दीपक की बातें

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Wednesday, April 6, 2011

मेरे पास कप है



सचिन तेंदुलकर और वर्ल्ड कप , एक सपना, एक ख्वाहिश, एकसक. हाइड एंड सीक से भरी एक ऐसी दास्तान जिसमें दिल तोड़ देने वाले कई लम्हे भी आए. ब्रायन लारा से उनका कंपैरिजन किया गया। कहा गया डॉन ब्रैडमैन उनसे बेहतर बैट्समैन थे. आज अगर ब्रायन लारा कहें कि मेरे पास टेस्ट क्रिकेट में 400 रनों की इनिंग्स का रिकॉर्ड है तो सचिन भी फख्र से कह सकते हैं, मेरे पास कप है।


जहां देखा था सपना, वहीं हुआ पूरा सचिन का वर्ल्ड कप ड्रीम पूरा हुआ। वहीं, जहां से उन्होंने यह सपना देखना शुरू किया था। उसी मुंबई की सरजमीं पर, जहां सचिन ने क्रिकेट की एबीसीडी सीखी थी। सचिन खुद कहते हैं, ‘जब मैं बच्चा था तो मैं इस सपने के साथ बड़ा हुआ कि एक दिन वर्ल्ड कप हाथ में उठाउंगा।’ 1989 में सचिन ने क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद उन्हें 1992 में पहला वल्र्ड कप खेलने का मौका मिला. न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर हुए इस वर्ल्ड कप में सचिन ने शानदार बैटिंग की थी। सात मैचेज में उन्होंने 283 रन बनाए थे, मगर टीम इंडिय का सफर पहले राउंड में ही खत्म हो गया।


1996 का दर्द


अब 1996 की बारी थी। भारत, श्रीलनका और पाकिस्तान इस वर्ल्ड कप के होस्ट थे। अपनी जमीन पर खेले गए इस मुकाबले में पूरी उम्मीद थी कि टीम इंडिया विजेता बनेगी। जब सफर सेमीफाइनल त· पहुंचा तो सचिन का बचपन का सपना पूरा होता लगा. मगर शायद अभी और इंतजार बाकी था. सेमीफाइनल में श्रीलंका से हार के साथ इंडिया का वर्ल्ड कप में सफर खत्म हो गया. सचिन के बालसखा आंसुओं में डूब गए और पूरा देश गम के सागर में। सचिन ने 7 मैचेस में 523 रन बनाए थे।


1999 का वर्ल्ड कप


ख्वाब आगे-आगे भाग रहा था और सचिन ख्वाबों ·ा पीछा ·रने में लगे हुए थे, 1999 का वर्ल्ड कप आ गया था। इंग्लैंड की धरती पर अजहरुद्दीन की कप्तानी में इंडियन टीम पहुंच चुकी थी। मगर साउथ अफ्रीका और जिंबॉब्वे के हाथों मिली हार ने टीम का आगाज खराब कर दिया। जिंबॉब्वे के मैच से पहले सचिन को वापस इंडिया आना पड़ा. वह अपने पिता को खो चुके थे. इस नाजुक क्षण में भी सचिन नहीं टूटे और वापस लौटकर अगले मैच में केन्या के खिलाफ सेंचुरी बनाई. टीम किसी तरह सुपर सिक्स तक तो पहुंची, मगर सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी। सचिन ने 7 मैचेस में 253 रन बनाए थे.


2003 की कसक


अगला वर्ल्ड कप साउथ अफ्रीका की सरजमीं पर 2003 में खेला गया. यह एक ऐसा वर्ल्ड कप था, जहां सचिन का सपना पूरा तो नहीं हुआ पर वह इसके काफी करीब तक पहुंच गए थे. फाइनल में कंगारुओं के खिलाफ मिली हार ने एक बार फिर उन्हें मायूस कर दिया. सौरव गांगुली की कप्तानी और सचिन की टूर्नामेंट में शानदार बैटिंग के बावजूद टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा. सचिन ने इस वर्ल्ड कप में 11 मैच में 673 रन बनाए. वेस्टइंडीज में 2007 में हुआ वर्ल्ड तो टीम इंडिया के लिए एक भूल जाने वाला डरावना ख्वाब साबित हुआ. पहले ही मैच में बांग्लादेश के खिलाफ मिली हार के बाद टीम उबर नहीं सकी। पहले ही राउंड से टीम बाहर हो गई. पर्सनल लेवल पर भी सचिन के लिए टूर्नामेंट यादगार नहीं रहा, 3 मैचेस में वह सिर्फ 64 रन ही बना सके ।


एंड ही इज चैम्पियन


मगर कहते हैं ना कि इंतजार का फल मीठा होता है. आखिर सचिन का सपना पूरा हुआ. वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उन्होंने चूमने का स्वाद उन्होंने महसूस किया. इस बीच ना जाने कितने कसैले एक्सपीरियंस हुए, मगर सचिन ने अर्जुन की तरह सिर्फ वर्ल्ड कप पर निगाह जमाए रखी और आज वह उनके पास है।



4 अप्रैल को i next में publish

Tuesday, March 29, 2011

आखिरी मुलाकात


इंडिया-पाकिस्तान के बीच मैच हो और सचिन तेंदुलकर-शोएब अख्तर राइवलरी की चर्चा ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता अपनी टीमों के लिए दोनों ही आइकान. अगर सचिन को इंडिया में क्रिकेट के गॉड का दर्जा हासिल है तो शोएब अख्तर भी पाकिस्तान में किसी स्टार से कम नहीं हैं. अब बुधवार को होने वाले वर्ल्ड कप सेमीफाइनल मैच में यह दोनों योद्धा आखिरी बार एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे. सचिन तेंदुलकर और शोएब अख्तर, एक रेकॉर्ड्स का बेताज बादशाह है तो दूसरा स्पीड का शहंशाह. क्रिकेट के मैदान पर दोनों की भिड़ंत के कई किस्से मशहूर हैं। जब-जब अख्तर ने जुबान से जंग का आगाज किया है, सचिन ने अपने बल्ले से जवाब दिया है. 2003 वर्ल्ड के दौरान सेंचुरियन के मैच को भूल सकता है भला. मैच से पहले शोएब अख्तर का बड़बोलापन और मैच में सचिन की धमाकेदार इनिंग्स. हिसाब चुकता और वर्ल्ड कप से पाकिस्तान का पत्ता साफ. यही सचिन का अंदाज रहा है. चुपचाप अपने विरोधी का कत्लेआम. कभी कलाई के सहारे शानदार फ्लिक, कभी घास छीलता कवर ड्राइव तो कभी बॉलर के पैरों के पास से निकलता स्ट्रेट ड्राइव. किसी मंझे हुए कलाकार की तरह वह अपनी इनिंग्स को एक मुकम्मल मुकाम तक पहुंचाते हैं. अपने करियर में सचिन ने सिर्फ रेकॉर्ड्स का पहाड़ ही नहीं खड़ा किया, बल्कि विरोधियों के दिलों में भी अपने लिए सम्मान पैदा किया. यहीं पर शोएब अख्तर पिछड़ जाते हैं. उनके टैलेंट, उनकी तेजी और विकेट टेकिंग एबिलिटी पर किसी को शक नहीं रहा है. जरा याद कीजिए, बाउंड्रीलाइन के करीब से लहराती जुल्फों और लयबद्ध एक्शन के साथ अख्तर का रनअप. करीब सौ मील की रफ्तार से बैट्समैन के कान करीब से सनसनाती हुई निकलती उनकी बॉल. फिर विकेट मिलने के बाद पक्षियों की तरह हाथ लहराते अख्तर का दौडऩा इस वर्ल्ड कप के बाद सिर्फ कैमरों में कैद होकर रह जाएगा. हालाँकि उनके करियर के कई निगेटिव प्वॉइंट्स भी रहे. उनकी तुनकमिजाजी, गुस्से और बदजुबानी ने वर्ल्ड क्रिकेट में उनके तमाम क्रिटिक पैदा कर दिए. यहां तक पाकिस्तान में भी उनके सपोर्टर्स का टोटा देखने को मिला है. टीम के साथियों से झगड़ा, डोपिंग का दाग, ड्रग्स का दंश हमेशा अख्तर का दामन दागदार करता रहा. इन सबके बावजूद हम तो यही कहेंगे, बहुत याद आओगे शोएब !


27 मार्च को i next के sunday issue में प्रकाशित

Wednesday, March 9, 2011

बीबीसी की याद में

बीबीसी, कई यादें जुडी हैं इस नाम के साथ। जब कल मुकुल सर के ज़रिये इस बात की जानकारी मिली कि बीबीसी हिंदी की एक सर्विस जारी रहेगी तो दिल को काफी तसल्ली मिली। हालाँकि संतोष तो तभी मिलेगा जब सभी सर्विस्सेस जारी होने की खुशखबरी मिलेगी।
खैर, जेहन में बीबीसी की कई बातें आज भी ताज़ा हैं। मैं छठी या सातवीं में पढता था। घर में बीबीसी खूब सुनी जाती थी। (अभी भी चाचा जी सुनते हैं ) शाम को साढ़े सात बजते ही रेडियो पर बीबीसी की सिंग्नेचर ट्यून बजती, और फिर आवाज आती, 'बीबीसी की तीसरी सभा में आपका स्वागत है, मैं मधुकर उपाध्याय, इस सभा .........पहले आप सुनिए अन्तराष्ट्रीय समाचार......और फिर जैसे ही समाचार ख़त्म होते, सिंग्नेचर ट्यून बजती और रेडियो से पहले मैं बोल उठता, 'आज कल' सच एक जूनून था। जैसे जैसे बड़ा होता गया ये जूनून एक मुकम्मल नशा बन गया। अचला शर्मा, रेहान फजल, ब्रजेश उपाध्याय, ममता गुप्ता, और भी कई नाम। मैं इन्हें सुनता और बाद में इनकी नक़ल करता। कहना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता में आने कि लगन यहीं से लगी....
ये तो बीते दिनों कि यादें है। अब तो कभी कभी ही बीबीसी सुन पता हूँ, मिस तो करता ही हूँ........

Tuesday, February 22, 2011

प्रियंका के खूबसूरत गुनाह


एक हसीना, सात खून, मगर चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं। हर खून के साथ प्रियंका का हुस्न और भी निखरता गया। इसी तरह उनका अभिनय भी। आगे चलकर प्रियंका की बेहतरीन फिल्मो में शामिल होगी सात खून माफ़। जहाँ तक विशाल भरद्वाज की बात है तो, वह तो उस्ताद ही हैं। प्रियंका ने अपने रोल के साथ पूरी तरह से इंसाफ किया है। एक महिला की अधूरी ख्वाहिशों को उन्होंने बड़े ही शानदार तरीके से परदे पर उतारा है। सुजैना के रूप में हमारे सामने एक ऐसी महिला है जिसके पास खूब सारी दौलत , नौकर चाकर हैं, उसके हर हुक्म की तामील होती है। मगर फिर भी वह खुद को अधूरा महसूस करती है । एक जिद है। सपनो को लेकर उसके अन्दर एक तड़प वह। वह चाहती है कि कोई मिले उसे जो मोहब्बत के मतलब बताये, जिंदगी के सफ़र में उसका सहारा बने। मगर स्वार्थी पुरुषों की दुनिया में उसे हर बार निराश होना पड़ता है। अपने पात्र के हर अक्स को उभरने में प्रियंका सफल रही हैं। हर भाव की कसक उनके चेहरे पर साफ झलकती है। निश्चित तौर पर विशाल तारीफ़ के हक़दार हैं की उन्होंने प्रियंका से शानदार कम लिया है।


पहले भी वह ऐसी शानदार फिल्मे बना चुके हैं और आने वाले वक्त में कुछ और शानदार फिल्मे देखने को मिलेंगी, प्रियंका से भी, विशाल से भी...........

Sunday, December 5, 2010

हाँ हममें है दम

न्यूजीलैंड के साथ वन डे सीरीज शुरू होने के पहले जब भारतीय टीम की कप्तानी गौतम गंभीर के हाथों में दी गयी थी और ज्यादातर सीनियर्स को आराम दे दिया गया तो टीम अचानक से काफी कमजोर नजर आने लगी थी। लोगों के मन में यह बात थी कि क्या यह टीम किवी टीम का मुकाबला कर पायेगी। खासकर उस समय जबकि न्यूजीलैंड की टीम टेस्ट सिरीज हर चुकी थी। जाहिर सी बात थी कि किवी खिलाडियों के मन में वन डे मैचों में जीत हासिल कर बदला चुकाने कि भावना प्रबल रही होगी।
खाई ऐसा कुछ हुआ नहीं और गंभीर की अगुवाई में टीम ने बड़ी आसानी से न्यूजीलैंड की टीम को हार का स्वाद चखाया और सीरिज पर कब्ज़ा कर लिया। इस दौरान टीम का प्रदर्शन खासा अच्छा रहा। खुद कप्तान गंभीर ने मोर्चे से अगुवाई की और टीम को कहीं से भी सचिन, सहवाग, धोनी और दूसरे बड़े खिलाडियों की कमी महसूस नहीं होने दी। उनके अलावा विराट कोहली, युसूफ पठान, श्रीसंत, आर आश्विन और दूसरे खिलाडियों ने भी कहीं से निराश नहीं किया।
भारतीय टीम के युवाओं की यह जीत दिखाती है कि टीम अब पूरी तरह परिपक्व हो चुकी है। मुझे पिछले समय के दिन याद आते है। जब टीम पूरी तरह सचिन पर निर्भर हुआ करती थी। बाहर करते ही बल्लेबाजी धडाम हो जाया करती थी। अब टीम उस दुआर को काफी पीछे छोड़ चुकी है। यह ये दिखाता है कि हमारी युवा पीढ़ी कितनी मजबूत है। बढ़ो इंडिया वर्ल्ड कप जीत लो!

Friday, December 3, 2010

'शूल' के बहाने

अभी कुछ दिन पहले फिल्म 'शूल' देख रहा था। एक दृश्य में समर प्रताप बने मनोज बाजपाई के ऊपर गुंडे हमला करते हैं, वह अपनी बेटी को बचने कि कोशिश करता है, मगर उसकी बेटी घायल हो जाती है। गुंडों को मजा चखाने के बाद जब समर होश संभालता है तो अपनी घायल बेटी कि मदद के लिए पुकारता है। सैकड़ों की भीड़ में से कोई भी सामने नहीं आता। यह देखकर मुझे और मेरे सात फिल्म देख रहे बंधू को गुस्सा आता है। खैर वहां तो सब स्क्रिप्ट के मुताबिक सब कुछ था। मगर ऐसी घटना अगर हकीकत में हो तब भी क्या जनता इतनी असंवेदनशील रहेगी? क्या भीड़ से कोई भी किसी समर प्रताप की मदद करने के लिए आगे नहीं आएगा? ये सवाल चुभते हुए हो सकते हैं मगर हैं जायज। ज़रा सोचियेगा?

Thursday, November 4, 2010

बस 'एक' मौत !

सभी पन्ने छोड़ने के बाद मैं फिर से एजेंसी चेक कर रहा था। एक घटना की खबर पर नज़र पड़ी और मैंने अपने डेस्क इंचार्ज से पूछा सर इस खबर को लगवाकर पन्ना फिर से छुडवा दें? उन्होंने पूछा कितने लोग मारे गए हैं? मैंने कहा सर एक लोग! सुनकर सर ने कहा, छोडो यार, एक ही आदमी तो मरा है। बात आई गयी हो गयी।
घर लौटते हुए मेरी गली में कुछ रोना सुनाई दिया। मैंने एक आदमी से पूछा क्या हुआ? उसने कहा एक आदमी मर गया है। उसीके गम में सब लोग रो रहे हैं। मरने वाले की बीवी, अलग... बेटा अलग और दूसरे घर वाले अलग। उनकी तो दुनिया ही उजाड़ गई थी। मेरे दिमाग में अपने सर की बातें घूमने लगीं। 'एक ही आदमी तो मरा है...'