दीपक की बातें

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Wednesday, March 14, 2012

बचपन की बातें


बहुत साल पहले, बचपन में
तुमने एक टहनी दी थी मुझे
बहुत सहेजकर
ले जाना, लगा देना इसे गीली मिट्टी में
और भिगोते रहना तब तक
जब तक दो-चार पत्ते ना निकल आएं
मैं वो टहनी लाया, गीली मिट्टी में उसे लगाया
खूब भिगोता रहा
सुबह उठते ही, शाम को स्कूल से वापस आते ही
मगर उस टहनी से पत्ते नहीं फूटे
मुझे यकीन नहीं हुआ, तुम झूठ थोड़े कहोगी
मैंने ही गलती की होगी
पानी डालने में या निगरानी करने में
आखिर वो टहनी सूख गई
मुझे लगा जैसे तुम मुझसे रूठ गई
सोचा था अगले साल जब फिर आऊंगा
एक नई टहनी तुमसे मांगकर लाऊंगा
पूरे जतन से उसमें पत्ते उगाऊंगा
आखिर तुम्हें यूं रूठा हुआ कैसे छोड़ पाऊंगा
उस अगले साल का अब तक इंतजार है
तुम्हें मनाने को दिल अब भी बेकरार है

Saturday, March 10, 2012

'दीवार' तो चली गई



तमाम हसरतें और दर्द समेटे राहुल द्रविड़ ने टेस्ट क्रिकेट को भी अलविदा कह दिया। इसके साथ ही क्रिकेट के सभी संस्करणों से 'दीवार' चली गई। चेहरे पर एक खास तरह का भाव लिए द्रविड़ ने कभी खुद को जाहिर नहीं किया। ना मैदान पर ना मैदान के बाहर, लेकिन उनके दर्द को महसूस किया जा सकता है। भला कौन खिलाड़ी विश्वकप विजेता टीम का सदस्य नहीं बनना चाहेगा। लेकिन द्रविड़ को अपने ही घर में होने वाले विश्वकप के लिए टीम में शामिल नहीं किया गया। द्रविड़ एक ऐसी टीम के हिस्सा थे, जहां सचिन और सौरव गांगुली जैसे स्टार थे। उनकी तमाम उपलब्धियां इन स्टार खिलाडिय़ों की छाया में दबती रहीं। याद कीजिए 1996 का इंग्लैंड दौरा। लाड्र्स के मैदान पर खेला गया दूसरा टेस्ट द्रविड़ और गांगुली दोनों का ही डेब्यू मैच था। इसी मैच में शतक बनाकर गांगुली स्टार बन गए और द्रविड़ शानदार 95 रन बनाने के बावजूद सुर्खियों में जगह नहीं बना पाए। द्रविड़ जैसे बल्लेबाज के लिए इससे बड़ी विडंबना क्या होगी कि जब कभी उन्होंने कोई बड़ा कारनामा किया, श्रेय बांटने के लिए कभी गांगुली खड़े थे, कभी सचिन तो कभी लक्ष्मण। ईडन गार्डन के मैदान पर कंगारुओं का विजय रथ रोकने में लक्ष्मण के साथ द्रविड़ का भी बड़ा रोल रहा। लेकिन आज जेहन में पहले लक्ष्मण का ही नाम आता है। इन तमाम बातों के बावजूद द्रविड़ ने एक नए नायकत्व की परिभाषा गढ़ी। नेपथ्य से नेतृत्व करते हुए वह हमेशा टीममैन रहे। उन्होंने कभी श्रेय लूटने की आतुरता नहीं दिखाई।


हमेशा साबित किया खुद को
असल में द्रविड़ की बल्लेबाजी देखना किसी क्लासिक मूवी को देखने जैसा है। यहां कोई चमत्कार नहीं होता, मगर जब शो खत्म होता है तो अहसास होता है कि वाह, क्या क्लास था! द्रविड़ ने भले ही बहुत ज्यादा छक्के ना लगाए हों, लेकिन तमाम गेंदबाजों के दंभ को उन्होंने अपनी ही स्टाइल में चकनाचूर किया है। द्रविड़ के क्रिकेट तकनीक के बारे में विशेषज्ञ टिप्पणियां कर चुके हैं। द्रविड़ के सामने हमेशा हालात मुश्किल रहे और उन्होंने हर बार खुद को साबित भी किया। तब भी जब उनके ऊपर टेस्ट बल्लेबाज का ठप्पा लग चुका था। उन्हें वनडे के काबिल नहीं माना जाता था। शर्त थी कि वह विकेटकीपिंग करना स्वीकार कर लें तो वनडे टीम में उनकी जगह बन जाएगी। कोई और खिलाड़ी होता तो शायद एटीट्यूड दिखाता, लेकिन द्रविड़ ने यह खुशी-खुशी स्वीकार किया। उन्होंने इसे बाकायदा साबित भी किया। दक्षिण अफ्रीका में खेले गए 2003 विश्वकप को याद करें। वह टूर्नामेंट के दूसरे सबसे सफल विकेटकीपर-बल्लेबाज थे। टीम के लिए द्रविड़ ने हमेशा खुद को आगे रखा। चाहे वह कठिन हालात में टीम को उबारने के लिए खेली गई उनकी पारियां हों या आगे रहकर जिम्मेदारी उठाने की बात। ना जाने कितने मौके आए जब द्रविड़ से ओपनिंग करने के लिए कहा गया और उन्होंने खुशी-खुशी की।

ग्लैमर की चकाचौंध से दूर
द्रविड़ की क्षमता असीम रही है। उन्होंने संभावनाओं से परे जाकर भारत के लिए कई असाधारण पारियां खेलीं। मगर जिन बातों ने मुझे उनका मुरीद बनाया वह है उनका एक असाधारण इंसान होना। आज हर तीसरे मैच में एक स्टार पैदा हो जाता है। आईपीएल की बदौलत पैसे कमाने में भी क्रिकेटर आगे हैं, लेकिन दूसरा द्रविड़ अब होना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन है। याद नहीं आता कभी उन्होंने मैदान पर या मैदान के बाहर अनावश्यक जोश का इजहार किया हो। मैदान के बाहर भी कभी कोई विवाद नहीं हुआ। ग्लैमर की दुनिया में रहते भी उन्होंने इस दुनिया की तमाम फितरतों से उन्होंने खुद को बचाए रखा। जिस दुनिया में क्रिकेटर सफल होते ही नखरे दिखाने लगते हैं, द्रविड़ एक अलग ही मिसाल बनकर उभरे। दुनियाभर की महिलाओं में बेहद लोकप्रिय होने के बावजूद उनका नाम कभी किसी अभिनेत्री या मॉडल से नहीं जुड़ा और उन्होंने शादी भी की तो एक ऐसी लड़की से जो क्रिकेट की एबीसीडी भी नहीं जानती थी। अब भले ही द्रविड़ अंतर्राष्ट्रीय मैचों में नहीं दिखेंगे, मगर यह सच है कि वह तमाम क्रिकेटप्रेमियों के जेहन में हमेशा बसे रहेंगे एक असली हीरो की तरह।

न्यूज टुडे में प्रकाशित

Friday, March 2, 2012

तिग्‍मांशू का एक और कमाल : पान सिंह तोमर

सबसे पहले एक खास बात-
यह डाकुओं पर बनी पहली ऐसी फिल् होगी जिसमें डाकुओं ने घोड़े नहीं इस्तेमाल किये हैं।

यह समाज की विडंबना है कि यहां अच्‍छी चीजों और कामों को सही वक्‍त पर तारीफ नहीं मिलती। पान सिंह तोमर भी इसी विडंबना को व्‍यक्‍त करती है। जब तक पान सिंह सिपाही था, दौड़ता था, देश के लिए मेडल जुटाए, तब किसी ने नहीं पूछा। डाकू बनते ही उसकी सुर्खियां बनने लगती हैं। रेडियो पर नाम आने लगता है। पान सिंह अपना इंटरव्‍यू लेने आए पत्रकार से पूछता है, जब वह खिलाड़ी था तो उसका इंटरव्‍यू लेने क्‍यों नहीं आया।

कुछ लोग सिर्फ बेचने के लिए फिल्‍में बनाते हैं और कुछ लोग सिर्फ अच्‍छी फिल्‍में बनाते हैं। तिग्‍मांशु धूलिया दूसरी तरह के लोगों में से हैं। उनकी अपनी एक शैली है, एक अंदाज है और एक पैमाना भी। जब तक चीजें उस पर खरी नहीं उतरतीं सामने नहीं आतीं। डाकू, बदला, गांव, पुलिस, मुखबिर इन सबको मिलाकर कई फिल्‍में बन चुकी हैं, लेकिन तिग्‍मांशु धूलिया ने पान सिंह तोमर सबसे अलग रखा है।बीहड़ में तो बागी होते हैं, डकैत तो पार्लियामेंट में होते हैं. जैसे डॉयलॉग्‍स ने फिल्‍म को पहले ही चर्चित कर दिया है।

पान सिंह तोमर एक आम आदमी की कहानी है। जी हां, उसे खास तो व्‍यवस्‍था बना देती है, उसके हाथ में बंदूक थमाकर, उसे डाकू बनाकर। पान सिंह कभी उसूलों और कायदों के खिलाफ नहीं जाता। तब भी नहीं जब उसके कोच उसे 5000 मीटर दौड़ से स्‍टीपलचेज में शिफ्ट होने को कहते हैं, तब भी नहीं जब उसकी लाख इच्‍छा होते हुए भी उसे जंग के मैदान में नहीं भेजा जाता है, क्‍योंकि वह खेल से है। उसके दिल में कसक होती है। साथी ताने मारते हैं, मगर वह अडिग है। तब भी नहीं जब दुश्‍मनों के हाथों बुरी तरह पिटाई के बाद उसका बेटा जिंदगी से जूझ रहा होता है।

हर बार वह कानून और नियम से चलने की बात करता है। मगर जब थाने में उसकी सुनवाई नहीं होती। कानून उसका और उसकी उप‍लब्धियों का मजाक उड़ाता है और उसकी मां की जान चली जाती है तो वह मजबूर हो जाता है। इसी मजबूरी में वह बंदूक उठा लेता है, मगर उसूल नहीं छोड़ता। वह चाहता तो सरेंडर करके एक बेहतर जिंदगी गुजार सकता था, मगर उसके लिए रेस अधूरी छोड़ना मुमकिन नहीं। वह दम तोड़ देता है, मगर अपने कायदे पर कायम रहता है।

कहानी तीन परतों में है। पान सिंह के फौजी से एथलीट और फिर डाकू बनने की कहानी को तिग्‍मांशू धूलिया ने बेहद खूबसूरती से पिरोया है। बिना ज्‍यादा भटके और बिना ज्‍यादा भीड़ जुटाए वह कहानी की तीनों परतों को पर्याप्‍त विस्‍तार और गहराई देने में सफल हैं। यही तिग्‍मांशू की सबसे बड़ी सफलता है कि वह कथ्‍य और विषय से भटके नहीं हैं। बल्कि उसे शानदार तरीके से बुना है। कसावट और कहानी की रफ़्तार से बढि़या साम्‍य बिठाया है। चूंकि फिल्‍म चंबल पर आधारित है इसलिए डायलॉग में यहां का डायलेक्‍ट और टोन भी है। ग्‍वालियर और मुरैना में इस्‍तेमाल होने वाले शब्‍द मोड़ा (लड़का), मोड़ी (लड़की) और 'हौ' जिसे मध्‍यप्रदेश में स्‍वीकारोक्ति के तौर पर बोलते हैं, शामिल है।

पूरी फिल्‍म इरफान खान की है और इरफान ने अपने किरदार को निभाया भी खूब है। कुछ दिन पहले एक इंटरव्‍यू में तिग्‍मांशू ने कहा था कि उन्‍होंने इस फिल्‍म में इरफान को इसलिए लिया क्‍योंकि उनसे जो चाहिए निकलवाया जा सकता है, मांगा जा सकता है। इरफान ने इस बात को फिल्‍म में बखूबी साबित कर दिया है। अपने किरदार के सभी लेयर्स को वह बखूबी जी गए हैं। इरफान की खास बात यह है कि वह कभी किसी सिंबल, अतिरिक्‍त बनावट या हावभाव का सहारा नहीं लेते। उनका सबसे प्‍लस प्‍वॉइंट उनकी आंखें और संवाद अदायगी है। बस इन्‍हीं दोनों के सहारे वह अपने किरदार को पूरी तरह उभार लेते हैं ।

डायलॉग में आंचलिक शब्‍दों का इस्‍तेमाल करते हुए वह अटकते नहीं। जहां तक माही गिल की बात है तो रोल में बहुत लंबाई ना होने के बावजूद उनके लिए करने को बहुत कुछ था, लेकिन अफसोस वह उसमें एक हद तक ही सफल हुई हैं। उनका किरदार भी इरफान की संगत में ही बेहतर होता है। हालांकि एक बेबस पत्‍नी और मां के तौर पर वह खुद को पूरी तरह जाहिर नहीं कर पाई हैं। नॉन ग्‍लैमरस रोल में वह कहीं से प्रभावित नहीं कर पातीं। बाकी किरदारों ने भी अपने रोल के साथ न्‍याय किया है।

फिल्‍म के कुछ सीन बेहद लाजवाब हैं। जब पान सिंह आखिरी बार अपने परिवार से मिलने आता है। जब वह अपने बेटे से मिलने जाता है। एक और सीन है, जब सिपाही पान सिंह पहली बार घर आता है तो अपनी पत्नी को आलिंगन करते वक़्त उससे चेहरा दिखने को कहता है मगर जब वह चेहरा नहीं घुमाती तो पान सिंह आइना हाथ में लेकर उसका चेहरा देखने लगता हैपान सिंह की बेबाकी फिल्‍म में कई खूबसूरत सीन पैदा करती है।

डायलॉग्‍स भी अच्‍छे हैं और फिल्‍म में ह्यूमर का पुट भी अच्‍छा है। गानों की गुंजाइश थी नहीं और गाने का इस्‍तेमाल ना करके डायरेक्‍टर ने ठीक ही किया है, क्‍योंकि फिल्‍म की रवानी को प्रभावित करते। बैकग्राउंड साउंड अच्‍छा है। सिनेमैटोग्राफी भी बढि़या है। चंबल के बीहड़ो और गांवों की खूबसूरती एक अलग समां बांधती है।

(आखिरी पंच- फिल्म के आखिर में तिग्‍मांशू ने देश के कुछ खास एथलीटों का जिक्र किया है जो अभावों में जीवन बिताने को मजबूर हुए।)

Friday, February 10, 2012

इतना सन्नाटा क्यों है भाई...


न्यूज़ टुडे में प्रकाशित

Tuesday, February 7, 2012

इंदौर में एक शाम फ्रेंच फिल्मों के नाम

इंदौर शहर में धीरे-धीरे एक महीना गुजर चुका है। जब आया था तो खबरों, फिल्मों, क्रिकेट और कुछ नामों को छोड़कर इस शहर में मेरे लिए सब कुछ नया था। बहरहाल, धीरे-धीरे परिचय का दायरा बढ़ रहा है और अब तक तो कुछ नए ताल्लुकात भी बन चुके हैं। इस बीच हाल ही में इंदौर में पांच फ्रेंच फिल्में देखने का सुयोग हुआ। रविवार पांच फरवरी को रीगल चौराहे पर स्थित प्रीतमलाल दुआ सभागृह में सूत्रधार संस्थान ने कार्यक्रम आयोजित किया था। अखबार में खबर पढ़ी और हम भी जा पहुंचे। फ्रेंच भाषा की यह पांच लघु फिल्में अंग्रेजी सब-टाइटल्स के साथ थीं। पांच फिल्मों, द लिटिल ड्रैगन, वॉकिंग, मैडागास्कर-ए जर्नी डायरी, इन ऑवर ब्लड और डिक्स थीं। इनमें मुझे खासतौर पर तीन फिल्में द लिटिल ड्रैगन, वॉकिंग और इन ऑवर ब्लड ज्यादा पसंद आईं।

लिटिल ड्रैगन
इस फिल्म में ब्रूसली की आत्मा एक गुड्डे में प्रवेश कर जाती है। उसके बाद वह गुड्डा कैसे ऊधम मचाता है और दुनिया में अपनी पहचान बनाना चाहता है। 9 मिनट की यह फिल्म बेहद शानदार थी।





वॉकिंग
यह कहानी है एक गुजरे जमाने की अभिनेत्री मियो-मियो की। मियो-मियो अब असल जिंदगी में नानी बनने वाली है। अपने होने वाले नाती को लेकर वह बेहद असहज है और हर वक्त उसी के बारे में सोचा करती है। अपनों को लेकर हम कितना पजेसिव हो जाते हैं यह इस फिल्म में बखूबी दिखाया गया है।

मैडागास्कर- जर्नी डायरी
यह एक एनीमेटेड फिल्म है। यूरोपीय सैलानी मैडागास्कर की रोचक यात्रा के जरिए फिल्म में एक खास सभ्यता के बारे में बताया गया है। मुझे बहुत ज्यादा पसंद नहीं आई तो बहुत ज्यादा डिटेल भी याद नहीं।

इन ऑवर ब्लड
बमुश्किल दस मिनट की यह फिल्म को अगर इ शाम की सबसे शानदार फिल्म कहूं तो गलत नहीं होगा। एक 17 साल का लड़का अपने पिता के जुल्मो-सितम का शिकार है। लड़का थोड़ा गैर-जिम्मेदार है और उसका बाप रास्ते पर लाने के लिए जब तब उसे पीटता रहता है। इस बीच वह खुद बाप बनने वाला है। हालांकि उसका ध्यान अपनी पत्नी और होने वाले बच्चे पर कम और वीडियो गेम और म्यूजिक में ज्यादा रहता है। इस बीच उसकी पत्नी अपनी मां के पास चली जाती है। इधर घर पर अपने पिता की मारपीट को देखकर उसका दिल बदलता है और वह अपनी पत्नी के पास ज्यादा है। वहां पर वह अपने बच्चे को गोद में लेने तक को उसे डर लगता है। अपने पिता से अलग वह अपने बेटे को बहुत प्यार करता है और इस प्यार का नतीजा है कि उसे छूने से भी डरता है कि कहीं बच्चे को नुकसान ना हो जाए।

डिक्स बिफ
मार्क नाम का शख्स अजीब फोबिया से पीडि़त है। उसे हमेशा टाइल्स पर चलने की फोबिया है। उसे लगता है कि अगर वह खास ढंग से गिनकर टाइल्स पर कदम नहीं रखेगा तो वह भी टाइल्स की तरह बिखर जाएगा। काउंसलर उसका डर दूर करने में कामयाब होता है।

इन फिल्मों की संगत में शाम अच्छी गुजरी। मौका मिले तो आप भी देखिएगा।

Sunday, February 5, 2012

युवराज की तारीफ की, अब दुआ कीजिए


प्रिय युवराज,

तुम्‍हारी बीमारी का हाल सुनने के बाद तबीयत किस कदर भारी हो गई है, यह हम ही जानते हैं। पता चला है कि तुम अभी पूरी तरह ठीक नहीं हो पाए हो। तुम बिल्‍कुल चिंता मत करो। तुम बहुत जल्‍द स्‍वस्‍थ हो जाओगे। तुम्‍हारी बीमारी की खबर सुनकर हम सभी बहुत चिंतित हैं। मालूम होता है कि जिस बीमारी को तुम मामूली बता रहे थे, वह उतनी मामूली है नहीं। अगर यह मामूली होती तो भला कीमोथैरेपी क्‍यों की जाती। बहरहाल, तुम हमें कुछ नहीं बताना चाहते तो कोई बात नहीं।

जब विश्‍वकप में फतह के बाद तुम आंसुओं में सराबोर थे, तब हमारी आंखों के कोरे भी गीले थे। हां, तब हमें अंदाजा नहीं था कि हम सभी को यह खुशी देने के लिए तुमने कितना दर्द सहा है। अंदाजा होता भी तो कैसे? तुमने कभी हमें बताया ही नहीं। अभी तुम्‍हारे पिताजी भी बीमारी को गुप्‍त रखने की गुहार लगा रहे हैं। हो सकता है कि तुम इस बीमारी के बारे में बताकर हम सभी को चिंतित नहीं करना चाहते। मगर याद रहे युवराज, तुम सिर्फ योगराज सिंह के बेटे नहीं हो। तुम हिंदुस्‍तान के बेटे हो और हमारी दुआएं हमेशा तुम्‍हारे साथ रहेंगी।

हमें आज भी अच्‍छी तरह याद है। तुम्‍हारा वह पहला मैच। किस तरह तुमने कंगारुओं के छक्‍के छुड़ाए थे। मैदान में जब तुमने गुलाटियां लगानी शुरू कीं तो हमें अंदाजा हो गया था कि भारत के पास भी एक शानदार फील्‍डर आ गया है जो गिरने से घबराता नहीं। लॉडर्स के मैदान पर जब तुमने कैफ के साथ मिलकर अंग्रेजों का मानमर्दन किया था तो हमारा सीना गर्व से फूल गया था। टी-20 वर्ल्‍ड कप में स्‍टुअर्ट ब्रॉड की गेंद पर लगाए तुम्‍हारे वह छह छक्‍के भला क्‍या भूले हैं हम। और कितने मैच गिनाऊं? जाने कितने मौकों पर तुमने हमें फख्र करने का मौका दिया है।

विश्‍वकप में तुम जब टीम में शामिल हुए तो आलोचनाओं से घिरे हुए थे। मगर तुमने किसी की परवाह नहीं कि और अपने शानदार प्रदर्शन से खुद को साबित कर दिया। विश्‍वकप के बाद एक बार फिर जब तुम्‍हारा प्रदर्शन खराब हुआ तो हमने तुम्‍हें जाने क्‍या-क्‍या कहा। मगर अब उन बातों का सख्‍त अफसोस है। जिस दिन पहली बार तुम्‍हारी बीमारी के बारे में सुना बहुत सदमा लगा था। मगर फिर जब तुमने दिलासा दी कि नहीं चिंता की कोई बात नहीं, तो तसल्‍ली हो गई थी।

अब फिर से तुम्‍हारी बीमारी की खबर सुनकर हम परेशान हैं। मगर हमें भरोसा है कि जिस तरह तमाम कठिन हालातों मे तुमने मैच का रुख मोड़ दिया। जिस तरह तुमने तमाम हारी हुई बाजियां जीत लीं, उसी तरह तुम बिना विचलित हुए जिंदगी के इस दौर से भी जीत जाओगे। अभी तुम्‍हें कई मंजिलें फतह करनी हैं, भारत को कई मैचों में सिरमौर बनाना है। कई रिकॉर्ड अपने नाम करने हैं। हमारी दुआ है युवराज तुम जल्‍द ठीक हो जाओगे।

-भारतीय क्रिकेट प्रशंसक

(न्यूज़ टुडे में प्रकाशित)


Thursday, February 2, 2012

आओ जाति-जाति खेलें



न्यूज़ टुडे में फरवरी को प्रकाशित