
Thursday, April 8, 2010
इन हिंदी कमेंटेटरों से बचाओ

Saturday, April 3, 2010
बेहतरीन प्रयास

लम्बे समय बाद फिर से चिटठा जगत में वापसी कर रहा हूँ। पिछले दिनों लव सेक्स और धोखा देखने गया था। साथ में कुछ दोस्त भी थे। सभी को फिल्म के बारे में एक ख़ास किस्म की एक्साईटमेंट था। ऐसा शायद फिल्म के टाइटल को लेकर था। फिल्म देखने आई भीड़ के मन भी यह बात ज़रूर रही होगी। लेकिन फिल्म शुरू होने के साथ ही लोगों का उत्साह ख़त्म होने लगा। इसके दो कारन थे। एक तो फिल्म बनाए का तरीका। दुसरे दूसरे फिल्म में वह सारे मसाले मौजूद नहीं थे जिसकी उम्मीद लेकर ज्यादातर दर्शक गए थे। आलम यह था की इंटरवल के वक्त आधे लोग या तो सो रहे थे या फिर बोर हो रहे थे। मेरे साथ गए दोस्तों का भी यही हाल था। कई लोग तो फिल्म बीच में ही छोड़कर चलते बने। हालाकि फिल्म मुझे काफी पसंद आई। फिल्म को बनाने के बंधे-बंधाए तरीके को छोड़कर जिस तरह से एक नया तरीका अपनाया गया था उसे देखकर मन खुश हो गया। हालांकि दोस्त बार-बार कह रहे थे यार कहां से फंस गए। मुझे फिल्म में कई बातें पसंद आईं। मसलन एक नए तरीके से स्टोरी को पेश किया गया था। सबसे बड़ी बात कि फिल्म में कुछ उन घटनाओं को उठाया गया था जिनसे कभी ना कभी हम रूबरू हो चुके हैं। मूविंग केमरे और सीसीटीव केमरे के जरिए फिल्म की शूटिंग का ख्याल तो अभी तक शायद किसी को जेहन में आया ही नहीं रहा होगा। अगर आया भी होगा तो ऐसा करने के लिए काफी साहसी होना पड़ता है। दिबाकर बनर्जी ने यह साहस दिखाया इसके लिए उनकी तारीफ होनी चाहिए।
Saturday, February 13, 2010
हाए हाए ये वैलेन्ताईन

Wednesday, January 20, 2010
ये कैसा खेल है भाई
खेल को हमेशा दिलों को जोड़ने वाला माना जाता है। लेकिन हाल ही में आईपीएल की नीलामी के दौरान जो देखने में आया उसे शुभ संकेत तो नहीं माना जा सकता। जिस तरह से नीलामी के दौरान पाकिस्तानी खिलाडियों के साथ भेदभाव हुआ उसने कई सवाल खड़े कर दिए हैं। हालंकि यह भी सच है कि कई देशों के खिलाडी नहीं बिके लेकिन अफरीदी जैसा बड़ा नाम न बिके वह भी टी-२० फार्मेट में तो कहीं न कहीं कुछ गड़बड़ तो जरूर है। हो सकता है कि खिलाडियों के नाम लिस्ट में शामिल ही न रहे हों। या फिर यह भी हो सकता है कि टीम मालिकों से कह दिया गया हो कि पाकिस्तानी खिलाडियों को न खरीदें। फिर अगर ऐसा ही करना था तो पहले आईपीएल में ही पाक खिलाडियों को न खिलाते। खैर सच जो भी हो लेकिन एक बात साफ है कि इससे क्रिकेट जगत में बहुत ही ख़राब मैसेज गया है। कुछ लोग कह रहे हैं कि चूंकि पाकिस्तानी खिलाडियों कि उपलब्धता सुनिश्चित नहीं थी इसलिए ऐसा हुआ होगा। अगर ऐसी बात थी तो फिर पाकिस्तानी खिलाडियों को नीलामी में शामिल ही नहीं करना चाहिए था। इस तरह से पूरी दुनिया के सामने जलील करने का क्या तुक। सियासी महकमे का कहना है कि वह इस मामले पर कुछ नहीं कह सकती क्योंकि आईपीएल एक निजी संस्था है।
शायद आप में से बहुत लोगों को लगे कि मैं पाकिस्तानी खिलाडियों कि कुछ ज्यादा ही तरफदारी कर रहा हूँ, लेकिन एक बात बता दूं अगर एक आम दर्शक से पूछेंगे तो वह भी आह भरते हुए कहेगा, यार अफरीदी को शामिल कर लेते, क्या लम्बे-लम्बे छक्के लगाता है। सच कह रहा हूँ, आम आदमी को इन बातों से कोई मतलब नहीं कि सियासत किस बात कि मंज़ूरी देती है किस बात को नहीं। वह तो बस शोएब अख्तर कि गेंद पर सचिन को सिक्स लगाते देखना चाहते हैं। पाकिस्तानी खिलाडियों का इस तरह आईपीएल से दूर हो जाना आम दर्शक के लिए नुक्सान की बात है। Friday, January 15, 2010
नाटक जारी है कसाब का

Thursday, January 14, 2010
बच्चा कमीना कैसे है गुलज़ार साहब
ऐसी उलझी नज़र उनसे हटती नहीं,
बच्चे मन के सच्चे, सारी जग के आँख के तारे Wednesday, January 13, 2010
हाकी की तो हो गयी न ऐसी कि तैसी
हमारा नेशनल गेम क्या? हाकी । आठ ओलंपिक मेडल हमने किस गेम में हासिल किये जवाब एक बार फिर आयेगा हाकी। लेकिन ज़रा इसके खिलाडियों की दशा देखिये। शर्म से चेहरा लाल हो जायेगा। अफ़सोस उनका नहीं होता जो इस हालत के लिए जिम्मेदार हैं। वर्ल्ड कप सर पर है। पूरी दुनिया के सामने देश कि इज्ज़त दांव पर लगी है और खिलाडी अभ्यास करने के बजाय मुंह फुलाये बैठे हैं। वजह हाकी इंडिया ने उनका पुराना पैसा नहीं चुकाया है । पैसा न मिलने को लेकर जिस तरह से हाकी खिलाडियों के बगावत की उसकी पैरोकारी मैं भी नहीं करता, लेकिन सवाल पैदा होता है कि आखिर इसकी नौबत आई ही क्यों? जो खिलाडी लगातार देश के लिए खेल रहा है। अपने हुनर से देश के लिए सम्मान अर्जित कर रहा है उसे देने के लिए हाकी इंडिया के पास पैसा ही नहीं है। एक दोस्त ने टिप्पणी की ऐसे सिर्फ इंडिया में ही हो सकता है।
अभी एक चैनल पर खबर चल रही थी कि हाकी इंडिया का खज़ाना भरा पड़ा है इसके बावजूद वह खिलाडियों को पैसे देने में आनाकानी कर रहा है। अगर यह सच है तो फिर इससे बड़ी शर्म कि बात क्या हो सकती है। शाहरुख़ खान ने सही ही कहा। हम अपने खिलाडियों को पैसे और सुविधाएँ तो दे नहीं पाते पर उम्मीद करते हैं कि वो गोल्ड मेडल ही जीतें। ये कैसे मुमकिन है। ऐसे समय में जब पूरी दुनिया में हाकी तरफ पर खेली जा रही है भारत में गिने चुने ही तरफ मैदान हैं। इसके दूसरी उच्चस्तरीय सुविधाओं कि बात तो छोड़ दीजिये।