दीपक की बातें

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Wednesday, June 27, 2012

पिंकियों का मुसीबत काल

Published in News Today

डिसक्लेमर- तमाम पिकिंयों से हार्दिक क्षमाप्रार्थना। आग्रह है कि इसे दिल पर ना लें, दिमाग से ही निबटा दें।

जबसे पता चला है कि 'पिंकी' महिला नहीं बल्कि पुरुष है, भारी मुसीबत खड़ी हो गई है। तमाम 'पिंकी' नाम की लड़कियों के ब्वॉयफ्रेंड उन्हें शक की निगाहों से देखने लगे हैं। बार-बार फोन करके और अन्य तरीकों से पुष्टि कर लेना चाहते हैं कि 'पिंकी' कहीं 'पिंका' तो नहीं। इन ब्वॉयफ्रेंडों का शक तब और गहरा होने लगता है जब उनकी 'पिंकी' नामक गर्लफ्रेंड दौड़ती नजर आती है। अपनी 'पिंकी' के चेहरे में उन्हें वही 'पिंकी' नजर आने लगती है जिसपर शक है कि वह 'पिंका' है। अगर ब्वॉयफ्रेंड अकेले फिल्म देखने के लिए बुलाता है और 'पिंकी' ना जाए तो ब्वॉयफ्रेंडों का शक और गहरा हो जा रहा है। एेसे में जिन ब्वॉयफ्रेंडों की गर्लफ्रेंडों का नाम 'पिंकी' है, उनके फ्रेंडों में भी यह बड़ी चर्चा का विषय है। भाई लोग अपने ही यार का मजाक उड़ाए डाल रहे हैं। अबे, देख लियो फिर मामला गड़बड़ ना हो जाए। अब बेचारे ब्वॉयफ्रेंड मुंह छुपाए घूम रहे हैं। एक भाई की गर्लफ्रेंड का नाम 'पिंकी' है। उसने अल्टीमेट उपनाम निकाला है अपनी गर्लफ्रेंड के लिए। किसी से इंट्रोडक्शन कराना हो तो कहता है, ये 'छुई-मुई' है।

लड़कों के परिजनों और प्रियजनों ने भी उन्हें चेतावनी दे डाली है। बेटा चाहे जो कर लेना पर किसी 'पिंकी' के चक्कर में ना पडऩा। बाद में लेने के देने पड़ जाएंगे, पता चला उधर 'पिंकी' मेडल और तमगे हासिल कर रही है और इधर तुम्हारा घर बर्बाद हो रहा है।

दिलचस्प बात यह है कि सिर्फ ब्वॉयफ्रेंड ही नहीं, तमाम पति भी अपनी 'पिंकी' नाम की पत्नियों का नए सिरे से निरीक्षण-परीक्षण करने में जुट गए हैं। संयोगवश एक जनाब मिल गए जिनकी पत्नी का नाम 'पिंकी' था। बेचारे बेहद मायूस से नजर आए। पूछने पर पता चला कि भाई मामला तो ओके टेस्टेड है कि 'पिंकी' ही है, लेकिन जब हाथ में बेलन होता है वह किसी भी पिंका से ज्यादा खतरनाक नजर आती है।

उधर इस सिचुएशन में बेचारी पिंकियां भी परेशान हैं। एक 'पिंकी' नामक लड़की अपनी सहेली से बात कर रही थी। क्या मुसीबत है यार। पता नहीं कहां से 'पिंकी' टपक पड़ी। अगर ब्वॉयफ्रेंड के साथ घूमते वक्त गलती से भी किसी लड़की की तरफ निगाह चली जाती है तो ब्वॉयफ्रेंड अजीब हरकतें करने लगता है। ब्वॉयफ्रेंड के साथ होते हुए किसी सहेली का फोन आ जाए तो भी मुसीबत। कितनी सफाई देनी पड़ती है। वह बताए जा रही है। पता है मैं इस बार अपने स्कू  ल के एथलेटिक्स इवेंट में पार्टिसिपेट करने वाली थी, लेकिन अब आइडिया ड्रॉप कर दिया है। ख्वामखाह कंट्रोवर्सी नहीं चाहती। बेचारी पिंकियां।

(Published in News Today)

Thursday, May 24, 2012


महंगाई बनी सौतन
 
झुलनी, नथुनी, कंगना सपना
सपना सैर सपाटा,
महंगाई को देखकर खुशियों ने कर ली जीवन से टाटा।

सजनी हैं हैरान सजनवा इतना पैसा पाते
फिर काहे को घर में चीजें थोड़ी-थोड़ी लाते
क्‍या कोई सौतनिया आ गई मेरे जीवन में?
सोचके उनके दिल में लग गया भारी कांटा।

सजना हैं हैरान, जुटाते तिनका-तिनका सामान
सह रहे झिड़की और अपमान
कितनी भी कंजूसी कर लें खर्च ना पूरा पड़ता
घरवाली के नखरे जैसी बढ़ती ये महंगाई

इसी बीच पत्‍नी ने आकर आशंका जतलाई
क्‍योंजी पैसा कहां खरचते, घर में चीज एक ना आई
सुनकर ये बातें सजना ने पीट लिया है माथा
तुम्‍हें नहीं मालूम है कितनी बढ़ गई महंगाई?

रोज-रोज तो दाम हैं बढ़ते, पर ना कमाई बढ़ती
100 रुपए में भी अब तो सब्‍जी कम ही चढ़ती
तुम्‍हीं बताओ इतने पैसे में मैं कितना ला पाता
कहते-कहते भैया जी को आने लगी रुलाई

सुनकर सबसे पहले तो पत्‍नी थोड़ा सा मुस्‍काई
पतिदेव के समझ में लेकिन बात नहीं ये आई
मैं नाहक शक कर बैठी तुमपर, सोचा कोई सौतन है
पर इस युग में तो मेरी सौत बनी महंगाई

कार्टून- साभार
 

Wednesday, May 9, 2012

बारिश और 'मिनी मुंबई' में मैजिक का सफर


रीगल टू एलआईजी वाया पलासिया

बारिश मिजाज पर बहुत असर डालती है। आसमान से बूंदें जब जिस्म पर गिरती हैं तो वाकई मिजाज खुश हो जाता है। लेकिन जैसे ही यह बूदें जमीन पर गिरकर कीचड़ बनाती हैं सारा मिजाज बेकार हो जाता है। कल शाम की बारिश ने भी शहर के साथ-साथ मेरे मिजाज पर असर डाला। करीब चार बजे से शुरू हुआ गरज-चमक का सिलसिला बूंदा-बांदी और फिर मूसलाधार बारिश में तब्दील हो गया। अपने कमरे में अनमना सा बैठा मैं बारिश रुकने का इंतजार कर रहा था, ताकि बाहर निकलकर कुछ घूम-घाम सकूं। हालांकि बारिश के बाद अफरा-तफरी और फिर कीचड़ के चलते थोड़ी हिचक भी हो रही थी। फिर कहीं पढ़ी एक लाइन याद आई कि बारिश किसी शहर की 'औकात' बता देती है।
इस बहाने को हथियार बनाकर मैंने नासाज तबियत को थोड़ा तसल्ली दी और निकल पड़े 'मिनी मुंबई' की पड़ताल करने।

निकलते ही कदम कीचड़ में
सिख मोहल्ला से निकलकर पलासिया के लिए मैजिक पकडऩे की प्लानिंग बनाई। मगर गली में कीचड़ देख मूड बिगड़ गया। सिर मुड़ाते ही ओले की जगह कदम निकालते ही कीचड़ में पांव की कहावत बन गई। खैर, इनसे जूझते गुरुद्वारे के करीब पहुंचे और खुशकिस्मती से तुरंत ही मैजिक मिल भी गई। इस बीच जगह-जगह जमा पानी और गाडिय़ों की बेतरतीबी देख अंदाजा हो गया कि सफर आसान नहीं होने वाला।

दुनिया की चिंता मैजिक में बैठकर
अभी मैजिक गांधी हॉल के करीब पहुंची थी कि बारिश तेज हो गई। हाथ बाहर निकालकर चखने की कोशिश की, मगर वो स्वाद नहीं मिला। बाहर बरसात और मैजिक में बातों की बारिश हो रही थी। एक अम्मा जी की चिंता जायज थी- चलो भगवान सबकी सुनता है। बरसात हो गई अब पानी की समस्या कुछ सुलझेगी। मगर इसके काउंटर में जो समस्या आई वह ज्यादा चिंताजनक थी। मैजिक में ही बैठे एक सज्जन ने सवाल उठाया, मगर उन किसानों का क्या जिनकी फसल बर्बाद हो जाएगी। फिर इसका असर गेहूं के दाम पर भी तो पड़ेगा। अचानक महंगाई का दानव और प्रबल होता दिखा और जिस बारिश का मैं लुत्फ उठाना चाह रहा था वह विलेन नजर आने लगी।

बदहाल ट्रैफिक, बेहाल लोग
शनिवार की शाम बारिश ने कईयों का मजा किरकिरा किया। ऑफिस से जल्दी घर जाकर फैमिली के साथ आउटिंग का प्लान भी फेल हुआ। वहीं बारिश के चलते ट्रैफिक भी बदहाल नजर आया। जगह-जगह पानी भर जाने से भी लोग परेशान हाल रहे। टीआई के आस-पास, छप्पन और पलासिया में सड़कों किनारे लगे पानी के चलते मुश्किलें थीं। जिनके पास अपने वाहन थे, वह भी और जो पब्लिक कनवेंस के भरोसे थे वह भी बेहाल। किसी भी तरह अपनी मंजिल तक पहुंचाने वाले वाहन पर लद जाने की बेकरारी और अफरातफरी दिखी।

'सिचुएशनल' गाली
पलासिया में मैंने एलआईजी के लिए मैजिक बदली, मगर हालात नहीं बदले। बाहर बरसात कभी कम तो कभी तेज हो रही थी। ऐसे में विजयनगर और देवास नाका जाने वालों की बेचैनी समझी जा रही थी। महिला सवारियों की हालत और मुश्किल थी। पलासिया से एलआईजी के बीच ऐसी सवारियां दिखीं। अपोलो के सामने एक बंदे ने परदेसीपुरा के लिए पूछा और जब मैजिक वाले ने विजयनगर बताया तो उसके मुंह से निकली गाली पूरी तरह सिचुएशनल थी। अभी तक सिनेमा में सबकुछ सिचुएशनल देखने की आदत रही, रियल लाइफ में यह अनुभव दिलचस्प रहा।

'मिनी मुंबई' की क्या औकात
खैर, मेरा सफर तो एलआईजी तक ही रहा, लेकिन मैजिक से बाहर निकलते ही जोरदार बारिश ने मेरा इस्तकबाल किया। अब तक अंदर बैठकर जिस नजारे का मैं लुत्फ उठा रहा था, अब उसका भुक्तभोगी था। वैसे मैं अकेले कहां था, तमाम लोग भीग रहे थे। कुछ शौकिया तो कुछ मजबूरन।
अपनी मंजिल की तरफ बढ़ते हुए मैं सोच रहा था, किस बात की 'मिनी मुंबई' यार! वही कीचड़, वही खराब ड्रेनेज सिस्टम। जब मेन रोड का यह हाल है तो अंदर की गलियों की बदहाली का आलम क्या होगा? तभी याद आया, बारिश में तो मुंबई भी बेहाल हो जाती है, फिर 'मिनी मुंबई' की क्या औकात?

Published in News Today on 6th May 2012

Sunday, May 6, 2012

बोलो साथी

बोलो साथी
तुम बिन जीना मुश्किल कैसे मर जाना आसान है क्यूँ
मिलने में बरसों लग जाते छुट जाना आसान है क्यूँ
बोलो साथी

बोलो साथी कैसे हैं ये मेल-मिलाप, जुडन-बिछुड़न
साथ हो तो सब अपने लगते दूर हो तो सब अनजान हैं क्यूँ 

बोलो साथी
हम-तुम सपनों की नगरी में कितनी बातें करते हैं
हाथों में हाथों को थामे मीलों चलते रहते हैं
मगर हकीकत की दुनिया में ये सब नाफरमान है क्यूँ
बोलो साथी

एक हमारे दिल हैं, धड़कन, जज्बातों में भाव हैं एक
एक हमारा नाता-रिश्ता, दिल भी एक, चाह भी एक
दो जिस्मों में एक ही दिल है, फिर हम दो इंसान हैं क्यूँ
बोलो साथी

इश्क तुम्हारा इश्क है मेरा, जान तुम्हारी मेरी जान
आँखों में तेरा चेहरा है, कानो में तेरी ही बात
सांसों में तेरी ही सांसें, फिर अलग-अलग पहचान है क्यूँ
बोलो साथी




Deepak Mishra





Monday, April 9, 2012

अनाकरली...डिस्को क्यों चली?


मसला बेहद पेचीदा हो चला है इसलिए जनता दरबार में पेश कर रहा हूं। आखिर ऐसा क्‍या हो गया कि जिस अनारकली के लिए सलीम ने मुगलिया सल्तनत से पंगा ले लिया आज वह उसी सलीम को छोड़-छाड़ कर डिस्को चल दी? मां बदौलत के दरबार में जब सलीम ने बगावत की होगी तो उसे अंदाजा भी नहीं रहा होगा कि वक्त ऐसा भी सितम उस पर ढाएगा।

यह भी ताज्जुब की बात है कि इसी सलीम की मोहब्बत की खातिर कभी अनारकली ने दीवार में चुनवाया जाना कुबूल कर लिया था। मुगलिया दरबार में जिस अनारकली ने 'प्यार किया तो डरना क्या' गाया, आज वही अनारकली बाजार की धुन पर डिस्को में ठुमके लगाने पर आमादा है।

क्यूं अनारकली क्यूं? क्या सलीम की आत्मा बादशाह अकबर की आत्मा को कैसे फेस कर रही होगी? बादशाह अकबर की आत्मा सलीम को सुना रही होगी- देखा शेखू, जिस रक्कासा को तू अपनी महबूबा बनाने की ठाने था उसने कैसे रंग बदल लिए हैं। आखिर उसे बाजार ही रास आया।

वहीं पास में कहीं के आसिफ भी तड़प रहे होंगे, कौन है ये नामाकूल साजिद खान? जिसने हमारी बरसों की मेहनत के बाद बनाई मोहब्बत की पाक दास्तान को यूं नापाक किया है। अनारकली ही मिली थी उसे डिस्को भेजने के लिए? अरे शीला, मुन्नी से लेकर जलेबीबाई तक को तो ये लोग बदनाम कर चुके हैं। अब अनारकली को भी नहीं छोड़ा।

वहीं अनारकली को मनाने की तमाम कवायदें हो रही हैं। सलीम तो सलीम बादशाह अकबर भी लगे हैं। अरे मान भी जाओ अब! ये जिद छोड़ दो। इस तरह डिस्को जाओगी तो लोग क्या कहेंगे? आखिर इतनी पुराने जमाने की मोहब्बत की मिसाल हो। मुगलिया सल्तनत के एक राजकुमार ने कभी इश्क फरमाया था तुम्हारे साथ। क्यों तुम उसे नापाक करने पर तुली हो? मुगलिया सल्तनत का जिक्र आते ही वह चिढ़ जाती है। वाह जहांपनाह! जिस मुहब्‍बत के लिए आपने मुझे भटकने के लिए छोड़ दिया आज उसी मुहब्‍बत का आप मुझे वास्‍ता दे रहे हैं?

अनारकली का लॉजिक अलग है। वह बादशाह अकबर से कहती है अब मैं आपके इस मुगलिया सल्तनत के झूठे अहंकार पर कुर्बान नहीं होने वाली। इसी का वास्ता देकर आपने मुझे अपनी सल्तनत से दर-ब-दर कर दिया। मैं अपनी मां के साथ कहां-कहां नहीं भटकी। आगरे से चली थी 1960 में आज 2012 में मुंबई पहुंची हूं। आपको कहां फिकर रही मेरी। अब जाकर साजिद खान ने मुझे सही रास्ता दिखाया है। डिस्को जाकर मैं दुनिया मेरे साथ थिरकेगी, मेरे नखरे उठाएगी मैं सबकी नजरों में तो रहूंगी। मेरी मार्केट वैल्यू तो बढ़ेगी। पेट भर खाना और ऐश-ओ-आराम तो मिलेगा।

आपको आपकी मुगलिया सल्तनत मुबारक...अनारकली डिस्को चली...

Saturday, March 31, 2012

सपनों के रंग


सपनों में जीने की आदत पड़ चुकी है
इस कदर कि जागते हुए भी, आंखों में कोई सपना चलता है
कुछ अधूरी आरजुओं पर मन मचलता है
सिर्फ मेरी ही नहीं हर किसी की जिंदगी में
ये सिलसिला बचपन से है
तब छोटे थे, चीजों पर बस नहीं था
सपने देखे, बड़े हुए और बे-बस हो गए
मगर आदत नहीं छूटी सपने बुनने की
हां, फर्क तो आया है
तब और अब के सपनों में
बचपन के उन सपनों में रंग थे
अब सपनों से रंग गायब हैं
जिंदगी के कुछ रंग देखकर
सपनों ने रंग बदल लिए हैं
अब अपनों ने भी रंग बदल लिए हैं
झक सफेद तो कभी सिर्फ काले सपने आते हैं
अब इनसे दिल नहीं बहलता
अब ये मुझे डराते हैं

Wednesday, March 14, 2012

बचपन की बातें


बहुत साल पहले, बचपन में
तुमने एक टहनी दी थी मुझे
बहुत सहेजकर
ले जाना, लगा देना इसे गीली मिट्टी में
और भिगोते रहना तब तक
जब तक दो-चार पत्ते ना निकल आएं
मैं वो टहनी लाया, गीली मिट्टी में उसे लगाया
खूब भिगोता रहा
सुबह उठते ही, शाम को स्कूल से वापस आते ही
मगर उस टहनी से पत्ते नहीं फूटे
मुझे यकीन नहीं हुआ, तुम झूठ थोड़े कहोगी
मैंने ही गलती की होगी
पानी डालने में या निगरानी करने में
आखिर वो टहनी सूख गई
मुझे लगा जैसे तुम मुझसे रूठ गई
सोचा था अगले साल जब फिर आऊंगा
एक नई टहनी तुमसे मांगकर लाऊंगा
पूरे जतन से उसमें पत्ते उगाऊंगा
आखिर तुम्हें यूं रूठा हुआ कैसे छोड़ पाऊंगा
उस अगले साल का अब तक इंतजार है
तुम्हें मनाने को दिल अब भी बेकरार है