दीपक की बातें

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Saturday, January 5, 2013

ग्लैमर के खेल में फेल खिलाड़ी

लीजिए, लिएंडर पेस ने भी अपनी दुर्गति करा डाली। आप सोच रहे होंगे कि फिल्मी पेज पर आज मैं एक खिलाड़ी की बात क्यों कर रहा हूं, तो बता दूं कि लिएंडर पेस की पहली फिल्म 'राजधानी एक्सप्रेस' सुपरफ्लॉप होने की रेस में शामिल हो चुकी है। पेस की फिल्म राजधानी एक्सप्रेस कैसी बनी है इसका अंदाजा आप फेसबुक पर हुई एक टिप्पणी से लगा सकते हैं। एक नामी समीक्षक ने लिखा, 'राजधानी एक्सप्रेस किसी पैसेंजर से भी स्लो है और जिसने भी लिएंडर पेस को एक्टिंग की सलाह दी, वह निश्चित उनका कोई दुश्मन ही रहा होगा।' इस तरह वह सफल खिलाड़ी से असफल हीरो बन चुके हैं।
पेस ने टेनिस कोर्ट में जितनी इज्जत कमाई थी, बॉक्स ऑफिस पर गंवा दी। फिल्म में पेस बंदूक चलाते नजर आते हैं, लेकिन उन्हें यह मान लेना चाहिए कि उनके हाथ में टेनिस रैकेट ही सबसे ज्यादा अच्छा लगता है। ग्लैमर जगत के मोह ने टेनिस जगत में भारत के 'सुपरस्टार खिलाड़ी' का बेड़ा गर्क कर दिया।
लिएंडर पेस का नाम किसी परिचय का मोहताज नहीं है। सिर्फ भारत ही क्यों, अंतर्राष्ट्रीय जगत में भी लोग लिएंडर के टैलेंट का लोहा मानते हैं। 1996 में अटलांटा ओलंपिक में कांस्य पदक जीतकर पेस भारत के असली हीरो बन गए थे। इसके बाद तो टेनिस जगत में उन्होंने तमाम ऊंचाईयां हासिल कीं और भारतवासियों के दिल में एक सुपरस्टार का दर्जा हासिल कर लिया। पता नहीं क्या पड़ी थी उन्हें जो चले आए फिल्मों में और आते ही मुंह की खाई।
वैसे जब बात निकली है तो कुछ पुराने वाकए भी याद कर लेते हैं। पहले भी खेलजगत के कई सितारे ग्लैमर के मैदान में चमकने की नाकाम कोशिश कर चुके हैं। शुरुआत करते हैं लिटिल मास्टर यानी सुनील गावस्कर से। भारतीय क्रिकेट जगत के लिविंग लीजेंड गावस्कर ने 1988 में हिंदी फिल्म 'मालामाल' में काम किया था। इसमें उनके साथ नसीरुद्दीन शाह भी थे। फिल्म बॉक्स ऑफिस पर कोई कमाल नहीं कर सकी। इसके अलावा गावस्कर ने एक मराठी फिल्म 'सावली प्रेमाची' में भी काम किया था।
इसी तरह संदीप पाटिल भी ग्लैमर जगत के मोह से बच नहीं पाए थे। वर्तमान में बीसीसीआई के चीफ सेलेक्टर और एक जमाने धाकड़ बल्लेबाज संदीप पाटिल ने 1985 में 'कभी अजनबी थे' फिल्म में काम किया था। यह फिल्म भी संदीप पाटिल के लिए एक बुरी याद बनकर रह गई। वैसे आपकी जानकारी के लिए बता दें कि इस फिल्म में मशहूर वेस्टइंडियन बल्लेबाज क्लाइव लॉयड ने भी अपीयरेंस दी थी।
इस कड़ी में पाकिस्तानी बल्लेबाज मोहसिन खान भी शामिल हैं। मोहसिन खान ने अपने करियर के पीक पर रहते हुए जेपी दत्ता की फिल्म 'बंटवारा' से बॉलीवुड में डेब्यू किया था। बाकी लोगों के मुकाबले मोहसिन इस मामले में थोड़ी लकी साबित हुए और फिल्म ने अच्छा बिजनेस किया। वैसे इसके पीछे बड़ी वजह फिल्म की स्टारकास्ट भी थी, जिसमें विनोद खन्ना, धर्मेंन्द्र, शम्मी कपूर, डिंपल कपाड़ि़या और पूनम ढिल्लों जैसे नाम शामिल थे। इसी तरह विनोद कांबली ने भी क्रिकेट का करियर डूबने के बाद फिल्मों में हाथ आजमाया। कांबली के खाते में 'अनर्थ' और 'पल-पल दिल के साथ' जैसी फिल्में हैं। जहां 'अनर्थ' में सुनील शेट्टी और संजय दत्त थे वहीं 'पल-पल दिल के साथ' में उनके साथ एक और खिलाड़ी अजय जडेजा थे। जब अजय जडेजा का जिक्र छिड़ा है तो बता दें कि क्रिकेट में
फिक्सिंग का दाग लगने के बाद जडेजा ने फिल्मों का दामन थामा था। उनकी पहली फिल्म 'खेल' सुनील शेट्टी और सन्नी देओल के साथ थी। इसके बाद वह एक और फिल्म में आए जिसका जिक्र ऊपर हो चुका है। एक और क्रिकेटर है जिसने मजबूरी में ग्लैमर वल्र्ड को चुना और बाद में मजबूती से जम गया। बात हो रही है भारत के पूर्व तेज गेंदबाज सलिल अंकोला। 1996 क्रिकेट विश्व कप में भारतीय टीम का हिस्सा रहे चुके अंकोला ने स्वास्थ्य कारणों से क्रिकेट का मैदान छोड़ा था और सिल्वर स्क्रीन पर आ गए। यहां उन्होंने संजय दत्त के साथ दो फिल्मों 'कुरुक्षेत्र' और 'पिता' व जायद खान की डेब्यू फिल्म 'चुरा लिया है तुमने' में काम किया। इसके बाद उन्होंने छोटे परदे पर भी सफल पारी खेली है।
एक मशहूर कहावत है कि दो कश्तियों की सवारी कभी फायदा नहीं पहुंचाती और यही बात हमारे 'खिलाड़ि़यों' पर भी पूरी तरह से लागू होती है।

(न्यूज़ टुडे में प्रकाशित)

Saturday, December 15, 2012

हम दोनों आधा—आधा

हम दोनों एक दूसरे के
हैं आधा—आधा
तन्हाइयां तक्सीम, दर्द भी आधा—आधा
जिस्म के हिस्से तमाम, बांटे हुए आधा—आधा
नींद आधी—आधी हमारी आंखों में
रात ढलने का इंतजार आधा—आधा
प्यार के लम्हे आधा—आधा
रुसवाइयों का हिसाब आधा—आधा
जो डायरी पर लिख रहे थे कविता तुम
हर्फ उसका भी रह गया है आधा—आधा
मेरी आंखों में पलते ख्वाब तेरे
टूट जाते हैं अक्सर आधा—आधा
मुदृतों की चादर में ​बिखरी ये मोहब्बत अपनी
कभी लम्हों में सिमट कर आएगी
या रह जाएगी आधा—आधा!

Friday, November 30, 2012

'तलाश' नहीं करेगी निराश

हमने 'तलाश' कर ली। आप भी 'तलाश' कर लीजिए। दावा है कि निराश नहीं होंगे। आमिर ने फिर साबित किया कि वह क्यों मिस्टर परफेक्शनिस्ट हैं। अच्छी कहानी, अच्छी एक्टिंग, अच्छी सिनेमैटोग्राफी। ट्विस्ट्स और टर्न से भरपूर इस कहानी का एंड आपको हिलाकर रख देने की क्षमता रखता है। हां, बस बीच में फिल्म थोड़ी सी बोझिल जरूर हो जाती है। अगर रीमा कागती इसकी शुरुआती रफ़्तार कायम रखने में सफल होतीं तो यह और भी शानदार फिल्म होती। बहरहाल रीमा कागती का डायरेक्ट्रियल डेब्यू बढ़िया है। आमिर तो हैं ही बेमिसाल, बाकी रानी मुखर्जी, करीना कपूर, राजकुमार यादव भी अपने रोल में फिट हैं। हालांकि महफिल लूटी है, नवाजुद्दीन सिद्दिकी ने। उन्होंने फिर साबित कर दिया है कि रोल की गहराई में डूबकर कैसे काम किया जाता है।
(मेरी तरफ से फिल्म को 4 स्टार)

Saturday, November 17, 2012

छल भरे सपने

कुछ छल भरे सपने
मेरी पलकों में आ जाते हैं
जिंदगी जीने की सच्‍ची-झूठी उम्‍मीद दे जाते हैं
मैं कई बार हैरान होता हूं
अपनी महत्‍वाकांक्षाओं पर
सफर के साथी जब छूटते नजर आते हैं
मुश्किलें, तन्‍हाइयां, बेचारगी, मजबूरियां
जिंदगी के इम्तिहान से मिले सबक जैसे याद आते हैं

Tuesday, November 6, 2012

मच्छर और आतंकी

कल रात मेरे हाथों एक मच्छर का कत्ल हो गया
हुआ यूं कि अखबार में था मेरा ध्यान
मच्छर आकर कान में देने लगा ज्ञान
मैंने अखबार लहराया,मच्छर उसकी चपेट में आया
और अखबार पर रक्त की बूंदें मेरे गुनाह का सुबूत थीं।
मुझे अफसोस हुआ! अचानक मुझे वो मच्छर याद आने लगा
जिसने काटा था आतंकी कसाब को
सोचा, कौन जाने ये वही मच्छर रहा हो
कसाब को काटने के बाद बहादुरी में इतरा रहा हो
जो देश की सरकार ना कर सकी
उसे अपनी वीरगाथा बता रहा हो।
फिर तो मच्छर के प्रति सहानुभूति उमड़ आई
मैंने अखबार पर नजर दौड़ाई
वहां खून की बूंदे देख तसल्ली हुई
वाह, देखो क्या मौत मरा है जवान
जाते—जाते अखबार पर छोड़ गया निशान।

Monday, November 5, 2012

तुम भी जलते रहो

तुम भी जलते रहो
मैं भी जलता रहूं,
सुबह-शाम बस यूं ही चलता रहूं
कुछ अदाएं तेरी
कुछ खताएं मेरी
तुमको देखा करूं, और मचलता रहूं
फासला कुछ रहे
फैसला कुछ रहे
सोचता कुछ रहूं, कुछ निखरता रहूं

Tuesday, October 30, 2012

अन्ना बने गेंदबाज

अन्ना हजारे ने कहा कि उन्होंने सरकार के छ: विकेट लिए हैं। यह खुलासा होते ही पूरे भारत के क्रिकेटप्रेमियों में हलचल मच गई है। हर तरफ से अन्ना हजारे को टीम इंडिया में शामिल किए जाने की मांग होने लगी है। अब भारतीय गेंदबाजों के वर्तमान फॉर्म के बारे में तो आप सब जानते ही हैं। एक भी गेंदबाज दो विकेट से ज्यादा नहीं ले पा रहा है। हरभजन सिंह बाहर हैं और जहीर खान से लेकर आर आश्विन समेत तमाम गेंदबाज फॉर्म से बाहर हैं। इस बीच अंग्रेज एक बार फिर लगान वसूलने के लिए भारत की धरती पर पधार चुके हैं। ऐसे में अन्ना हजारे भारत के लिए गेंदबाजी में एक बेहतरीन विकल्प हो सकते हैं।

अब जरा कल्पना कीजिए कि अन्ना हजारे को टीम इंडिया में बतौर गेंदबाज शामिल कर लिया जाता है। मैच में धोनी विकेट बल्लेबाजी लायक होने के बावजूद टॉस जीतकर पहले गेंदबाजी का फैसला करते हैं। अंग्रेज कप्तान हैरान है, रविशास्त्री भी हैरान हैं। वह कहते हैं कि धोनी ऐसा क्यों? धोनी पूरे आत्मविश्वास के साथ जवाब देते हैं? मेरे पास अन्ना हैं !

उधर अंग्रेजों की टीम परेशान है। अब ये अन्ना कौन आ गया। इसका तो कोई गेंदबाजी वीडियो भी नहीं कि जिसे देखकर थोड़ी प्रैक्टिस कर लें! चलो अब बैटिंग तो करनी ही है। अंग्रेज ओपनर बल्लेबाज मैदान पर उतर रहे हैं। भारतीय टीम भी मैदान पर फिल्डिंग करने उतर रही है। अन्ना के हाथ में नई गेंद है।

आते ही अन्ना पहले सभी फील्डरों को बुलाते हैं। सब गोल घेरे में खड़े हो जाते हैं। थोड़ी देर के बाद सभी पिच पर गोल घेरा बनाकर बैठ जाते हैं। कमेंटेटर हैरान! दोनों अंपायर हैरान! अंग्रेज बल्लेबाज हैरान! अन्ना जेब से टोपी निकालकर पहन लेते हैं। टोपी पर लिखा है मैं गेंदबाज हूं। टीम इंडिया के बाकी खिलाड़ी भी अपनी जेब से टोपी निकालकर पहन लेते हैं। किसी की टोपी पर लिखा है— मैं पेप्सी हूं। किसी की टोपी पर लिखा है— मैं रीबॉक हूं। धोनी और सचिन डिसाइड नहीं कर पा रहे हैं कि कौन सी टोपी पहनें। दरअसल दोनों ने इतने ज्यादा विज्ञापन करार साइन कर रखे हैं कि समझ में नहीं आ रहा है कि किसे दिखाएं किसे ना दिखाएं। डर है कोई कंपनी नाराज न हो जाए।

उधर बीसीसीआई वाले भी परेशान हैं। न्यूज़ चैनल इसे लाइव दिखा रहे हैं। इस बीच टीम इंडिया का कोई सदस्य अन्ना से पूछता है कि हम इस तरह क्यूं बैठे हैं? ऐसे विकेट कैसे मिलेगा? अन्ना तब अंदर की बात बताते हैं। वह कहते हैं कि वैसे भी तुम लोग दौड़—भाग कर नहीं पाते। एक रन की जगह तीन रन दे देते हो। कैच पकड़ नहीं पाते हो। इसलिए हम लोग आमरण अनशन कर रहे हैं। मुझे छह—सात दिन तक अनशन करने का अनुभव है। देखना एक—दो नहीं पूरे सोलहों विकेट गिरेंगे। टीम इंडिया का नया सदस्य संशय में है। और कहीं हम लोग गिर पड़े तो?