Monday, December 19, 2011
अदम गोंडवी जैसा वो तेवर कहां मिलेगा?
ये वो कविता है, जिसे पढ़कर मैंने अदम गोंडवी को जाना था। इसके बाद कविताकोश के जरिए उनकी कई कविताओं को पढ़ा। यह बताने की जरुरत नहीं कि उनकी कविताओं में समाज, शासन और राजनीति की विडंबनाओं पर किस कदर तल्खी भरी हुई है।
ऊपर जिस कविता का जिक्र कर चुका हूं, उसके बारे में बताते हैं कि वह उनके ही गांव की एक घटना का जीवंत वर्णन है। जिस वक्त वहां पर दबंगों के खिलाफ आवाज उठाने में लोगों की रूह कांप रही थी, अदम गोंडवी ने इस कविता के जरिए बिगुल बजाया था। इस कविता को पढ़ते हुए आज भी रोंगटे खड़े हो जाते हैं।
सिर्फ यही कविता क्यों, अदम साहब की हर कविता में जिंदगी का हर रंग मौजूद है। विद्रोह का हर लहजा, हर तेवर बरकरार है। उन्होंने युवा पीढ़ी की हताशा को कितने सटीक अंदाज में बयां किया है...
''जिस्म क्या है रूह तक सब कुछ ख़ुलासा देखिये
आप भी इस भीड़ में घुस कर तमाशा देखिये
जो बदल सकती है इस पुलिया के मौसम का मिजाज़
उस युवा पीढ़ी के चेहरे की हताशा देखिये''
युवा पीढ़ी से जुड़ी यह पंक्तियां भी...
''इस व्यवस्था ने नई पीढ़ी को आखिर क्या दिया,
सेक्स की रंगीनियां या गोलियां सल्फास की।''
उनकी एक और कविता में समाज में अभावों के बीच जिंदगी गुजार रहे लोगों की बात कुछ यूं बयां की गई है...
''घर में ठंडे चूल्हे पर अगर खाली पतीली है, बताओ कैसे लिख दूं धूप फागुन की नशीली है''
उन्होंने राजनीति पर भी करारे व्यंग्य किए हैं...
'एक जनसेवक को दुनिया में अदम क्या चाहिए
चार छ: चमचे रहें माइक रहे माला रहे'
'काजू भुने प्लेट में, व्हिस्की गिलास में
रामराज उतरा है विधायक निवास में '
जैसी लाइनों के जरिए उन्होंने राजनीति के खोखले आदर्शों और राजनीतिज्ञों के दुहरे चरित्र पर खुलकर वार किए।
समाज की एक और तल्ख सच्चाई अदम गोंडवी की कविता में कैसे निकली है...
'रोटी कितनी महँगी है ये वो औरत बताएगी
जिसने जिस्म गिरवी रख के ये क़ीमत चुकाई है'
यही नहीं, उन्होंने कौमी एकता को भी अपनी कविता की आवाज दी। ये लाइनें गवाह हैं...
''हिन्दू या मुस्लिम के अहसासात को मत छेड़िये
अपनी कुरसी के लिए जज्बात को मत छेड़िये
हैं कहाँ हिटलर, हलाकू, जार या चंगेज़ ख़ाँ
मिट गये सब, क़ौम की औक़ात को मत छेड़िये''
मैं इसे अपना दुर्भाग्य ही मानूंगा कि अदम गोंडवी से कभी मिल नहीं पाया। मगर यह भी सच है कि उनकी कविता की तल्खी और उस बेबाकी के जरिए उनसे कई दफे रूबरू हो चुका हूं। और यह भी उतना ही सच है कि उस तेवर को हमेशा-हमेशा मिस करुंगा।
हकीकत यह है कि अदम गोंडवी या दुष्यंत कुमार जैसे रचनाकार किसी वक्त या दौर के मोहताज नहीं हैं। हर वक्त हर दौर में वो उतने ही प्रासंगिक हैं। वह हर दौर की युवा पीढ़ी के नायक रहेंगे।
(अदम गोंडवी की रचनाएं पढ़ने के लिए नीचे लिंक को क्लिक करें।)
कविता-कोश का लिंक।
Friday, December 9, 2011
काश, 'हमारी' भी ऐसे ही सुनते मंत्री जी!
मेरे जेहन में दो सवाल आए, एक तो काश, देश के मंत्री जी लोग हर मामले को इतनी ही संजीदगी से लेते और दूसरा कि देश में ना जाने कितने लोग रोज रेलगाड़ी से यात्रा करते हैं। इनमें से बहुत से लोगों को जगह भी नहीं मिल पाती, मगर वह किसी से अपनी शिकायत नहीं कर पाते। बस व्यवस्था को कोसकर खुद को तसल्ली दे लिया करते हैं।
पिछले दिनों मुझे खुद भी एक वाकया देखने को मिला। घर से वापस नौकरी पर, यानी आज़मगढ़ से कानपुर आते वक्त एक ऐसा ही मामला देखने को मिला। मेरी सीट के बगल में एक महिला अपने दो बच्चों के साथ दोनों सीटों के बीच की जगह में लेटी हुई थी। दरअसल उनका टिकट कन्फर्म नहीं था। उसे कोई सीट नहीं मिल रही थी और मजबूरन उसे अपना पूरा सफर उसी जगह पर लेटकर पूरा करना पड़ा।
अब जब नेताओं की इस 'असुविधा' के बारे में पता चला तो बड़ी हैरानी हुई। काश, देश की जनता की बात भी इतनी ही फिक्र होती। काश, देश की जनता से जुड़े मामलों को लेकर मंत्री जी लोग इतने ही सक्रिय होते। काश, जनता से जुड़े मामलों में इतना ही फौरी निर्णय होता। काश!
Friday, October 14, 2011
पूनम पांडे, सेक्स और सक्सेज

पूनम पांडे नाम की हसीना एक बार फिर सुर्खियों में है। बॉथरूम में नहाते हुए जो वीडियो उसने अपलोड किया है, उसे देखने के लिए इंटरनेट पर लोग टूट पड़ रहे हैं। वेबसाइट्स पर उसके वीडियो को हिट बताया जा रहा है। इंडियन ग्लैमर सिनैरियो पर पूनम पांडे का अवतरण बड़ा नाटकीय रहा है। याद कीजिए वर्ल्ड कप 2011 में भारतीय क्रिकेट टीम को प्रेरित करने वाला बयान देकर वह सुर्खियों में छा गई थी। (हालांकि उसकी इस घोषणा से कि 'भारत अगर वर्ल्ड कप जीता तो वह न्यूड हो जाएगी' ने भारतीय खिलाडि़यों को कितना इंस्पायर किया यह शोध का विषय होना चाहिए।) अपने इस वादे से पूनम पांडे पल भर में एक जाना-पहचाना नाम बन गई। इंटरनेट, न्यूज पेपर, न्यूज चैनल्स हर जगह पूनम पांडे, पूनम पांडे। इसके साथ ही विजय माल्या के बहुचर्चित कैलेंडर्स की कैलेंडर गर्ल नेशनल ही नहीं इंटरनेशनल सिनैरियो पर छा गई।
बहरहाल पूनम पांडे का लेटेस्ट वीडियो चर्चा में है। कुछ लोग उसकी इस हरकत पर हाय-तौबा भी मचा रहे हैं। मुझे इन हाय-तौबा मचाने वाले जीवों से बड़ी नफरत है। अगर पूनम पांडे हाईलाइट होने के लिए ऐसा कर रही है तो इसमें गलत क्या है। उसे यह बात पूरी तरह पता है कि उसका जिस्म एक 'प्रोडक्ट' है और जब तक प्रोडक्ट की मार्केटिंग नहीं होगी वह बिकेगा नहीं। अपने वीडियोज से अपने जिस्म की मार्केटिंग करके अगर वह सफलता का रास्ता तैयार कर रही है तो लोगों के पेट में भला दर्द क्यों हो रहा है। और दर्द हो रहा है तो होता रहे। यह बात पूनम पांडे भी बखूबी जानती है कि इस दर्द से बेहाल लोग जब उल्टी करेंगे तो भी उसकी पॉपुलैरिटी ही होगी। उसे यह पता है कि जो लोग सामने आकर उसकी इस हरकत पर थू-थू करेंगे, वही बाद में अकेले में लार टपकाते हुए उसका वीडियो भी देखेंगे। उसे गालियां देने वाले उसकी अदाओं पर आहें भी भरेंगे। इसका उदाहरण मैं खुद देख चुका हूं जब टीम इंडिया की जीत के बाद तमाम लोगों ने पूनम पांडे के नग्न रूप के दर्शन की ख्वाहिश जाहिर की थी। और हां, इस बात पर कम बहस हुई थी क्या कि पूनम पांडे ने अपना वादा नहीं निभाया।
इस तरह का हथकंडा अपनाकर पूनम पांडे अगर बिपाशा बसु, मलिका सहरावत या राखी सावंत या उन जैसे कुछ और नामों, जिन्होंने जिस्म की नुमाइश करके शोहरत पाई की, कतार में शामिल होना चाहती है तो भला गलत क्या है? जो भी हो उसे यह मालूम है कि दुनिया के इस बाजार में नारी जिस्म ही एक ऐसी चीज है जिसे आसानी से बेचा जा सकता है। तमाम फिल्मी डायरेक्टर, बड़ी नामी हिरोइनें भी तो यही करती रही हैं। क्या राजकपूर ने अपनी तमाम फिल्मों में 'कला' के नाम पर नारी जिस्म को नहीं दिखाया है? जिस्म की नुमाइश के जरिए प्रसिद्धि पाने के खेल में अगर वह शामिल हुई है तो उसके पीछे वह पुरानी परंपरा क्या दोषी नहीं है? यहां तक कि अन्ना हजारे के आंदोलन के दौरान भी कुछ हसीनाओं ने अधनंगी तस्वीरें खिंचवाकर प्रसिद्धि का प्रसाद प्राप्त किया था।
पूनम पांडे के विजन और ईमानदारी की दाद देनी होगी। कम से कम वह उन अभिनेत्रियों में तो नहीं जो पहले बोल्ड सीन देकर फिर निर्माता-निर्देशक पर आरोप लगाती फिरती हैं। खेल भले ही नंगई का हो पर पूनम पांडे पूरी रणनीति के साथ उतरी है। एक कुशल मैनेजर की तरह उसने अपनी हर चीज को बेहद सलीके से रखा है। अपनी वेबसाइट बनाई, टि्वटर अकाउंट बनाया है, जहां वह गाहे-बगाहे अपनी अधनंगी तस्वीरें लगती रहती है। असल में वह उस चलन को फॉलो कर रही है कि इंडस्टी में शाहरुख बिकता है या सेक्स। अब शाहरुख तक पहुंचने की उसकी हैसियत तो है नहीं सो वह सेक्स को शाहरुख तक पहुंचने की सीढ़ी बना रही है। उसे पता है जो दिखता है, वही बिकता है।
Saturday, October 8, 2011
आधी रात को ख्यालों की आवारगी
बहरहाल, कान में ईयरफोन ठूंसकर म्यूजिक प्लेयर पर जाने तक तय नहीं है कि गाना कौन सा सुना जाएगा। दिल कहता है, चलो जो ही सुना दो। प्ले करते ही आतिफ असलम की आवाज कान में गूंजती है। 'कुछ इस तरह........तेरी पलकें, मेरी पलकों से मिला दे।' सुर घटते-बढ़ते रहते हैं। नशा तारी होता जाता है। गाना खत्म होता है। दिल से वन्स मोर का शोर। चलो फिर हो जाए, दिमाग किसी आवारा साथी की तरह दिल का साथ देता है।
अजीब बात है ना। हम दिल की तुलना में दिमाग को ज्यादा अक्लमंद मानते-समझते हैं। मगर दिमाग की शैतानियां तो दिल की कारगुजारियों से बड़ी हैं यार। दिल तो बेचारा मासूम, जो समझ में आया कर लिया, किसी बच्चे के माफिक। मगर दिमाग, वह तो पूरा शाणा। मंझा हुआ अपराधी। दिल-दिमाग की मिलीभगत से मेरा संगीतमय अपराध चलता रहता है। फिर ख्याल आता है, गुलाम अली को सुन लूं थोड़ा। ख्यालात की लड़ी बनती जा रही है। ख्याल एक दूसरे से टकरा रहे हैं।
सारंगी और तबले की जुगलबंदी के बीच गुलाम अली की आवाज कानों में मिसरी की तरह घुलती है। 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है......' जाने कितनी बार सुन चुका हूं ये गजल। मगर हर बार एक नई तरावट मिलती है। किसी चीज का नशा हो जाना शायद इसी को कहते हैं। बार-बार वही करने को जी चाहता है। आज भी याद है पहली दफा यह गजल यूनिवर्सिटी में पढ़ाई के दिनों में जौव्वार हुसैन सर के मुंह से सुनी थी। जयपुर टूर पर जाते वक्त, पूरे जौनपुरिया मिजाज और ठसक के साथ उन्होंने यह गजल सुनाई तो फिर मैं इसका मुरीद होता चला गया। बरसों बीत चुके हैं मगर इसके लिए दीवानापन अभी भी कायम है।
गुलाम अली साहब की लत कब लगी यह तो याद नहीं, मगर गजल के साथ फनकार का अंदाज भी भाता गया। शायद यह उम्र के उस दौर का भी कुसूर था कि आवाज के बादशाह से ज्यादा गजल के लफ़्जों ने ज्यादा लुभाया।
मेरे कानों में ठुंसे ईयरफोन के जरिए गुलाम अली साहब की खुरदरी, मगर बला की मुलायमियत और कशिश से भरी आवाज मेरे जेहन में ग्ंज रही है। वो गा रहे हैं 'तुझसे मिलते ही वो कुछ बेबाक हो जाना मेरा........' इधर मेरे जेहन में एक और ख्याल उमड़ने लगा है। कुछ लिखने के लिए मन बेचैन हो रहा है। मन के एक कोने से आलस का आमंत्रण आता है, अमां सोओ यार, कहां रात में आंखें फोड़ोगे। गिरीन्द्र भाई से किया वादा, कि अब इस ब्लॉग पर सिर्फ क्रिकेट के बारे में ही लिखूंगा भी टूटने का डर नहीं सताता। लिखने का कीड़ा ज्यादा ताकतवर है। मैं बिस्तर पर से उठ रहा हूं। लैपटॉप टिकाने के लिए मेज को खोल रहा हूं। लाइट नहीं जलानी है, पुनीत भाई जागने ना पाएं इसका भी ख्याल रखना है। एक बार फिर रूम-पार्टनर धर्म की दुविधा में फंसा हूं।
लैपटॉप पर लाल-नीली बत्तियां जलने लगी हैं। इंटरनेट कनेक्ट कर रहा हूं और कानों में गुलाम अली गुनगुना रहे हैं, 'दोपहर की धूप में, मेरे बुलाने के लिए, वो तेरा कोठे पे नंगे पांव आना याद है।'
सुबह के तीन बजने जा रहे हैं, ख्यालों की आवारगी मुसलसल जारी है।
Thursday, October 6, 2011
कुछ करो कप्तान साहब
पिछले कुछ समय से धोनी का सितारा गर्दिश्ा में चल रहा है। उनके साथ कुछ भी ठीक नहीं हो रहा है। जैसे वर्ल्ड कप जीतने के बाद उनका मिडास टच कहीं खो गया है। इंग्लैंड में लगातार हार मिली। वर्ल्ड कप विनिंग टीम के आधे से ज्यादा सूरमा घायल होकर टीम से बाहर हो चुके हैं। खुद टीम का सिपहसालार भी घायल है और आराम के लिए गुहार लगा रहा है। मगर फिलहाल आराम नहीं है। अब फिर से अंग्रेज पधार चुके हैं।
धोनी को शायद इस बात का अहसास नहीं है कि वह सिर्फ मैच नहीं हार रहे हैं, बल्कि लोगों का विश्वास, यकीन, इज्जत, सम्मान और स्टारडम भी गंवा रहे हैं। वर्ल्ड कप के साथ जिस तरह थोक के भाव में धोनी मैच हार रहे हैं वह उनकी काबिलियत पर सवाल खड़ा कर रहा है। ऐसे में बेहतर होगा कि धोनी थोड़े दिन आराम करके रीचार्ज हो लें। इसके बाद फिर से वह जीत के मिशन पर निकलें।
Sunday, September 25, 2011
आधी रात, गंगा और गुलाम अली
उधर मंदिर की गली में भिखारियों का रेला लगा है। श्रद्धालुओं से एक-दो रुपए पा जाने की आस में उनके लिए दुआओं की झोली खाली कर डाल रहे हैं। हैरानी होती है कि ये भी किससे मांग रहे हैं? उससे, जो खुद भगवान से मांगने आया है। दुनिया की रीत है। एक भिखारिन अपनी दिन भर की जमा-पूंजी समेट रही है। गठरी बनाकर उसे सिरहाने बड़े जतन से रखती और उसी पर सिर रखकर सो जाती है। मेरे मन में सवाल उठता है, भगवान के दरबार में भी इतना डर। मगर वह शायद प्रैक्टिकल है। भगवान उसके लिए एक साधन मात्र हैं। उसे बस इतना पता है कि अगर भगवान नहीं होंगे तो भक्त यहां नहीं आएंगे और जब भक्त नहीं आएंगे तो उसका पेट भरना मुश्किल हो जाएगा।
इस सारे नजारे के बीच मैं अपने दो वरिष्ठ साथियों मयंक जी और पुनीत जी के साथ गंगा के घाट की तरफ चला जा रहा हूं। यह प्रोग्राम भी कोई तयशुदा नहीं था। खाना खाते-खाते अचानक बन गया था। घाट की तरफ मिलने से पहले मयंक जी का प्रस्ताव आता है, ठंडाई पियोगे। अचानक दो साल पहले का वाकया याद आ जाता है। तब मैं यहां नया था। एक रात ऐसे ही कुछ वरिष्ठों के साथ ठंडाई पीने का प्रोग्राम बना था। कुछ लोगों ने भांग वाली ठंडाई पी। मुझसे तो बताया गया कि तुम्हारी ठंडाई में भांग नहीं है, पर पता नहीं क्यों मुझे यकीन नहीं हुआ। रूम पर लौटा तो रात के 3 बजे तक हंसता ही रहा था।
खैर, इस बार ऐसा कुछ नहीं हुआ। ठंडाई पीने के बाद हम गंगा जी के घाट पर पहुंच गए। बरसात के पानी से उफनाई गंगा जी। आधी रात का वक्त। लहरें खामोश, मगर फिर भी उपस्थिति का आभास कराती हुईं। थोड़ा सा कोलाहल करते हुए। पार्श्व में भी कोलाहल तेज है। फिल्मी धुनों पर तैयार किए गए भक्ति गीत बज रहे हैं। घाटों के ठीक पीछे बने टीनशेड में कुछ साधु आराम करते हुए। कुछ मुसाफिर भी हैं शायद।
तभी मेरी मोबाइल में गाना बजता है, 'चुपके-चुपके रात दिन आंसू बहाना याद है'। गुलाम अली की मदभरी आवाज इस माहौल में एक अलग ही समां बांधने लगी। गुलाम अली के सुर बुलंद हो रहे हैं, गीत रफ़्तार पकड़ रहा है,
'चोरी-चोरी हमसे आकर, तुम मिले थे, जिस जगह, मुद्दतें गुजरीं पर अब तक वो ठिकाना याद है।'
मानों पीछे से आ रहे भक्ति गीतों का शोर, सामने गंगा की लहरों का कोलाहल और गुलाम अली के सुर जुगलबंदी करने लगे हों। एक अलग तरह का फ्यूजन। हम तीनों में से कोई बोल नहीं रहा है। बस सभी उस माहौल को जितना भी हो सके जी लेना चाहते हैं। मगर शायद पुनीत जी इस माहौल को यहीं छोड़ देने के मूड में नहीं। वह अपने मोबाइल से इस नजारे को कैद करने में लगे हैं।
करीब आधे घंटे का वक्त बीत चुका है। मन उठने को तैयार नहीं हो रहा। थोड़ी देर इस पल को और जी लेने को जी चाह रहा है, मगर सुबह ऑफिस जाना है। काम करना है। टेंशन-टेंशन। अचानक से रूहानी पल की खूबसूरती छू होने लगती है। हम उठकर चल पड़़ते हैं। गली में भी अब शोर थमने लगा है।
Friday, September 16, 2011
'दीवार' से मेरा प्यार

शुक्रवार को राहुल द्रविड़ ने वनडे क्रिकेट को अलविदा कह दिया। हालांकि वनडे से द्रविड़ को पहले ही दूर कर दिया गया था, फिर भी उन्हें आखिरी बार बैटिंग करते हुए देखना खासा भावुक करने वाला पल था। खासकर मेरे जैसे डाईहार्ड फैन के लिए। फिर भी मैं मानता हूं कि द्रविड़ इस मायने में लकी हैं कि उन्हें कम से कम फेयरवेल मैच खेलने का मौका तो मिला। हालांकि इसका एक पहलू और भी है कि इस वक्त भारत को वाकई उनकी जरूरत थी क्योंकि इस इंग्लैंड दौरे पर वही एकमात्र बल्लेबाज थे जो सफल हो पाए थे। द्रविड़ ने इस मौके का पूरा फायदा उठाया और ऐलान कर दिया कि यह सिरीज उनकी आखिरी वनडे सिरीज होगी।
मुझे आज भी 1996 का वह दिन याद है। मेरे ऊपर क्रिकेट का खुमार चढ़ना शुरू हो चुका था। अपने से बड़ी उम्र के गांव के लड़कों के साथ जो कि क्रिकेट के दीवाने थे, मैं क्रिकेट की चर्चा किया करता था। इस बात के लिए मुझे कई बार तारीफ, मगर उससे ज्यादा बार आलोचना झेलनी पड़ती। दरअसल गलती आलोचना करने वालों की भी नहीं थी। कक्षा छह में पढ़ने वाले से लोगों से बहस लड़ाने के बजाए, पढ़ाई में ध्यान देने की उम्मीद की जाती है। खैर, यह बातें फिर कभी। फिलहाल सारी बातें सिर्फ और सिर्फ मेरे हीरो द्रविड़ के बारे में।
3 अप्रैल 1996 के दिन भारत का श्रीलंका से मैच था। घर पर मैच देखने की सुविधा नहीं थी, और रेडियो पर चाचा जी कमेंटरी सुन रहे थे। उनके साथ कमेंटरी सुनने का दूर-दूर तक कोई चांस नहीं था। आखिरकार मैंने एक तरीका निकाला और किसी तरह घर से छुपकर निकला और अपने पड़ोसी के घर पहुंच गया। वहां पर मेरे पड़ोसी जो कि रिश्ते में चाचा थे, कमेंटरी सुन रहे थे। मैं भी उनके साथ बैठ गया। सचिन और अजहर का विकेट गिरने पर चौथे नंबर बैटिंग करने के लिए एक नया लड़का राहुल द्रविड़ आया। कमेंटेटर्स के मुंह से राहुल के लिए हमने काफी तारीफ सुनी। यहीं से इस नाम के प्रति मुझे एक अजीब तरह का लगाव पैदा हुआ। इसकी कई वजहें थीं। दरअसल इतिहास की किताब में मैंने द्रविण सभ्यता के बारे में सुना था। राहुल द्रविड़ का नाम सुनकर सोचा कहीं यह द्रविण सभ्यता से तो नहीं आया है। बहरहाल यह तो बचपन की समझ का कुसूर था। खैर वह दिन द्रविड़ का नहीं था और सिर्फ 3 रन बनाकर आउट हो गए। हालांकि बाद में उन्होंने फील्डिंग करते हुए दो कैच पकड़े और इंडियन टीम ने वह मैच भी जीता था।
अगले दिन अखबारों में राहुल द्रविड़ की फोटो ढूंढ रहा था, पर उन्होंने उस मैच में ऐसा कुछ खास किया नहीं था कि उनकी फोटो छपती। बाद में जब घर पर टीवी आई तो फिर राहुल द्रविड़ की बैटिंग देखने को मिली। फिर तो मैं उनका मुरीद होता चला गया। द्रविड़ की स्टाइल को लेकर अक्सर मेरी दोस्तों से लड़ाईयां भी हुई हैं। उन्हें ठुकठुक बल्लेबाज बताकर उनकी खिंचाई करते और मुझसे यह बर्दाश्त नहीं होता। खैर, आने वाले वक्त में द्रविड़ ने साबित किया कि वह तेजी से रन भी बना सकते हैं। आज भारत की तरफ से दूसरा सबसे तेज पचासा लगाने वाले द्रविड़ ही हैं।
वनडे में द्रविड़ की जगह लेने के लिए कई चेहरे हैं। विराट कोहली से लेकर, रोहित शर्मा, अजिंक्या रहाणे, एस बद्रीनाथ समेत कई नाम हैं। मगर असली समस्या तब शुरू होगी जब द्रविड़ टेस्ट से संन्यास लेंगे। वहां पर उनकी जगह लेने वाले खिलाड़ी को वाकई बड़े टेस्ट देने होंगे। बहरहाल जो खिलाड़ी हैं उनमें मैं चेतेश्वर पुजारा और विराट कोहली को उनकी जगह लेने के लिए आदर्श मानता हूं। मेरा मानना है कि इन दोनों में इतनी पोटेंशियल है कि वे द्रविड़ की जगह भर सकते हैं।
Saturday, September 10, 2011
फेसबुक पर लिख्ात-पढ़त
तुम्हारे आगोश में एक सदी का वक्त, जैसे एक लम्हें में गुजरा
शाम कतरा-कतरा ढलती रही, जिंदगी हमारे दरमियां सिमटती रही
तुम्हारी निगाहें हमें बुला रही थीं,
अदाएं तो बस कयामत ढा रही थीं
हर हुकूमत से लड़ जाएंगे,
इश्क किया तो ये हुनर सीखा है
तुम्हारा वजूद, मेरे जज्बात सलामत रहें,
तुम्हें नजर ना लगे, हमारा प्यार सलामत रहे
दो लफ्ज काफी नहीं हमारी मोहब्बत बयां करने के लिए
तुम चाहे कुछ भी कर जाओ, मैं तुम्हें यूं ही चाहता रहूंगा
(भारत की लगातार हार के बावजूद क्रिकेट का मोह नहीं छोड़ पाने पर)
नज़र से गुफ्तगू की कभी ज़बां नहीं खोली,
इज़हारे-ए-इश्क की ये अदा भी खूब रही।
कयासबाजियों में ही बीता वो दौर मोहब्बत का,
हम सही समझे तो भी ग़लत और ग़लत समझे तो भी ग़लत।
अरे फेसबुकिए मित्र, तुम बड़े अजनबी से लगते हो
कोई स्टेटस लाइक नहीं करते, कभी कमेंट नहीं करते
मोहब्बत की, प्यार की बातें
बेकार हैं इश्क के इजहार की बातें
जब मैं तुम्हारे ख्वाबों ख्यालों से दूर चला जाऊंगा
याद करना चाहोगी मुझे, पर मैं याद भी ना आऊंगा
अजीब पशोपेश से गुजर रहा हूं इन दिनों,
ना तुम्हारी याद आती है, ना तुम्हारा ख्याल जाता है
(इंग्लैंड में भारतीय टीम के खराब प्रदर्शन पर )
जिनके लिए मैंने रात की नींद कुर्बान कर दी
कम्बख्त मुझे दो पल की खुशी भी ना दे सके
(टी-20 में टीम इंडिया की हार पर )
वो मुस्कुराएँ तो दिल को कुछ सुकून मिले
पर वो जाने किस जन्म का बैर ठाने बैठे हैं.
कई दिनों से वो मेरी तरफ नहीं आये
कई दिनों से हम उनकी गली से नहीं गुज़रे
कई दिनों से निगाहों ने देखा नहीं उनको
खुदा खैर करे, उन्हें किसी की नज़र ना लगे.
सुना था तुम्हारे शहर में बेदर्द रहते हैं
आज हमको भी इस बात का अंदाज़ा हो गया.
जुदा होकर भी उसका अहसास दिल में अभी बाकी है,
उसके वजूद को हम ख्यालात में भी महसूस करते हैं.
फिर किसी मोड़ पर मुलाकात हो जाने की आस में,
हम उनकी मोहब्बत का दिया दिल में जलाये फिरते हैं.
ना साथी ना सहारा है,
ज़िन्दगी तनहा बंजारा है
निगाहें ढूँढती हैं चेहरा कोई पहचाना,
मगर इस भीड़ में हर शख्स अनजाना है.
Saturday, August 20, 2011
गुलजार के साथ सावन-१
वो ख्यालों की आवारगी, वो शब्दों की जुंबिश, वो भावनाओं का उतार-चढ़ाव कहां से लाते हैं। वो आशिकी, वो मौसिकी सब कहां रखते होंगे। कई बार जेहन हैरान होता है कि झक सफेद लिबास पहनने वाला वो शख्स शब्दों को इतनी रंगीनियत, ग़ज़लों को इतनी रूमानियत कैसे दे पाता होगा। अब तक आपको अंदाजा हो चुका होगा कि यहां जिक्र किसका हो रहा है। जी हां, गुलजार साहब। उनकी कलम से निकले अल्फाजों ने जाने कितनों को दीवाना बना रखा है। किसी एक गीत का जिक्र करना तो गुनाह होगा और अगर सबके जिक्र करने बैठूं तो शायद लिख ही ना पाऊं। मगर जब बात निकली है तो उसे पूरा करने के लिए तो कुछ नगमों का सहारा लेना ही पड़़ेगा। फिल्म 'प्रेम पत्र' का वो गीत 'सावन की रातों में ऐसा भी होता है, राही कोई भूला हुआ तूफानों में खोया हुआ राह पे आ जाता है।' लता मंगेशकर और तलत महमूद की आवाज में यह यूं तो प्रणय गीत है, मगर जरा इसके मायने गहराई से समझें तो पता चलता है कि कितनी बड़ी बात कह दी गई है।
बात सावन की चली है तो आइए गुलजार साहब के कुछ और नग़मों की बारिशों में भीग लें। फिल्म 'बीवी और मकान' का गीत 'सावन में बरखा सताए' भी एक बेहतरीन नगमा है। १९६८ में आई हृषिकेश मखर्जी की फिल्म 'आर्शीवाद' का गीत 'झिर-झिर बरसे सावन अंखियां' भला कैसे भूला जा सकता है।
बरसात को भी सावन का एक हिस्सा ही माना जाता है, तो बरसात पर उनका लिखा फिल्म 'बसेरा' का गीत 'जाने कैसे बीतेंगी ये बरसातें' भी एक बेहतरीन गीत है। वहीं १९८१ में आई फिल्म 'नमकीन' का गाना 'फरि से आइयो बदरा विदेशी, तेरे पंखन में मोती जड़ूंगी' भी एक शानदार गीत है। इसमें नायिका बादल को पहले तो आमंत्रण देती है, लालच देती है, उससे तलैय्या किनारे मिलने का वादा भी करती है और फरि उसे काली कमलीवाले की कसम भी देती है। इसी फिल्म का एक और गीत 'बड़ी देर से मेघा बरसे हो रामा' भी है। दोनों ही गीतों को आशा भोंसले ने आवाज दी है।
सावन और बरसात पर गुलजार साहब के अभी कई गीत होंगे। तलाश जारी रहेगी, आपसे भी गुजारिश है कि अगर आपके जेहन में कुछ ऐसे गीत हों तो उसका जिक्र कमेंट बॉक्स में करें।
Wednesday, May 4, 2011
जब पहुंचा ओसामा ऊपर
ओसामा बिन लादेन मरने के बाद ऊपर गया. ऊपर भी बहुत तेजी के साथ ओसामा के मारे जाने कि खबर फ़ैल गयी. बल्कि वहां तो और पहले से ही लोगों को मालूम हो चुका था कि ओसामा मारा जाने वाला है. यह बात मालूम पड़ते ही सभी आत्माओं ने तैयारियां शुरू कर दी थीं, उसे देखने की. "ऊपरवाला सबसे तेज" नाम का न्यूज़ चैनल पल-पल की खबरे लोगों तक पहुंचा रहा था. "जहन्नुम लाइव" नाम का न्यूज़ चैनल तो और भी तेज है. उसने अपने एक रिपोर्टर को यमदूतों के साथ धरती पर भेज दिया. टीआरपी की लड़ाई में आगे रहने की ये उसकी चाल थी. वहीँ "नरक टाएम्स" और "अंधेरा अमर रहे" जैसे कुछ अखबार भी ओसामा की ख़बरों से रंगे पड़े थे।
खैर, नरक पुरम और स्वर्ग पुरम दोनों मोहल्लों के हर घर में तैयारी चल रही थी। हर आत्मा ओसामा को देखने जाना चाहती थी. एक महिला आत्मा अपने पति आत्मा से कह रही थी, ये जी, नई साडी ला दीजिये ना. इतना नामी गिरामी आदमी आ रहा है ऊपर उसे देखने जायेंगे, तो थोडा अच्छा कपडा चाहिए ना.
कुछ सम्मानित ढंग कि आत्माएं एक जगह जुटी हुई थी। चेहरे पर चिंता की लकीरे. तभी एक सज्जन पुरुष आत्मा वाला बोलटी हैं. हमें यमराज महोदय से बात करनी होगी. ऐसे खतरनाक और कलुषित मानसिकता के व्यक्ति को हम जहन्नुम में भी बर्दास्त नहीं करेंगे। उसके लिए स्पेशल सेल बनायीं जाए. उसे सबसे अलग रखना चाहिए.
एक और जगह पर कुछ और आत्माएं जुटी हुई थीं। सबके चेहरे पर एक तरह का सुकून है. कुछ ख़ुशी सी है. एक दुष्ट पुरुष आत्मा आगे आके बोलना शुरू करती है. कितने दिनों से इस शुभ घडी का इंतज़ार था. जो मिशन धरती पर अधूरा रह गया, उसे हम यहाँ पूरा करेंगे. हमारा आका आ रहा है. उसके स्वागत में कोई कमी नहीं होनी चाहिए. हर इंतज़ाम ढंग से और पूरा होना चाहिए.
यमराज सबसे ज्यादा परेशान। कुछ दूतों ने पूछा क्या बात है महाराज, तो भड़क गए. क्या बताएं कि तीन दिन से सीआईऐ और आईएसआई एजेंटों की आत्माओं ने परेशान करके रखा है. कह रहे हैं कि ओसामा की आत्मा के यहाँ आते ही हमारे हवाले कर दो. अब बताओ भला मैं क्या करूं.
जब ओसामा ऊपर पहुंचा तो एकदम परेशान। बोला हमको वापस पाकिस्तान भेज दो...............
Wednesday, April 6, 2011
मेरे पास कप है

सचिन तेंदुलकर और वर्ल्ड कप , एक सपना, एक ख्वाहिश, एक कसक. हाइड एंड सीक से भरी एक ऐसी दास्तान जिसमें दिल तोड़ देने वाले कई लम्हे भी आए. ब्रायन लारा से उनका कंपैरिजन किया गया। कहा गया डॉन ब्रैडमैन उनसे बेहतर बैट्समैन थे. आज अगर ब्रायन लारा कहें कि मेरे पास टेस्ट क्रिकेट में 400 रनों की इनिंग्स का रिकॉर्ड है तो सचिन भी फख्र से कह सकते हैं, मेरे पास कप है।
जहां देखा था सपना, वहीं हुआ पूरा सचिन का वर्ल्ड कप ड्रीम पूरा हुआ। वहीं, जहां से उन्होंने यह सपना देखना शुरू किया था। उसी मुंबई की सरजमीं पर, जहां सचिन ने क्रिकेट की एबीसीडी सीखी थी। सचिन खुद कहते हैं, ‘जब मैं बच्चा था तो मैं इस सपने के साथ बड़ा हुआ कि एक दिन वर्ल्ड कप हाथ में उठाउंगा।’ 1989 में सचिन ने क्रिकेट की दुनिया में कदम रखा. इसके बाद उन्हें 1992 में पहला वल्र्ड कप खेलने का मौका मिला. न्यूजीलैंड और ऑस्ट्रेलिया की धरती पर हुए इस वर्ल्ड कप में सचिन ने शानदार बैटिंग की थी। सात मैचेज में उन्होंने 283 रन बनाए थे, मगर टीम इंडिय का सफर पहले राउंड में ही खत्म हो गया।
1996 का दर्द
अब 1996 की बारी थी। भारत, श्रीलनका और पाकिस्तान इस वर्ल्ड कप के होस्ट थे। अपनी जमीन पर खेले गए इस मुकाबले में पूरी उम्मीद थी कि टीम इंडिया विजेता बनेगी। जब सफर सेमीफाइनल त· पहुंचा तो सचिन का बचपन का सपना पूरा होता लगा. मगर शायद अभी और इंतजार बाकी था. सेमीफाइनल में श्रीलंका से हार के साथ इंडिया का वर्ल्ड कप में सफर खत्म हो गया. सचिन के बालसखा आंसुओं में डूब गए और पूरा देश गम के सागर में। सचिन ने 7 मैचेस में 523 रन बनाए थे।
1999 का वर्ल्ड कप
ख्वाब आगे-आगे भाग रहा था और सचिन ख्वाबों ·ा पीछा ·रने में लगे हुए थे, 1999 का वर्ल्ड कप आ गया था। इंग्लैंड की धरती पर अजहरुद्दीन की कप्तानी में इंडियन टीम पहुंच चुकी थी। मगर साउथ अफ्रीका और जिंबॉब्वे के हाथों मिली हार ने टीम का आगाज खराब कर दिया। जिंबॉब्वे के मैच से पहले सचिन को वापस इंडिया आना पड़ा. वह अपने पिता को खो चुके थे. इस नाजुक क्षण में भी सचिन नहीं टूटे और वापस लौटकर अगले मैच में केन्या के खिलाफ सेंचुरी बनाई. टीम किसी तरह सुपर सिक्स तक तो पहुंची, मगर सेमीफाइनल में नहीं पहुंच सकी। सचिन ने 7 मैचेस में 253 रन बनाए थे.
2003 की कसक
अगला वर्ल्ड कप साउथ अफ्रीका की सरजमीं पर 2003 में खेला गया. यह एक ऐसा वर्ल्ड कप था, जहां सचिन का सपना पूरा तो नहीं हुआ पर वह इसके काफी करीब तक पहुंच गए थे. फाइनल में कंगारुओं के खिलाफ मिली हार ने एक बार फिर उन्हें मायूस कर दिया. सौरव गांगुली की कप्तानी और सचिन की टूर्नामेंट में शानदार बैटिंग के बावजूद टीम को खाली हाथ लौटना पड़ा. सचिन ने इस वर्ल्ड कप में 11 मैच में 673 रन बनाए. वेस्टइंडीज में 2007 में हुआ वर्ल्ड तो टीम इंडिया के लिए एक भूल जाने वाला डरावना ख्वाब साबित हुआ. पहले ही मैच में बांग्लादेश के खिलाफ मिली हार के बाद टीम उबर नहीं सकी। पहले ही राउंड से टीम बाहर हो गई. पर्सनल लेवल पर भी सचिन के लिए टूर्नामेंट यादगार नहीं रहा, 3 मैचेस में वह सिर्फ 64 रन ही बना सके ।
एंड ही इज चैम्पियन
मगर कहते हैं ना कि इंतजार का फल मीठा होता है. आखिर सचिन का सपना पूरा हुआ. वर्ल्ड कप की ट्रॉफी उन्होंने चूमने का स्वाद उन्होंने महसूस किया. इस बीच ना जाने कितने कसैले एक्सपीरियंस हुए, मगर सचिन ने अर्जुन की तरह सिर्फ वर्ल्ड कप पर निगाह जमाए रखी और आज वह उनके पास है।
4 अप्रैल को i next में publish
Tuesday, March 29, 2011
आखिरी मुलाकात

इंडिया-पाकिस्तान के बीच मैच हो और सचिन तेंदुलकर-शोएब अख्तर राइवलरी की चर्चा ना हो, ऐसा हो ही नहीं सकता अपनी टीमों के लिए दोनों ही आइकान. अगर सचिन को इंडिया में क्रिकेट के गॉड का दर्जा हासिल है तो शोएब अख्तर भी पाकिस्तान में किसी स्टार से कम नहीं हैं. अब बुधवार को होने वाले वर्ल्ड कप सेमीफाइनल मैच में यह दोनों योद्धा आखिरी बार एक-दूसरे के आमने-सामने होंगे. सचिन तेंदुलकर और शोएब अख्तर, एक रेकॉर्ड्स का बेताज बादशाह है तो दूसरा स्पीड का शहंशाह. क्रिकेट के मैदान पर दोनों की भिड़ंत के कई किस्से मशहूर हैं। जब-जब अख्तर ने जुबान से जंग का आगाज किया है, सचिन ने अपने बल्ले से जवाब दिया है. 2003 वर्ल्ड के दौरान सेंचुरियन के मैच को भूल सकता है भला. मैच से पहले शोएब अख्तर का बड़बोलापन और मैच में सचिन की धमाकेदार इनिंग्स. हिसाब चुकता और वर्ल्ड कप से पाकिस्तान का पत्ता साफ. यही सचिन का अंदाज रहा है. चुपचाप अपने विरोधी का कत्लेआम. कभी कलाई के सहारे शानदार फ्लिक, कभी घास छीलता कवर ड्राइव तो कभी बॉलर के पैरों के पास से निकलता स्ट्रेट ड्राइव. किसी मंझे हुए कलाकार की तरह वह अपनी इनिंग्स को एक मुकम्मल मुकाम तक पहुंचाते हैं. अपने करियर में सचिन ने सिर्फ रेकॉर्ड्स का पहाड़ ही नहीं खड़ा किया, बल्कि विरोधियों के दिलों में भी अपने लिए सम्मान पैदा किया. यहीं पर शोएब अख्तर पिछड़ जाते हैं. उनके टैलेंट, उनकी तेजी और विकेट टेकिंग एबिलिटी पर किसी को शक नहीं रहा है. जरा याद कीजिए, बाउंड्रीलाइन के करीब से लहराती जुल्फों और लयबद्ध एक्शन के साथ अख्तर का रनअप. करीब सौ मील की रफ्तार से बैट्समैन के कान करीब से सनसनाती हुई निकलती उनकी बॉल. फिर विकेट मिलने के बाद पक्षियों की तरह हाथ लहराते अख्तर का दौडऩा इस वर्ल्ड कप के बाद सिर्फ कैमरों में कैद होकर रह जाएगा. हालाँकि उनके करियर के कई निगेटिव प्वॉइंट्स भी रहे. उनकी तुनकमिजाजी, गुस्से और बदजुबानी ने वर्ल्ड क्रिकेट में उनके तमाम क्रिटिक पैदा कर दिए. यहां तक पाकिस्तान में भी उनके सपोर्टर्स का टोटा देखने को मिला है. टीम के साथियों से झगड़ा, डोपिंग का दाग, ड्रग्स का दंश हमेशा अख्तर का दामन दागदार करता रहा. इन सबके बावजूद हम तो यही कहेंगे, बहुत याद आओगे शोएब !
27 मार्च को i next के sunday issue में प्रकाशित
Wednesday, March 9, 2011
बीबीसी की याद में
खैर, जेहन में बीबीसी की कई बातें आज भी ताज़ा हैं। मैं छठी या सातवीं में पढता था। घर में बीबीसी खूब सुनी जाती थी। (अभी भी चाचा जी सुनते हैं ) शाम को साढ़े सात बजते ही रेडियो पर बीबीसी की सिंग्नेचर ट्यून बजती, और फिर आवाज आती, 'बीबीसी की तीसरी सभा में आपका स्वागत है, मैं मधुकर उपाध्याय, इस सभा .........पहले आप सुनिए अन्तराष्ट्रीय समाचार......और फिर जैसे ही समाचार ख़त्म होते, सिंग्नेचर ट्यून बजती और रेडियो से पहले मैं बोल उठता, 'आज कल' सच एक जूनून था। जैसे जैसे बड़ा होता गया ये जूनून एक मुकम्मल नशा बन गया। अचला शर्मा, रेहान फजल, ब्रजेश उपाध्याय, ममता गुप्ता, और भी कई नाम। मैं इन्हें सुनता और बाद में इनकी नक़ल करता। कहना गलत नहीं होगा कि पत्रकारिता में आने कि लगन यहीं से लगी....
ये तो बीते दिनों कि यादें है। अब तो कभी कभी ही बीबीसी सुन पता हूँ, मिस तो करता ही हूँ........
Tuesday, February 22, 2011
प्रियंका के खूबसूरत गुनाह
एक हसीना, सात खून, मगर चेहरे पर ज़रा भी शिकन नहीं। हर खून के साथ प्रियंका का हुस्न और भी निखरता गया। इसी तरह उनका अभिनय भी। आगे चलकर प्रियंका की बेहतरीन फिल्मो में शामिल होगी सात खून माफ़। जहाँ तक विशाल भरद्वाज की बात है तो, वह तो उस्ताद ही हैं। प्रियंका ने अपने रोल के साथ पूरी तरह से इंसाफ किया है। एक महिला की अधूरी ख्वाहिशों को उन्होंने बड़े ही शानदार तरीके से परदे पर उतारा है। सुजैना के रूप में हमारे सामने एक ऐसी महिला है जिसके पास खूब सारी दौलत , नौकर चाकर हैं, उसके हर हुक्म की तामील होती है। मगर फिर भी वह खुद को अधूरा महसूस करती है । एक जिद है। सपनो को लेकर उसके अन्दर एक तड़प वह। वह चाहती है कि कोई मिले उसे जो मोहब्बत के मतलब बताये, जिंदगी के सफ़र में उसका सहारा बने। मगर स्वार्थी पुरुषों की दुनिया में उसे हर बार निराश होना पड़ता है। अपने पात्र के हर अक्स को उभरने में प्रियंका सफल रही हैं। हर भाव की कसक उनके चेहरे पर साफ झलकती है। निश्चित तौर पर विशाल तारीफ़ के हक़दार हैं की उन्होंने प्रियंका से शानदार कम लिया है।
पहले भी वह ऐसी शानदार फिल्मे बना चुके हैं और आने वाले वक्त में कुछ और शानदार फिल्मे देखने को मिलेंगी, प्रियंका से भी, विशाल से भी...........