दीपक की बातें

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Friday, October 26, 2012

मेरे साथ चलो

 
घनी उदास और स्‍याह शाम के बीच,
गहराते अंधेरे में, जब रोशनी डूब रही हो कण-कण
जिंदगी मुझे मेरे मुकद्दर की तरफ खींच रही हो
और मैं अपना मुकाम बनाने की जिद पर आमादा।
वक्‍त की सलवटों को फिर करीने से सजा देने की धुन लिए
दिल में जिंदा रखे चमत्‍कारों की एक आशा
गुजर जाऊं रास्‍ते पर जमे उन पत्‍थरों से
जिनपर ठोकरें खाकर गिरता रहा अब तक।
मेरे लिए मांगी गई तमाम दुआओं
आओ तुम सब भी मेरे साथ चलो।

Wednesday, October 10, 2012

सिंगल स्क्रीन की 'उम्मीदें'


मुझे फिल्में देखने का जबर्दस्त चस्का है। इतना कि जब तक हफ्ते में तीन-चार फिल्में ना देख लूं चैन नहीं पड़ता। अब इतनी फिल्में देखनी हैं तो मल्टीफ्लेक्स तो अफोर्ड नहीं कर पाउंगा। एेसे में मेरा ठिकाना बनते हैं सिंगल स्क्रीन थिएटर्स। कानपुर में रहने के दिनों की जितनी यादें हीर पैलेस, सपना और गुरुदेव पैलेस से जुड़ी हैं, उतनी रेव थ्री, रेव मोती या आइनॉक्स की नहीं हैं। एेसे में सिंगल स्क्रीन थिएटरों को लेकर मेरा भावुक होना लाजिमी है।

आमतौर पर सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में किस स्तर की फिल्में लगती हैं ये सबको पता है। देशभर में सिंगल स्क्रीन थिएटर्स का हाल किसी से छुपा नहीं है। अपने शहर इंदौर में भी सिंगल स्क्रीन थिएटर्स किस हालत में हैं सबको पता है। एेसे में हाल में रिलीज हुई कुछ फिल्में इन सिंगल स्क्रीन थिएटर्स के लिए एक हसीन फुहार की तरह साबित हो रही हैं। हाल ही में रीगल सिनेमाहॉल में फिल्म इंग्लिश-विंग्लिश देखने पहुंचा। रीगल को लेकर मेरा अब तक का अनुभव यही रहा है कि यहां युवाओं के पसंद की बोल्ड फिल्में लगती हैं। पूरे हफ्ते फिल्म के शोज फुल रहते हैं और काफी हद तक कमाई हो जाती है।

इस बार सिनेमा हॉल के बाहर इंग्लिश-विंग्लिश का पोस्टर देखकर थोड़ी हैरानी हुई। टिकट खिड़की पर लंबी लाइन लगी हुई थी। इसमें सिर्फ युवा या छात्र ही शामिल नहीं थे बल्कि फैमिली के लोग भी बड़ी तादाद में आए हुए थे। के नहीं, फैमिली क्लास के लोग भी आए हुए थे। मेरे लिए यह हैरान करने वाला सुखद अनुभव था।कुछ दिन पहले एेसा ही अनुभव आस्था सिनेमाहॉल में फिल्म ओह माय गॉड को देखते हुए हुआ था। यहां भी बड़ी तादाद में भीड़ उमड़ी हुई थी। तमाम परिवार वाले यहां मौजूद थे। निश्चित तौर पर सिंगल स्क्रीन सिनेमा हॉल के मालिकों को उनके इस हिम्मतभरे कदम के लिए शाबाशी देनी चाहिए।

ओह माय गॉड और इंग्लिश-विंग्लिश को मल्टीप्लेक्स नेचर की फिल्में कहा जा सकता है। सिंगल स्क्रीन पर इसे लगाना जोखिम का काम है। पहले ही अपने वजूद के लिए संघर्ष कर रहे सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के मालिक एेसी फिल्में कम ही लगाते हैं। उन्हें डर होता है कि फैमिली वाले तो सिंगल स्क्रीन में आएंगे नहीं। एेसे में कहीं घाटा हो गया तो उबरना बेहद मुश्किल हो जाएगा। यही वजह है कि अब तो बहुत से सिंगल स्क्रीन्स में बी या सी ग्रेड की फिल्में ही लगने लगी हैं। इसके पीछे मालिकों की मंशा किसी तरह फिल्म की लागत भर निकाल लेने की होती है। मगर जिस तरह से ओह माय गॉड और इंग्लिश-विंग्लिश को दर्शकों ने रिस्पांस दिया है, इससे निश्चित तौर पर सिंगल स्क्रीन सिनेमाघरों के मालिकों को एक आस बंधी होगी।

अगर सिंगल स्क्रीन थिएटर्स में फैमिली लायक माहौल, अच्छी फिल्में और थोड़ा स्तरीय सुविधाएं मिलें तो दर्शकों को वापस मोड़ा जा सकता है। हां, लेकिन इसके लिए सिंगल स्क्रीन मालिकों को हिम्मत दिखानी होगी।

Tuesday, October 2, 2012

तुम, मैं, चाँद और मोहब्बत

मैं कल रात बहुत देर तक
छत पर खड़ा घूरता रहा चाँद को
ढूँढता रहा तुम्हारा चेहरा चाँद के चेहरे में
करीब आधे घंटे तक की मैंने कोशिश
मगर तुम नहीं नज़र आई चाँद में
मैंने मन ही मन उलाहने भेजे उन कवियों को
जो जाने क्या कल्पनाएँ कर गए हैं चाँद को लेकर
मैं छत से उतर आया और दिल में तलाशने लगा तुम्हें
मगर इस मांस के छोटे से लोथड़े ने
वहां तुम्हारा वजूद होने से इंकार कर दिया
मैं हैरत में था
क्या मैं तुमसे थोड़ा भी प्यार नहीं करता
क्या तुम मुझसे थोड़ा भी प्यार नहीं करती
फिर क्यूँ तुम मुझे नहीं दिखी, चाँद में और दिल में
अचानक मेरे कानों में तुम्हारी आवाज़ आई
अरे मैं किचन में हूँ, छोटे को पकड़ो


Sunday, September 30, 2012

कमाल कर दिया कांजी भाई

Poster of OMG Oh My God!

ईश्वर के नाम पर ढोंग, धर्म के नाम पर पाखंड. हम सब देखते हैं. हम सब जानते हैं, लेकिन कभी आवाज़ उठाने की हिम्मत नहीं होती. चलिए फिल्म OMG Oh My God ये काम बखूबी करती है. अगर ईश्वर सृष्टि के कण-कण में मौजूद है तो किसी मंदिर, दरगाह या अन्य धार्मिक स्थल पर जाने की क्या ज़रूरत है? क्या इन्सान मात्र की सेवा प्रभु की सेवा नहीं है? धर्म के ठेकेदारों को क्यूँ बढ़ावा दें? कुछ ऐसे ही सवालों का कांजीभाई यानि परेश रावल दिलचस्प किन्तु ठोस अंदाज़ में जवाब देते हैं. धर्म के ठेकेदारों के खिलाफ वह धर्मशास्त्रों को ही हथियार बनाते हैं. बेहद शानदार फिल्म. शुरू से अंत तक बंधी हुई. परेश रावल और मिथुन चक्रवर्ती ने शानदार अभिनय किया है. खासकर मिथुन का इस फिल्म में जवाब नहीं. उनपर अलग से लिखूंगा कभी. बाकी कलाकारों में अक्षय और अन्य औसत साबित हुए हैं. म्यूजिक और गीत भी अच्छे हैं. मस्ट वाच. 

Saturday, September 22, 2012

ज़िन्दगी

लम्हों की धुंध में धुआं-धुआं सी ज़िन्दगी
कुछ ख्वाबों की चाहतों में फ़ना ये ज़िन्दगी
कभी मिली यहाँ, तो कभी मिली वहां

हर मोड़ पे किसी से आशना है ज़िन्दगी
तुम कुछ हुए हमारे, कुछ हो गए और के
वैसे भी कहाँ मिलती है मुकम्मल ये जिंदगी.

Monday, September 17, 2012

लाजवाब बर्फी

 
बर्फी लाजवाब है, इतनी कि चाहे जितनी बार इसका लुत्फ उठाएं यह आपका जायका नहीं खराब करेगी। ये सिनेमाई शायरी है। लफ्ज-लफ्ज जज्बों, अहसासों और मोहब्बतों में डूबा हुआ। मोहब्बत की हजारों कहानियां सुनी होंगी आपने, लेकिन बर्फी मोहब्बत की पुख्ता गजल है। इस मोहब्बत को सलाम।

दार्जिलिंग के नजारे लुभाते हैं। इतना कि दिल चाहता है कि आंख बंद करें और वहीं पहुंच जाएं। बारिश की बूंदों को देख उनमें भीग
जाने का मन करता है। रात के कुछ सीन तो इतने बेहतरीन हैं कि पूछो मत। लगता है जैसे किसी जादूनगरी में पहुंच गए हैं।


और हां, सबसे खास हैं प्रियंका चोपड़ा। प्रियंका के हुस्न के कई रंग हम देख चुके हैं, लेकिन जितनी प्यारी और मासूम इस फिल्म में वह दिखी हैं, शायद फिर कभी ना दिखें। रणबीर का जवाब नहीं। बिना कुछ बोले वो बहुत कुछ कह गए हैं। हालांकि चौकाती हैं इलियाना डि क्रूज। सौम्य...नाजुक...खूबसूरत। अभिनय में भी उतनी ही लाजवाब, लगता ही नहीं कि पहली हिंदी फिल्म है।

बैकग्राउंड म्यूजिक फिल्म की आत्मा है और गाने सांस के सरीखे हैं। संवादों की कमी अखरती नहीं। प्रीतम का शायद यह सबसे बेहतरीन काम होगा अब तक का।

हां, संपादन में थोड़ी कमियां जरूर रह गई हैं, लेकिन जब बर्फी शुद्ध घी की बनी हो तो आकार मायने नहीं रखता।

शुक्रिया अनुराग! इस मिठास भरी लाजवाब बर्फी के लिए।

Monday, September 3, 2012

बच्चे की जान लोगे क्या



ल-सुबह सड़कों पर कदमताल करते हुए कुछ दिलचस्प नजारे देखने को मिलते हैं। छोटे-छोटे, चुन्नू-मुन्नू बच्चे आंखें मींचे अपनी स्कूल वैन का इंतजार कर रहे होते हैं। पीठ पर बस्ते का बोझ, हाथ में खुली कोई किताब और आंखों पर चढ़ा मोटा चश्मा। उन आंखों में कभी झांककर देखो तो एक डर, एक खौफ सा नजर आता है। साथ में खड़े मां-बाप, ममता की मूरत नहीं, किसी पहरेदार सरीखे नजर आते हैं।

ऐसे ही एक बेटे-बाप की जोड़ी को हर रोज देखता हूं। बेटा सड़क किनारे खड़ा, हाथ में किताब थामे, अपनी स्कूल वैन का इंतजार कर रहा होता है। पिताजी अपने बेटे से दूर और स्कू  टर के ज्यादा नजदीक नजर आते हैं। दोनों में संवाद नहीं। आगे चलकर यह संवादहीनता क्या असर डालेगी?

एक वाकया याद आ रहा है। एक मित्र अपने चार साल के बच्चे का स्कूल में एडमिशन कराने गए। प्रिंसिपल महोदया बच्चे की उम्र सुनते ही बोलीं- सालभर पहले ही ले आते। अब तक तो यह काफी कुछ सीख चुका होता। यह सुनकर मित्र ने उन्हें खरा-खरा जवाब दे दिया, मैडम हम अपने बच्चे का बचपन नहीं छीनना चाहते थे। एक अन्य मित्र शान बघार रहे थे। हमारा बेटा तो फलां स्कू  ल में पढ़ता है। इतनी तो सिर्फ उसकी फीस ही है। हर साल टॉप-थ्री में तो आता ही है। इतने गुणगान के बाद जब बच्चा सामने आया तो लगा कोई 'मरीज' है। हद से ज्यादा मोटा और आंखों पर वक्त से पहले चढ़ गया चश्मा। अपने में गुमसुम।

मैंने उसकी दिनचर्या जानी तो हैरान रह गया। सिर्फ 5 साल का बच्चा, सुबह 5:30 बजे स्कूल जाने के लिए तैयार हो जाता है। इससे पहले वह रात में 11 बजे तक जागकर टीवी भी देखता रहता है। एक बच्चे के लिए कम से कम 10 घंटे की नींद जरूरी होती है। क्या उसे जरूरत के मुताबिक पूरी नींद मिल रही है?

कहते हैं बच्चे देश का भविष्य होते हैं। ये कौन सा भविष्य तैयार हो रहा है भाई? क्या हम इंसानों के बजाए जीते-जागते रोबोट नहीं तैयार कर रहे हैं? तो जिम्मेदार कौन है? वह मां-बाप जो अपने लाडले से बेरहमी से पेश आ रहे हैं, या वो समाज जिसमें तरक्की के पैमाने बदल रहे हैं, या वो स्कूल जो अलसुबह से ही क्लास शुरू कर देते हैं, ताकि दोपहर में एक और शिफ्ट चलाकर वह मोटा मुनाफा कमा सकें?
निदा फाजली याद आ रहे हैं-

"बच्चों के छोटे हाथों को चांद सितारे छूने दो, चार किताबें पढ़कर ये भी हम जैसे हो जाएंगे"


(Published in News Today)