Wednesday, March 9, 2011
बीबीसी की याद में
खैर, जेहन में बीबीसी की कई बातें आज भी ताज़ा हैं। मैं छठी या सातवीं में पढता था। घर में बीबीसी खूब सुनी जाती थी। (अभी भी चाचा जी सुनते हैं ) शाम को साढ़े सात बजते ही रेडियो पर बीबीसी की सिंग्नेचर ट्यून बजती, और फिर आवाज आती, 'बीबीसी की तीसरी सभा में आपका स्वागत है, मैं मधुकर उपाध्याय, इस सभा .........पहले आप सुनिए अन्तराष्ट्रीय समाचार......और फिर जैसे ही समाचार ख़त्म होते, सिंग्नेचर ट्यून बजती और रेडियो से पहले मैं बोल उठता, 'आज कल' सच एक जूनून था। जैसे जैसे बड़ा होता गया ये जूनून एक मुकम्मल नशा बन गया। अचला शर्मा, रेहान फजल, ब्रजेश उपाध्याय, ममता गुप्ता, और भी कई नाम। मैं इन्हें सुनता और बाद में इनकी नक़ल करता। कहना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता में आने कि लगन यहीं से लगी....
ये तो बीते दिनों कि यादें है। अब तो कभी कभी ही बीबीसी सुन पता हूँ, मिस तो करता ही हूँ........
Tuesday, February 22, 2011
प्रियंका के खूबसूरत गुनाह
एक हसीना, सात खून, मगर चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं। हर खून के साथ प्रियंका का
हुस्न और भी निखरता गया। इसी तरह उनका अभिनय भी। आगे चलकर प्रियंका की बेहतरीन फिल्मो में शामिल होगी सात खून माफ़। जहाँ तक विशाल भरद्वाज की बात है तो, वह तो उस्ताद ही हैं। प्रियंका ने अपने रोल के साथ पूरी तरह से इंसाफ किया है। एक महिला की अधूरी ख्वाहिशों को उन्होंने बड़े ही शानदार तरीके से परदे पर उतारा है। सुजैना के रूप में हमारे सामने एक ऐसी महिला है जिसके पास खूब सारी दौलत , नौकर चाकर हैं, उसके हर हुक्म की तामील होती है। मगर फिर भी वह खुद को अधूरा महसूस करती है । एक जिद है। सपनो को लेकर उसके अन्दर एक तड़प वह। वह चाहती है कि कोई मिले उसे जो मोहब्बत के मतलब बताये, जिंदगी के सफ़र में उसका सहारा बने। मगर स्वार्थी पुरुषों की दुनिया में उसे हर बार निराश होना पड़ता है। अपने पात्र के हर अक्स को उभरने में प्रियंका सफल रही हैं। हर भाव की कसक उनके चेहरे पर साफ झलकती है। निश्चित तौर पर विशाल तारीफ़ के हक़दार हैं की उन्होंने प्रियंका से शानदार कम लिया है।
पहले भी वह ऐसी शानदार फिल्मे बना चुके हैं और आने वाले वक्त में कुछ और शानदार फिल्मे देखने को मिलेंगी, प्रियंका से भी, विशाल से भी...........
Sunday, December 5, 2010
हाँ हममें है दम
खाई ऐसा कुछ हुआ नहीं और गंभीर की अगुवाई में टीम ने बड़ी आसानी से न्यूजीलैंड की टीम को हार का स्वाद चखाया और सीरिज पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौरान टीम का प्रदर्शन खासा अच्छा रहा। खुद कप्तान गंभीर ने मोर्चे से अगुवाई की और टीम को कहीं से भी सचिन, सहवाग, धोनी और दूसरे बड़े खिलाडियों की कमी महसूस नहीं होने दी। उनके अलावा विराट कोहली, युसूफ पठान, श्रीसंत, आर आश्विन और दूसरे खिलाडियों ने भी कहीं से निराश नहीं किया।
भारतीय टीम के युवाओं की यह जीत दिखाती है कि टीम अब पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है। मुझे पिछले समय के दिन याद आते है। जब टीम पूरी तरह सचिन पर निर्भर हुआ करती थी। बाहर करते ही बल्लेबाजी धडाम हो जाया करती थी। अब टीम उस दुआर को काफी पीछे छोड़ चुकी है। यह ये दिखाता है कि हमारी युवा पीढ़ी कितनी मजबूत है। बढ़ो इंडिया वर्ल्ड कप जीत लो!
Friday, December 3, 2010
'शूल' के बहाने
Thursday, November 4, 2010
बस 'एक' मौत !
घर लौटते हुए मेरी गली में कुछ रोना सुनाई दिया। मैंने एक आदमी से पूछा क्या हुआ? उसने कहा एक आदमी मर गया है। उसीके गम में सब लोग रो रहे हैं। मरने वाले की बीवी, अलग... बेटा अलग और दूसरे घर वाले अलग। उनकी तो दुनिया ही उजाड़ गई थी। मेरे दिमाग में अपने सर की बातें घूमने लगीं। 'एक ही आदमी तो मरा है...'
Tuesday, November 2, 2010
आफर्स कि बरसात है, जमकर लूटिये
वैसे सिर्फ मोबाइल ही क्यों। आफर का बाज़ार तो हर जगह सजा है। किसी गली कूचे में निकल जाइये बस बहार ही बहार । टीवी से लेकर मोबाइल, बर्तन, कपडा, हर जगह। कहीं १० परसेंट कि छूट है तो कहीं ५० परसेंट तक आफ । लूटने का पूरा मौका बिखरा पड़ा है। कैसी अजीब बात है ना कि तमाम कम्पनियां खुद को लुटवाने को तैयार बैठी है। आओ आओ हमें लूटो, लूट आफर, नोच खसोट के ले जाओ। और पब्लिक भी मौका ताड़े बैठे है। चलिए अच्छा है। वो लुटवा रहे हैं, आप भी लूटिये।
Tuesday, October 5, 2010
लक्ष्मण तुम्हे सलाम!
इंडिया और ऑस्ट्रेलिया के बीच मोहाली टेस्ट ख़त्म होने के बाद हमारी ऑफिस में एक सीनियर ने कहा याद रखियेगा लक्ष्मण को मैन ऑफ़ द मैच का अवार्ड नहीं मिलेगा। और सच में नहीं मिला।वी वी एस लक्ष्मण, एक ऐसा नाम जिसके नाम कई ऐसे रेकॉर्ड्स हैं जिसके लिए हर बैट्समैन लालायित रहता है। जब टीम के सभी बल्लेबाज आउट हो चुके होते हैं तो लक्ष्मण उभर कर सामने आते है। जिस ऑस्ट्रेलिया के सामने दुनिया भर के बल्लेबाज खौफ खाते हैं, उसी ऑस्ट्रेलिया के सामने लक्ष्मण अपना बेस्ट देते है। १७३, २८१, और मोहाली में खेली गयी ७३ रनों कि पारियां तो महज मिसाल है। दरअसल लक्ष्मण उस चट्टान का नाम है जो मुश्किलों के सामने और मजबूत हो जाती है।
इन सभी बातों के बावजूद इसे लक्ष्मण का दुर्भाग्य ही कहेंगे कि उन्हें वह नाम और शोहरत नहीं मिली जिसके वास्तव में वो हक़दार हैं। शायद इसका कारन यह है कि लक्ष्मण उस दौर में टीम इंडिया का हिस्सा बने जब सचिन, गांगुली और द्रविड़ जैसे बड़े नाम टीम में थे। इनकी परछाई में लक्ष्मण कि तमाम उपलब्धियां दब कर रह गई। लेकिन इन बातों से बेपरवाह लक्ष्मण सिर्फ अपने काम में लगे रहे। जब भी जरूरत हुई उनके बल्ले से खूब रन बरसे।
यहाँ इस बात पर ध्यान देने कि जरूरत है कि जब टीम को जरूरत थी। सचिन ने भले ही बहुत ज्यादा रन बनाये हों, रेकार्डों का पहाड़ खड़ा किया हो, लेकिन बहुत कम मैच सचिन ने जितायें है। जब जब टीम को उनसे आशा थी निराशा ही हाथ लगी। द्रविड़ जरूर मिस्टर भरोसेमंद का तमगा पायें हैं लेकिन यह भी याद रखिये कि द्रविड़ नंबर तीन पर बत्टिंग करने आते है। वह उन्हें दूसरे बल्लेबाजों का साथ मिल जाता है, मगर लक्ष्मण कि कहानी जरा अलग है। वह पांचवें या छठे नंबर पर बल्लेबाजी करने आतें हैं। यहाँ अकसर उन्हें पुछल्ले बल्लेबाजो का ही साथ मिलता है। ऐसे में चुनौती और भी बड़ी हो जाती है।
यह देश का दुर्भाग्य है कि उन्हें एक दिवसीय मैचों में ज्यादा मौके नहीं मिले और चयन कर्ताओं ने उन्हें टेस्ट बल्लेबाज बना के रख दिया। लक्ष्मण कि स्टाइल भी खूबसूरत है। वह अजहर को अपना आदर्श मानते हैं और उसी स्टाइल में बल्लेबाजी करते हैं। कलाइयों कि उनकी जादूगरी किसी का भी मन मोह लेती है। भले ही उनके नाम बहुत सारे रिकॉर्ड ना हों, बहुत सारे अवार्ड ना हों, पर जब भी इंडिया कि कुछ शानदार जीत कि चर्चा चलेगी, लक्ष्मण का नाम खुद बा खुद जुबान पर आ जायेगा। लक्ष्मण तुम्हे सलाम!