर टीवी आई तो फिर राहुल द्रविड़ की बैटिंग देखने को मिली। फिर तो मैं उनका मुरीद होता चला गया। द्रविड़ की स्टाइल को लेकर अक्सर मेरी दोस्तों से लड़ाईयां भी हुई हैं। उन्हें ठुकठुक बल्लेबाज बताकर उनकी खिंचाई करते और मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता। खैर, आने वाले वक्त में द्रविड़ ने साबित किया कि वह तेजी से रन भी बना सकते हैं। आज भारत की तरफ से दूसरा सबसे तेज पचासा लगाने वाले द्रविड़ ही हैं।
वनडे में द्रविड़ की जगह लेने के लिए कई चेहरे हैं। विराट कोहली से लेकर, रोहित शर्मा, अजिंक्या रहाणे, एस बद्रीनाथ समेत कई नाम हैं। मगर असली समस्या तब शुरू होगी जब द्रविड़ टेस्ट से संन्यास लेंगे। वहां पर उनकी जगह लेने वाले खिलाड़ी को वाकई बड़े टेस्ट देने होंगे। बहरहाल जो खिलाड़ी हैं उनमें मैं चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली को उनकी जगह लेने के लिए आदर्श मानता हूं। मेरा मानना है कि इन दोनों में इतनी पोटेंशियल है कि वे द्रविड़ की जगह भर सकते हैं।
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