दीपक की बातें

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Friday, February 10, 2012

इतना सन्नाटा क्यों है भाई...


न्यूज़ टुडे में प्रकाशित

Tuesday, February 7, 2012

इंदौर में एक शाम फ्रेंच फिल्मों के नाम

इंदौर शहर में धीरे-धीरे एक महीना गुजर चुका है। जब आया था तो खबरों, फिल्मों, क्रिकेट और कुछ नामों को छोड़कर इस शहर में मेरे लिए सब कुछ नया था। बहरहाल, धीरे-धीरे परिचय का दायरा बढ़ रहा है और अब तक तो कुछ नए ताल्लुकात भी बन चुके हैं। इस बीच हाल ही में इंदौर में पांच फ्रेंच फिल्में देखने का सुयोग हुआ। रविवार पांच फरवरी को रीगल चौराहे पर स्थित प्रीतमलाल दुआ सभागृह में सूत्रधार संस्थान ने कार्यक्रम आयोजित किया था। अखबार में खबर पढ़ी और हम भी जा पहुंचे। फ्रेंच भाषा की यह पांच लघु फिल्में अंग्रेजी सब-टाइटल्स के साथ थीं। पांच फिल्मों, द लिटिल ड्रैगन, वॉकिंग, मैडागास्कर-ए जर्नी डायरी, इन ऑवर ब्लड और डिक्स थीं। इनमें मुझे खासतौर पर तीन फिल्में द लिटिल ड्रैगन, वॉकिंग और इन ऑवर ब्लड ज्यादा पसंद आईं।

लिटिल ड्रैगन
इस फिल्म में ब्रूसली की आत्मा एक गुड्डे में प्रवेश कर जाती है। उसके बाद वह गुड्डा कैसे ऊधम मचाता है और दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहता है। 9 मिनट की यह फिल्म बेहद शानदार थी।





वॉकिंग
यह कहानी है एक गुजरे जमाने की अभिनेत्री मियो-मियो की। मियो-मियो अब असल जिंदगी में नानी बनने वाली है। अपने होने वाले नाती को लेकर वह बेहद असहज है और हर वक्त उसी के बारे में सोचा करती है। अपनों को लेकर हम कितना पजेसिव हो जाते हैं यह इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है।

मैडागास्कर- जर्नी डायरी
यह एक एनीमेटेड फिल्म है। यूरोपीय सैलानी मैडागास्कर की रोचक यात्रा के जरिए फिल्म में एक खास सभ्यता के बारे में बताया गया है। मुझे बहुत ज्यादा पसंद नहीं आई तो बहुत ज्यादा डिटेल भी याद नहीं।

इन ऑवर ब्लड
बमुश्किल दस मिनट की यह फिल्म को अगर इ शाम की सबसे शानदार फिल्म कहूं तो गलत नहीं होगा। एक 17 साल का लड़का अपने पिता के जुल्मो-सितम का शिकार है। लड़का थोड़ा गैर-जिम्मेदार है और उसका बाप रास्ते पर लाने के लिए जब तब उसे पीटता रहता है। इस बीच वह खुद बाप बनने वाला है। हालांकि उसका ध्यान अपनी पत्नी और होने वाले बच्चे पर कम और वीडियो गेम और म्यूजिक में ज्यादा रहता है। इस बीच उसकी पत्नी अपनी मां के पास चली जाती है। इधर घर पर अपने पिता की मारपीट को देखकर उसका दिल बदलता है और वह अपनी पत्नी के पास ज्यादा है। वहां पर वह अपने बच्चे को गोद में लेने तक को उसे डर लगता है। अपने पिता से अलग वह अपने बेटे को बहुत प्यार करता है और इस प्यार का नतीजा है कि उसे छूने से भी डरता है कि कहीं बच्चे को नुकसान ना हो जाए।

डिक्स बिफ
मार्क नाम का शख्स अजीब फोबिया से पीडि़त है। उसे हमेशा टाइल्स पर चलने की फोबिया है। उसे लगता है कि अगर वह खास ढंग से गिनकर टाइल्स पर कदम नहीं रखेगा तो वह भी टाइल्स की तरह बिखर जाएगा। काउंसलर उसका डर दूर करने में कामयाब होता है।

इन फिल्मों की संगत में शाम अच्छी गुजरी। मौका मिले तो आप भी देखिएगा।

Sunday, February 5, 2012

युवराज की तारीफ की, अब दुआ कीजिए


प्रिय युवराज,

तुम्‍हारी बीमारी का हाल सुनने के बाद तबीयत किस कदर भारी हो गई है, यह हम ही जानते हैं। पता चला है कि तुम अभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हो। तुम बिल्‍कुल चिंता मत करो। तुम बहुत जल्‍द स्‍वस्‍थ हो जाओगे। तुम्‍हारी बीमारी की खबर सुनकर हम सभी बहुत चिंतित हैं। मालूम होता है कि जिस बीमारी को तुम मामूली बता रहे थे, वह उतनी मामूली है नहीं। अगर यह मामूली होती तो भला कीमोथैरेपी क्‍यों की जाती। बहरहाल, तुम हमें कुछ नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं।

जब विश्‍वकप में फतह के बाद तुम आंसुओं में सराबोर थे, तब हमारी आंखों के कोरे भी गीले थे। हां, तब हमें अंदाजा नहीं था कि हम सभी को यह खुशी देने के लिए तुमने कितना दर्द सहा है। अंदाजा होता भी तो कैसे? तुमने कभी हमें बताया ही नहीं। अभी तुम्‍हारे पिताजी भी बीमारी को गुप्‍त रखने की गुहार लगा रहे हैं। हो सकता है कि तुम इस बीमारी के बारे में बताकर हम सभी को चिंतित नहीं करना चाहते। मगर याद रहे युवराज, तुम सिर्फ योगराज सिंह के बेटे नहीं हो। तुम हिंदुस्‍तान के बेटे हो और हमारी दुआएं हमेशा तुम्‍हारे साथ रहेंगी।

हमें आज भी अच्‍छी तरह याद है। तुम्‍हारा वह पहला मैच। किस तरह तुमने कंगारुओं के छक्‍के छुड़ाए थे। मैदान में जब तुमने गुलाटियां लगानी शुरू कीं तो हमें अंदाजा हो गया था कि भारत के पास भी एक शानदार फील्‍डर आ गया है जो गिरने से घबराता नहीं। लॉडर्स के मैदान पर जब तुमने कैफ के साथ मिलकर अंग्रेजों का मानमर्दन किया था तो हमारा सीना गर्व से फूल गया था। टी-20 वर्ल्‍ड कप में स्‍टुअर्ट ब्रॉड की गेंद पर लगाए तुम्‍हारे वह छह छक्‍के भला क्‍या भूले हैं हम। और कितने मैच गिनाऊं? जाने कितने मौकों पर तुमने हमें फख्र करने का मौका दिया है।

विश्‍वकप में तुम जब टीम में शामिल हुए तो आलोचनाओं से घिरे हुए थे। मगर तुमने किसी की परवाह नहीं कि और अपने शानदार प्रदर्शन से खुद को साबित कर दिया। विश्‍वकप के बाद एक बार फिर जब तुम्‍हारा प्रदर्शन खराब हुआ तो हमने तुम्‍हें जाने क्‍या-क्‍या कहा। मगर अब उन बातों का सख्‍त अफसोस है। जिस दिन पहली बार तुम्‍हारी बीमारी के बारे में सुना बहुत सदमा लगा था। मगर फिर जब तुमने दिलासा दी कि नहीं चिंता की कोई बात नहीं, तो तसल्‍ली हो गई थी।

अब फिर से तुम्‍हारी बीमारी की खबर सुनकर हम परेशान हैं। मगर हमें भरोसा है कि जिस तरह तमाम कठिन हालातों मे तुमने मैच का रुख मोड़ दिया। जिस तरह तुमने तमाम हारी हुई बाजियां जीत लीं, उसी तरह तुम बिना विचलित हुए जिंदगी के इस दौर से भी जीत जाओगे। अभी तुम्‍हें कई मंजिलें फतह करनी हैं, भारत को कई मैचों में सिरमौर बनाना है। कई रिकॉर्ड अपने नाम करने हैं। हमारी दुआ है युवराज तुम जल्‍द ठीक हो जाओगे।

-भारतीय क्रिकेट प्रशंसक

(न्यूज़ टुडे में प्रकाशित)


Thursday, February 2, 2012

आओ जाति-जाति खेलें



न्यूज़ टुडे में फरवरी को प्रकाशित

Sunday, January 15, 2012

यूं बिना लड़े हार जाना

जिस दीवार पर हमें नाज था वो आज पर्थ में गिर कई। वीवीएस लक्ष्मण की वेरी वेरी स्पेशल फॉर्म ना जाने कहां खो गई है। महेंद्र सिंह धोनी के जादू को जाने किसकी नजर लग गई है। जो टीम ऑस्ट्रेलिया में सिरीज जीतने के सपने के साथ पहुंची थी, उसे इस तरह बिखरते देखना दुखदाई है। उससे भी दुखदाई है टीम इंडिया के धुरंधरों का हार मान जाना। पर्थ में शून्य पर आउट होने के बाद लक्ष्मण का उदास होकर लौटना और द्रविड़ का सिर झुकाकर वापस आना देखना दिल को भारी कर गया। इन दोनों ने ना जाने कितने मौकों पर हमें गर्व से सिर उठाने का मौका दिया है। आज उनके चेहरे की उदासी और झुका हुआ सिर देखा नहीं गया। खासकर मेरे लिए और मेरे ही जैसे उन तमाम क्रिकेट प्रेमियों के लिए जिनकी सांसों में लिए क्रिकेट समाया हुआ है।

आउट होने को कौन बल्लेबाज आउट नहीं होता, मगर जिस तरह राहुल द्रविड़ हैरिस की गेंद पर लडख़ड़ाए वह शुभ संकेत नहीं है। गेंदबा उनकी तकनीक लगातार सेंध लगाते जा रहे हैं। एक के बाद एक द्रविड़ बोल्ड होते जा रहे हैं। लक्ष्मण जम नहीं पा रहे हैं, सहवाग धमाका नहीं कर पा रहे हैं। हार बुरी नहीं लगती, आत्मसमर्पण बुरा लगता है। और विदेश में पिछले सात टेस्ट मैचों से यह सिलसिला चल रहा है। यंू तो खेल में हार जीत लगी रहती है। खेलभावना भी यही कहती है कि हार का मातम नहीं मनाया जाना चाहिए, लेकिन गलतियों पर गौर करना ही होगा। अगर जीतने के बाद हमारी आरती उतारी जाती है, हार के बाद मर्सिया भी होगा।

हार के बाद कप्तान धोनी को गम मनाना भले ना गवारा हो, मगर आत्ममंथन तो करना ही पड़ेगा। इस सवाल का जवाब तो ढूंढना ही पड़ेगा कि आखिर क्या वजह रही कि जो टीम कुछ दिन पहले टेस्ट में नंबर वन थी, वह लुढ़कती जा रही है। विदेश में पहले भी मात मिली है, मगर पहले कभी इस तरह नंगा नहीं किया गया। कई बार हम जूझते हुए हारे, लेकिन इस बार तो जुझारूपन नाम की कोई चीज नहीं थी। यूं बिना लड़े हार जाना वीरों को शोभा नहीं देता।

Monday, December 19, 2011

अदम गोंडवी जैसा वो तेवर कहां मिलेगा?

'आइए महसूस करिए जिंदगी के ताप को, मैं चमारों की गली तक ले चलूंगा आपको।'
ये वो कविता है, जिसे पढ़कर मैंने अदम गोंडवी को जाना था। इसके बाद कविताकोश के जरिए उनकी कई कविताओं को पढ़ा। यह बताने की जरुरत नहीं कि उनकी कविताओं में समाज, शासन और राजनीति की विडंबनाओं पर किस कदर तल्‍खी भरी हुई है।

ऊपर जिस कविता का जिक्र कर चुका हूं, उसके बारे में बताते हैं कि वह उनके ही गांव की एक घटना का जीवंत वर्णन है। जिस वक्‍त वहां पर दबंगों के खिलाफ आवाज उठाने में लोगों की रूह कांप रही थी, अदम गोंडवी ने इस कविता के जरिए बिगुल बजाया था। इस कविता को पढ़ते हुए आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।

सिर्फ यही कविता क्‍यों, अदम साहब की हर कविता में जिंदगी का हर रंग मौजूद है। विद्रोह का हर लहजा, हर तेवर बरकरार है। उन्‍होंने युवा पीढ़ी की हताशा को कितने सटीक अंदाज में बयां किया है...
''जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये''

युवा पीढ़ी से जुड़ी यह पंक्तियां भी...
''इस व्‍यवस्‍था ने नई पीढ़ी को आखिर क्‍या दिया,
सेक्‍स की रंगीनियां या गोलियां सल्‍फास की।''

उनकी एक और कविता में समाज में अभावों के बीच जिंदगी गुजार रहे लोगों की बात कुछ यूं बयां की गई है...
''घर में ठंडे चूल्‍हे पर अगर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है''

उन्‍होंने राजनीति पर भी करारे व्‍यंग्‍य किए हैं...
'एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे'

'काजू भुने प्‍लेट में, व्हिस्‍की गिलास में
रामराज उतरा है विधायक निवास में '
जैसी लाइनों के जरिए उन्‍होंने राजनीति के खोखले आदर्शों और राजनीतिज्ञों के दुहरे चरित्र पर खुलकर वार किए।

समाज की एक और तल्‍ख सच्‍चाई अदम गोंडवी की कविता में कैसे निकली है...
'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है'

यही नहीं, उन्‍होंने कौमी एकता को भी अपनी कविता की आवाज दी। ये लाइनें गवाह हैं...
''हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये''

मैं इसे अपना दुर्भाग्‍य ही मानूंगा कि अदम गोंडवी से कभी मिल नहीं पाया। मगर यह भी सच है कि उनकी कविता की तल्‍खी और उस बेबाकी के जरिए उनसे कई दफे रूबरू हो चुका हूं। और यह भी उतना ही सच है कि उस तेवर को हमेशा-हमेशा मिस करुंगा।

हकीकत यह है कि अदम गोंडवी या दुष्‍यंत कुमार जैसे रचनाकार किसी वक्‍त या दौर के मोहताज नहीं हैं। हर वक्‍त हर दौर में वो उतने ही प्रासंगिक हैं। वह हर दौर की युवा पीढ़ी के नायक रहेंगे।

(अदम गोंडवी की रचनाएं पढ़ने के लिए नीचे लिंक को क्लिक करें।)
कविता-कोश का लिंक।

Friday, December 9, 2011

काश, 'हमारी' भी ऐसे ही सुनते मंत्री जी!

अभी कुछ दिनों पहले की बात है। कुछ सांसदों को फर्स्‍ट क्‍लास में सफर करने को नहीं मिला तो बड़ा शोर-शराबा मचाया महानुभावों ने। मामला रेलवे मिनिस्‍टर तक पहुंचा दिया। रेलवे मिनिस्‍टर ने भी फटाफट मामले को संज्ञान में लेकर फौरी कार्रवाई शुरू कर दी।

मेरे जेहन में दो सवाल आए, एक तो काश, देश के मंत्री जी लोग हर मामले को इतनी ही संजीदगी से लेते और दूसरा कि देश में ना जाने कितने लोग रोज रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं। इनमें से बहुत से लोगों को जगह भी नहीं मिल पाती, मगर वह किसी से अपनी शिकायत नहीं कर पाते। बस व्‍यवस्‍था को कोसकर खुद को तसल्‍ली दे लिया करते हैं।

पिछले दिनों मुझे खुद भी एक वाकया देखने को मिला। घर से वापस नौकरी पर, यानी आज़मगढ़ से कानपुर आते वक्‍त एक ऐसा ही मामला देखने को मिला। मेरी सीट के बगल में एक महिला अपने दो बच्‍चों के साथ दोनों सीटों के बीच की जगह में लेटी हुई थी। दरअसल उनका टिकट कन्‍फर्म नहीं था। उसे कोई सीट नहीं मिल रही थी और मजबूरन उसे अपना पूरा सफर उसी जगह पर लेटकर पूरा करना पड़ा।

अब जब नेताओं की इस 'असुविधा' के बारे में पता चला तो बड़ी हैरानी हुई। काश, देश की जनता की बात भी इतनी ही फिक्र होती। काश, देश की जनता से जुड़े मामलों को लेकर मंत्री जी लोग इतने ही सक्रिय होते। काश, जनता से जुड़े मामलों में इतना ही फौरी निर्णय होता। काश!