
शुक्रवार को राहुल द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट को अलविदा कह दिया। हालांकि वनडे से द्रविड़ को पहले ही दूर कर दिया गया था, फिर भी उन्हें आखिरी बार बैटिंग करते हुए देखना खासा भावुक करने वाला पल था। खासकर मेरे जैसे डाईहार्ड फैन के लिए। फिर भी मैं मानता हूं कि द्रविड़ इस मायने में लकी हैं कि उन्हें कम से कम फेयरवेल मैच खेलने का मौका तो मिला। हालांकि इसका एक पहलू और भी है कि इस वक्त भारत को वाकई उनकी जरूरत थी क्योंकि इस इंग्लैंड दौरे पर वही एकमात्र बल्लेबाज थे जो सफल हो पाए थे। द्रविड़ ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ऐलान कर दिया कि यह सिरीज उनकी आखिरी वनडे सिरीज होगी।
मुझे आज भी 1996 का वह दिन याद है। मेरे ऊपर क्रिकेट का खुमार चढ़ना शुरू हो चुका था। अपने से बड़ी उम्र के गांव के लड़कों के साथ जो कि क्रिकेट के दीवाने थे, मैं क्रिकेट की चर्चा किया करता था। इस बात के लिए मुझे कई बार तारीफ, मगर उससे ज्यादा बार आलोचना झेलनी पड़ती। दरअसल गलती आलोचना करने वालों की भी नहीं थी। कक्षा छह में पढ़ने वाले से लोगों से बहस लड़ाने के बजाए, पढ़ाई में ध्यान देने की उम्मीद की जाती है। खैर, यह बातें फिर कभी। फिलहाल सारी बातें सिर्फ और सिर्फ मेरे हीरो द्रविड़ के बारे में।
3 अप्रैल 1996 के दिन भारत का श्रीलंका से मैच था। घर पर मैच देखने की सुविधा नहीं थी, और रेडियो पर चाचा जी कमेंटरी सुन रहे थे। उनके साथ कमेंटरी सुनने का दूर-दूर तक कोई चांस नहीं था। आखिरकार मैंने एक तरीका निकाला और किसी तरह घर से छुपकर निकला और अपने पड़ोसी के घर पहुंच गया। वहां पर मेरे पड़ोसी जो कि रिश्ते में चाचा थे, कमेंटरी सुन रहे थे। मैं भी उनके साथ बैठ गया। सचिन और अजहर का विकेट गिरने पर चौथे नंबर बैटिंग करने के लिए एक नया लड़का राहुल द्रविड़ आया। कमेंटेटर्स के मुंह से राहुल के लिए हमने काफी तारीफ सुनी। यहीं से इस नाम के प्रति मुझे एक अजीब तरह का लगाव पैदा हुआ। इसकी कई वजहें थीं। दरअसल इतिहास की किताब में मैंने द्रविण सभ्यता के बारे में सुना था। राहुल द्रविड़ का नाम सुनकर सोचा कहीं यह द्रविण सभ्यता से तो नहीं आया है। बहरहाल यह तो बचपन की समझ का कुसूर था। खैर वह दिन द्रविड़ का नहीं था और सिर्फ 3 रन बनाकर आउट हो गए। हालांकि बाद में उन्होंने फील्डिंग करते हुए दो कैच पकड़े और इंडियन टीम ने वह मैच भी जीता था।
अगले दिन अखबारों में राहुल द्रविड़ की फोटो ढूंढ रहा था, पर उन्होंने उस मैच में ऐसा कुछ खास किया नहीं था कि उनकी फोटो छपती। बाद में जब घर पर टीवी आई तो फिर राहुल द्रविड़ की बैटिंग देखने को मिली। फिर तो मैं उनका मुरीद होता चला गया। द्रविड़ की स्टाइल को लेकर अक्सर मेरी दोस्तों से लड़ाईयां भी हुई हैं। उन्हें ठुकठुक बल्लेबाज बताकर उनकी खिंचाई करते और मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता। खैर, आने वाले वक्त में द्रविड़ ने साबित किया कि वह तेजी से रन भी बना सकते हैं। आज भारत की तरफ से दूसरा सबसे तेज पचासा लगाने वाले द्रविड़ ही हैं।
वनडे में द्रविड़ की जगह लेने के लिए कई चेहरे हैं। विराट कोहली से लेकर, रोहित शर्मा, अजिंक्या रहाणे, एस बद्रीनाथ समेत कई नाम हैं। मगर असली समस्या तब शुरू होगी जब द्रविड़ टेस्ट से संन्यास लेंगे। वहां पर उनकी जगह लेने वाले खिलाड़ी को वाकई बड़े टेस्ट देने होंगे। बहरहाल जो खिलाड़ी हैं उनमें मैं चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली को उनकी जगह लेने के लिए आदर्श मानता हूं। मेरा मानना है कि इन दोनों में इतनी पोटेंशियल है कि वे द्रविड़ की जगह भर सकते हैं।
मेरे जैसे खेल-मैदान से अनभिज्ञ के लिए भी राहुल द्रविड़ एक 'कौतूहल' हैं. मैं उन्हें खेल और जीवन के बीच सामंजस्य स्थापित करने वाले किरदार के रुप में देखता हूं.जिस 'दीवार' की बात हर कोई करता है, उससे काफी कुछ सीखना है हम सब को। टुकटुकी भर कह देने से सच्चाई से हम मुंह नहीं मोड़ सकते। ऐसे अवसरों पर ही जीवन में धैर्य की अचूक परीक्षा होती है। आपका पोस्ट पसंद आया। द्रविड़ से 'आसक्ति'बनाए ऱखें। -साधुवाद
ReplyDelete